दयाल की बात सुनकर दक्षराज जौर जौर से हंसने लगता है और कहता है---
> हा हा हा हा । मेरे साथ रहकर तेरी भी बुध्दी काम करने लगी है दयाल।
वही घर के उपर बैठे मातंक और त्रिजला यह सब दैखकर हैरान था। त्रिजला मांतक से कहती है--
> स्वामी इस मानव की बात सुनी आपने कितना
स्वार्थवान है ये। हम बहोत से घरों में गए पर इसके जैसा मानव नही दैखा। स्वामी मुझे तो ऐसा आभास हो रहा है के जिसे हम ढुंढ रहे हैं कहीं यही मानव तो नही है।
त्रिजला की बात सुनकर मातंक कहता है--
> हां त्रिजला मुझे भी ऐसा ही आभास हो रहा है। मुझे इस मानव का चरित्र ठीक नही लग रहा है। परतुं अभी हमे और भी घरों मे जाकर दैखना है और ऐसे ही मानवो को दैखकर उन्हें चिन्हित करके उस पर नजर रखनी है।
त्रिजली कहती है---
> स्वामी हमे उस एकांश को भी ढुंढना है जिसका नाम कुंभ्मनी ने बताया था शायद वो उन सबके बारे में कुछ जानता हो।
मातंक कहता है--
> हां त्रिजला तुमने ठीक कहा अब चलो कहीं और जाकर दैखता हूँ।
इतना बोलकर दौनो ही वहां से उड़ कर चला जाता है। रात हो चुकी थी । हॉस्पिटल में एकांश घायल हूए सभी लोगो से एक एक करके मिलता है और सभी का हाल चाल पूछता है। तभी एकांश चेतन के बेड ते पास पहूँचा है तो दैखता है के वह बेड खाली था वहां पर चेतन नही था़।
चेतन को बेड मे ना दैखकर एकांश हैरान था। एकांश वहां पर मौजूद सभी लोगों से पूछता है--
> काका इस बेड में जो पेशेन्ट आज सुबह आया था जिसका नां चेतन था वो कहां गया किसीने दैखा है क्या ?
पर सभी ना में जवाब देता है--
> नही बेटा वो कहां गया ये तो पता नही पर अभी 10 मिनट पहले ही वो यही पर था।
तभी वहा पक आलोक आ जाता है और एकांश को परेसान दैखकर उससे पूछता है--
> क्या बात है यार तुम इतने परेसान क्यों हो ?
एकांश आलोक को चेतन का खाली बेड की और इशारा करते हूए सारी बात बताता है। एकांश की बात सुनकर आलोक कहता है--
>
ये कैसे हो सकता है यार । सुबह से हम सब यही पर है। ऐसे में वो यहां से जा कैसे सकता है।
आलोक भी सबसे पूछने लगता है पर किसीके पास कोई जवाब नही था। एकांश मन ही मन सौचता है--
> कही ये चेतन कुंम्भन तो नही था जो इंसान का रुप
लेकर वर्षाली के बारे में जानने आया था।
एकांश इतना सौच ही रहा था के आलोक निलु की और शक की नजर से दैखकर कहता है--
> निलु काका क्या आपको भी नही पता के चेतन कहां गया है।
आलोक की बात पर निलु घबरा जाता है और अपनी नजरे चुराते हूए कहता है--
> ये... ये तुम क्या कह रहे हो आलोक बाबा जब इतने सारे लोगों को नही पता तो मुझे कैसे पता होगा। मैं तो यहां पर आराम कर रहा था।
निलू की बात को सुनकर आलोक गुस्सा हो जाता है और निलु से कहता है---
> अच्छा ! खेल खेल रहे हो हमारे साथ ? मजाक लग रहा है आपको।
तभी एकांश आलोक को बाहर ले जाकर समझाता है--
> ये क्या कर रहे हो यार । अपने गुस्से पर काबु रखो । इस तरह से तो निलु काका को हम पर शक हो जाएगा के हम सब उन पर नजर रख रहे है । हमे चुपचाप उन पर नजर रखनी है। तभी हम सच्चाई जान पाएंगे।
आलोक हां में अपना सर हीलाते हुए कहता है--
> मुझे माफ करना यार मैं थोड़ा भावुक हो गया था ।
इतना बोलकर आलोक वहां से चला जाता है पर एकांश अंदर ही अंदर बहोत डरा हुआ था। उसे सिर्फ एक ही चिंता थी के अगर चेतन ही कुंभ्मन था तो कहीं वह वर्शाली को कुछ नुकसान ना पहूँचा दे। पर एकांश हॉस्पिटल को छौड़कर जा भी नही सकता था।
एकांश सौचता है---
> मैं यहां से अगर चला जाऊं तो फिर यहां हॉस्पिटल
कि दैख भाल कौन करेगा क्योकीं यहां पर अभी वृन्दां भी नही है। ऐसे मैं अगर मैं चला जाऊं तो मरीजों की दैखभाल कौन करेगा।।
एकांश इतना सौच ही रहा था के तभी वहां पर एक गाड़ी आकर रुकती है। जिसमे से चट्टान सिंह , सोनाली और वृन्दां उतरती है। जिसे दैखकर एकांश हैरान हो जाता है एकांश चट्टान सिंह और सोनाली के पैर छूते हुए कहता है--
> अंकल आंटी आप सब यहां और इस समय ? सोनाली कहती है--
> क्यो बेटा हमे यहां नही आना चाहिए था।
एकांश झट से कहता है--
> अरे नही आंटी मेरा वो मतलब नही था।
चट्टान सिंह कहता है--
> अरे बेटा क्या करु वृन्दां सुबह शाम यही रहती है तो हमे भी घर पर मन नही लगता। आज वृन्दां जब घर गई तो सौचा आज रात का खाना साथ में बैठ कर खाऊगां पर ये यहां आने की जिद करने लगी कहने लगी के एकांश हॉस्पिटल मे अकेला होगा तो मुझे जाना होगा और खाना भी मैं वही पर खा लूगां।
वृन्दां एकांश को दैखकर मुस्कुराने लगती है और सरमाते हूए अपने बाल को चेहरे से हटाकर अपनी नजरे निचे कर लेती है। एकांश कहता है ---
> मैने सौचा के वृन्दां थक गई होगी इसिलिए मैनै इसे
जाने को कहा सौचा रात भर घर पर आराम करेगी तो थकान कम हो जाएगी।
एकांश की बात को वृन्दां बीच मे ही काटकर कहती है---
> अब जब मैं यहां आ गई हूँ तो हम सब अंदर चले । क्योकीं हमे खाना भी तो खानी है। मैं सबके लिए
खाना लगाती हुँ। क्योकीं मुझे बहुत भुख लगी है।
वृन्दां की बात सुनकर सभी हंसने लगया है और अंदर चला जाता है। जहां पर वृन्दां सबके लिए खाना परोस रही थी। तभी वहां पर आलोक भी आ जाता है। वृन्दां आलोक से पूछती है--
> आलोक ये गुणा और चतूर कहा पर है।
वृन्दां के इतना बोलते ही वहां पर लेकर गुणा और चतूर भी आ जाता है। और कहता है--
. हम तो यही पर है। हम कहां जा सकते है।
गुणा खाने की खुशबु सूंघकर कहता है--
> अहा ....! वाह क्या खूशबू है मटन की। खूशबु से ही मुह मे पानी आ गया।
गुणा बिरयानी को दैखकर कहता है--
> क्या बात है वृन्दा आज तो मजा आ जाएगा ।
वृन्दां सभी को खाना परोस देती है और सभी बड़े चाउ से खाने लगते है
एकांश खाना खाते हूए वृदां की और दैखता है और कहता है --
> खाना बहोत अच्छा बना है ।
एकांश को इतने प्यार से खाते दैखकर वृदां बहोत खुश हो गई थी ।
तभी खाता खाते चतूर एकांश से पूछता है--
> अरे एकांश वो का पैर ठीक हो गया क्या जो तुने
चेतन को इतनी जल्दी छुट्टी दे दी ।
एकांश चेतन के बारे में सुनकर कहता है--
> क्या तुने चेतन को दैखा पर कहां ?
चतूर कहता है --
> हां वो तो आलोक के घर तरफ ही गया ।
चतूर मुह से इतना सुनने के बाद आलोक और एकांश एक दुसरे को दैखने लग जाता है पर वहां पर चट्टान सिंह और सोनली के रहते वह दौनो कोई रियेक्सन नही देता है। चट्टान सिंह मव ही मन सौचता है--
> ये किस चेतन की बात कर रहा है कही ये अघोर
बाबा के शिष्य की बात तो नही कर रहे हैं। पर वो यहां पर क्यों आया था ? अब क्या करने जा रहा है दक्षराज । मुझे उससे पूछना पड़ेगा।
इतना बोलकर सभी खाने लगता है । और खाने के बाद चट्टान सिंह और सोनाली गाड़ी में बैठ कर वहां से चला जाता है।
इधर हॉस्पिटल में सभी एक जगह बैठकर चेतन के बारे मे ही बाते कर रहा था। तभी आलोक चतूर से पुछता है--
> चतूर तुने जिसे दैखा वो कंफर्म चेतन ही था ? और वह हवेली की और जा रहा था।
चतूर कहता है--
> हां यार वो चेतन ही था पर तुम लोग इतने घबराया हूए क्यों हो और उसे जाने क्यों दिया जबकी हमे तो उसकी पिछा करना था।
चतूर की बात सुनकर आलोक कहता है--
> हमने उसे जाने नही दिया वह यहां से भाग गया है।
चतूर हैरानी से कहता है --
> क्या भाग गया ? इसिलिए वो जल्दी जल्दी भाग रहा था ऐसी लग रहा था जैसे उसके पैर में कुछ हूआ ही नही था।
चतूर की बात सुनकर एकांश कहता है---
> तुम सही बोल रहे हो चतूर। उसके पार में कुछ हूआ नही था वो यहां पर सिर्फ किसी काम के लिए आया था। पता नही पर मुझे ऐसा लगती है के कहीं ना कही ये सब उस कुंम्भन से जुड़ा है।
आलोक कहता है--
> हां यार मुझे भी यहीं लगता है और अब चेतन ने
हवेली जाकर ये साबित भी कर दिया के ये सब एक दुसरे से मिले हूए है। अब हमे इन सबने नजर रखनी होगी ।
तभी चतूर कहता है--
> क्योना हम उस चेतन का पिछा करें। वो अभी ज्यादा दुर नही गया होगा। हवेली मे ही होगा या शायद वहा से निकलने वाला होगा।
चतुर की बात पर हामी भरते हूए आलोक कहता है--
> हां यार तुम सही कह रहे हो। हमे अब दैर नही करनी चाहिए ।
इतना बोलकर आलोक एकांश से कहता है। एकांश तुम और वृन्दां यही रूकना मैं और चतुर चेतन के पिछे जाकर दैखता हूँ ।
आलोक की बात सुनकर गुणा कहता है--
> और मैं ! मैं क्या करूगां। मैं भी तुम दौनो के साथ चलता हूँ।
आलोक गुणा की बात पर राजी हो जाता है और तीनो साथ मे बाईक लेकर दक्षराज के हवेली की और चला जाता है। रात के 11 बज रहे है। वृन्दां सभी मरीजों को दैखकर एकांश के पास आ जाती है। एकांश वृन्दां से कहता है--
> दैख लिया तुमने सारे मरीजों को ?
वृन्दां जवाब देकर कहती है---
> हा और सारे अब सो रहे हैं।
एकांश कुछ सौचकर कहता है --
> पता नही ये हॉस्पिटल कब तक बन पाएगा। कल तक तो सबको छुट्टी भी मिल जाएगी और सभी अपने
अपने घर को चले जाएगें और फिर ये हॉस्पिटल फिर से बंद हो जाएगा।
वृन्दां एकांश के कंधे पर हाथ रखकर कहता है--
> तुम चिंता मत करो ये हॉस्पिटल तो लगभग बन ही
गया है। बस कुछ इक्यूपमेंट की जरूरत है वो भी जल्दी आ जाएगें। तब तक क्यों ना हम इस हॉस्पिटल को हर हफ्ते दौ दिन खोले और गांव वालों का इलाज सुरू कर दे। इससे गांव की सेवा भी हो जाएगी और हॉस्पिटल बंद भी नही होगा।
एकाश कहता है--
> अरे हां वृन्दा ये बात तो मैने सौचा नही। ये तो बहुत
अच्छा आईडिया है इससे गांव वालो को बाहर जाना भी नही पड़ेगा।
इतना बोलकर एकांश वृन्दां को गले लगा लेता है। उधर आलोक गुणा और चतुर हवेली की और जा रहा था के तभी रास्ते मे अचानक बाईक की लाईट चली जाती है। अचानक लाईट चले जाने से सभी हैरान हो जाता है। आलोक बाईक को साइड मे रौककर कहता है--
> अरे यार इस लाइट को क्या हो गया।
To be continue.....884