दयाल मन ही मन सौचता है---
" क्यो ना इसको मालिक के लिए उठा लू ।
उस लड़की को दैखकर दयाल के मन मे भी उसके साथ संभोग करने का मन हो गया था , दयाल सौचने लगता है के क्या करे ।
दयाल उस लड़की को उपर निचे तक दैखता है , जिससे माधुरी इसकी नियत को भांप लेती है ।
दयाल :- चल बैठ गाड़ी मे तुझे छोड़ देता हूँ ।
माधुरी :- नही मैं चली जाउगीं ।
दयाल :- अरे इतनी खुबसूरत, जवान लड़की को अकेली नही जाना चाहिए । अगर तेरे साथ किसीने कुछ कर लिया तो , तु इतनी खुबसूरत है , तुझे दैख कर तो मेरा मन भी वो सब करने का मन कर रहा है , तो जरा सौच किसी और ने दैख लिया तो होगा ।
वो लड़की वही पर चुप होकर खड़ी थी । दयाल फिर कहता है --
दयाल :- सुन तुझे एक फायदे की बात बताता हूँ । आज रात तु मेरे साथ रुक जा , और फिर सुबह चली जाना । तुझे बहोत सारे पैसे मिलेगें इसके लिए ।
माधुरी :- नही मैं ऐसी लड़की नही हूँ , मुझे जाने दो ।
दयाल उसे रौक कर फिर कहता है --
दयाल :- दैख आज रात को मेरे मालिक को एक लड़की की जरुरत है , तु मेरे साथ चल उनको खुश करदे तुझे माला माल कर देगें वो , और ये बात किसीको पता भी नही चलेगी , पर उससे पहले मुझे भी तेरे साथ करना है ।
माधुरी :- तुझे सरम नही आती , ये सब बात बोलने मे । मैं सुबह ही सबको तुम और तुम्हारे मालिक दक्षराज के बारे मे बता दुगीं ।
दयाल माधुरी का हाथ पकड़ता हूए कहता है ---
दयाल :- तु यहां से बच के जाएगी तब ना बताएगी ।
इतना बोलकर दयाल उसका हाथ पकड़ लेता है , माधुरी अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करती है पर दयाल उसे अपने बाहों मे खिंच लेता है और जंगल के अंदर ले कर चला जाता है ।
माधुरी अपने आपको छुड़ाने की कोशिश करता है पर दयाल की पकड़ बहोत मजबूत था । दयाल उसे निचे गिरा देता है और उसके साथ वो सब करने लगता है । दयाल माधुरी के साथ वो सब करने के बाद उसे अपनी गाड़ी मे बैठाता है और उसे हवेली लेकर चला जाता है ।
माधुरी को अधमरी हालत मे दयाल दक्षराज के कमरे मे बेड पर सुला देता है ।
तभी इधर अचानक नीलू घायल होकर खून से लथपथ अस्पताल पहूँच जाता है। नीलू बुरी तरह से घायल था नीलु आलोक को देखता है और उसे बुलाने की कोशिस करता है पर तभी निलु वहाँ बेहोश होकर गिर जाता है। आलोक और वृंदा गिरने की आवाज सुनकर दौड़ कर जाता है तो देखता है के वहाँ पर नीलू बेहोश पड़ा था और उसके पुरे बदन पर गहरी खरोचें और घांव थे।
ऐसा लग रहा था के उसके बदन को किसी ने बेरहमी से नुकीला चाकु से खरोचा हो। जिसे देखकर आलोक घबरा जाता है। आलोक नीलू को उठा कर बिस्तर पर सुला देता है। वृंदा नीलू के घांव को देखकर हैरान हो जाती है और कहती है--
वृदां :- ये घांव .....! ये घांव इतने गहरे हैं के इसे दैख कर ऐसा लग रहा है के किसीने जानबुझकर इन्हे मारा है।
नीलू को देख कर आलोक डर जाता है उसे कुछ भी समझ में नही आता है के वो क्या करे । तभी आलोक अपना मोबाइल निकालता है और दक्षराज को फोन लगता है।
दक्षराज इधर अपनी साधना मे व्यस्त था । बार बार फोन रिंग होने के कारण दक्षराज फोन उठाता है और कहता है--
दक्षराज :- हां बेटा बोलो क्या बात है।
आलोक घबराते हुए कहता है---
आलोक :- बड़े पापा वो नीलू काका अभी अभी अस्पताल पँहूचा है और बहुत बुरी तरह से घायल है।
आलोक के मुह से निलु का नाम सुनकर दक्षराज घबरा जाता है।
दक्षराज कहता है--
दक्षराज :- क्या..? नीलू घायल है। पर क्यूं ।
इतना बोलकर दक्षराज चुप हो जाता है और सोचने लगता है--
" ये क्या हो रहा है , सब आज ही होना था इधर मेरे पास ज्यादा समय नही है अगर साधना छोड़कर उठा तो पता नही मैं कौन सा रुप ले लूगां और अगर निलू ने आलोक को सुदंरवन के बारे मे बता दिया तो आलोक इन सब का जिम्मेदार मुझे मानकर मुझे गाँव से निकाल देगा । "
दक्षराज यही सोच रहा था के आलोक की आवाज आती है--
आलोक :- हैलो... बड़े पापा आप सुन रहे हैं ना। दक्षराज घबराते हुए कहता हैं--
दक्षराज :- हां बेटा में सुन रहा हूं। पर बेटा वो वहां कैसै पँहूचा ? क्या उसने तुम्हें कुछ बताया ?
आलोक :- नहीं बड़े पापा काका यहां आते ही बेहोस हो गया है। अभी उनका इलाज चल रहा है। पर जैसे ही वो होश में आएंगे मैं उनसे ये बात जरूर पुछुगां और आपको बताउंगा । मुझे शक है के कहीं कुम्भन ने तो नीलू काका की ऐसी हालत नहीं की ?
नीलू के बेहोशी की खबर सुनकर दक्षराज थोड़ी राहत की सांस लेता है और कहता है--
दक्षराज :- ठीक है बेटा तुम लोग अपना ध्यान रखना कुछ दैर मे मैं भी आता हूं हॉस्पिटल में।
इतना बोलकर दक्षराज फोन कट देता है और अपनी साधना मे लग जाता है । दक्षराज की साधना अब पुरी हो चुकी थी दक्षराज को श्राप भी लग चुका था , दक्षराज दैखता है के उसके शरिर के घांव अब भरने लगे थे और वो अब एक जवान लड़के की तरह दिखने लगता है । दक्षराज ये दैखकर कहता है ---
दक्षराज :- हा हा .... अघोरी बाबा की जय हो । आज मैं फिर से एक जवान इंसान बन गया , पहले की तरह जानवर नही ।
दक्षराज दयाल को पुकारता है --
दक्षराज :- दयाल दयाल ।
दक्षराज के पुकारने से दयाल वहाँ पर आ जाता है। तब दक्षराज दयाल से कहता है--
दक्षराज :- दयाल हमें जल्दी से अस्पताल पहूँचना होगा । पर मैं इस हालत मे नही जा सकता । अगर मैने किसीके साथ संभोग नही किया तो ये श्राप बड़ता ही जाएगा । पहले मुझे एक लड़की चाहिए ।
दयाल :- मैने आपके लिए लड़की को आपके कमरे मे पहूँचा दिया है मालिक , आप जाओ और अपनी प्यास बुझाओ ।
दक्षराज :- तु मेरा बहोत ध्यान रखता है दयाल । इसके लिए मैं तुझे इनाम जरुर दूगां ।
इतना बोलकर दक्षराज अपने कमरे मे चला जाता है और वहां पर एक खुबसूरत लड़की को दैखकर वो मदहोस हो जाता है । दक्षराज दैखती है के लड़की बेसूध पड़ी है पर इस समय दक्षराज को ये सब सौचने का समय कहां था ।
उसे बस लड़की की प्यास थी जिसे अब दक्षराज उस लड़की के साथ पुरा कर रहा था । दक्षराज अपनी हवस को पुरा कपने मे व्यस्त था । जैसे समय बित रहा था , दक्षराज की प्यास कम होने लगी थी । सुबह होने ही वाला था और दक्षराज का शरिर अप पहले जैसा होने लगा था ।
दक्षराज और माधुरी दोनो ही पुरी तरह से निरवस्र होकर संभोग कर रहा था । और माधुरी अब बेहोश होने वाली और दक्षराज की प्यास बुझने वाला था ।
उधर हॉस्पिटल मे वृदां और आलोक अकेले इतने सारे लोगो को संभाल नही पा रहा था । वृदां और आलोक को एकांश की जरुरत थी ।
और इधर दक्षराज की प्यास अब बुझ चुका था और दक्षराज उठकर अपना कपड़ा पहनता है और कुछ छन मे दक्षराज का शरिर पहले जैसा हो जाता है ।
दक्षराज बाहर आता है और दयाल से कहता है -
दक्षराज :- दयाल गाड़ी निकालो और हॉस्पिटल चलो ।
दयाल :- हॉस्पिटल ? वो भी इस समय क्यों मालिक ?
दक्षराज दयाल को सब बोलकर सुनाता है। दयाल झट से गाड़ी निकालता है और दोनो अस्पताल की और चला जाता है। उधर वर्शाली बैहोसी की हालत में बिस्तर पर सोयी थी। एकांश भी वही वर्शाली के पास बैठा था। एकांश वर्शाली को देखते दैखते वही सो जाता है। कुछ दैर बाद वर्शाली को होश आता है तो वर्शाली देखती है के एकांश वही अपना सर रखकर सोया था।
एकांश को देख कर वर्शाली कहती है---
वर्शाली : - आप इतने अच्छे क्यों हैं एकांश जी। आपके
इसी अच्छाई के कारण से मेैं आप प्रेम करने लगी हूं एकांश जी। मेैं स्वयं को आपके होने से नहीं रोका पाई । ये आपने क्या कर दिया। मैं यहां बस हर्शाली को बचाने के लिए आई थी जिसके लिए आपकी जरूरत है आपके रक्त की जरूरत है एकांश जी। ये सोचकर मै आप से मिलती रही ताकि मै आपको अपने प्रेम मे बांध लु और आपको लगे के मै भी आपसे प्रेम करती हूँ और इसी तरह मै आपसे अपना अधुरा कार्य करा लु परंतु हर बार अपने अपने अच्छाई से मेरा मन जीत लिया है । उस दिन भी आपने मुझे ऐसे ही उन मानवो से मेरी रक्षा कि थी और आज भी आपने मेरे लिए इतनी पिड़ा सही ।
वर्शाली देखती है एकांश के हाथ में कई जगह चौट लगी थी जो वर्शाली को लाते समय जंगल के काटे दार वृक्ष से लगा था जिसमे से खून निकल रहा था। जिससे देख कर वर्शाली के आंखों से आंसू की धारा बह निकली।
वर्शाली अपनी आंखें पोंछती हूई कहती है---
अब मैं क्या करू एकांश जी मुझे अपनी बहन को भी बचाना है और आपको भी पाना है। क्योंकी अब मैं आपकी हो चुकी हूं एकांश जी । आपकी हो चुकी हूं।
To be continue....608