Shrapit ek Prem Kahaani - 39 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 39

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 39

लोगो की रोने की आने आने लगी है। दक्षराज कहता है---


दक्षराज :- चलो दयाल बाहर जा कर देखते हैं। के उस कुम्भन ने क्या किया है। 


इतना बोलकर दक्षराज और दयाल हवेली से बाहर जाने लगता है। उधर वर्शाली और एकांश सुंदरवन पँहुच जाता है । जहां से अब उन्हे आगे पेदल ही जाना था। वर्शाली गाड़ी से धीरे धीरे उतरती है। वर्शाली आगे बढ़ने की कोशिस करती है पर कमजोरी के कारण वो डगमगाने लगती है जिससे वर्शाली गिरने लगती है। एकांश वर्शाली को संभालते हुए कहता हैं--


एकांश :- तुम ठीक तो हो वर्शाली । वर्षाली हां में अपना सर हिलाती है। पर वर्शाली अपने कदम आए नहीं पढ़ा पा रही था। उसके कदम लड़खडा़ने लगता है। 


तभी एकांश वर्शाली को अपने गौद में उठा लेता है और सुंदरवन के अंदर जाने लगता है। वर्शाली एकांश को एक टक देखती रहती है। कुछ दूर जाने के बाद एकांश थक जाता है और पासिना पसिना हो जाता है। पर एकांश आगे बड़ते जा रहा था। वर्शाली बस एकांश को देखे जा रही थी। वर्शाली को एकांश की धड़कन की आवाज अब साफ साफ सुनाई दे रहा था । जो जोर जोर से धड़क रहा था। एकांश थकान के कारण से अब उसका कदम धिमी हो गई थी। पर एकांश वर्शाली को उतार भी नही सकता था क्योंकि वर्शाली बहुत कमजोर हो चुकी थी।


 एकांश वर्शाली की और देखता है। वर्शाली एकांश से लिपट कर सो रही थी। एकांश वर्शाली की मासुम चेहरा को देखते ही जा रहा था थकने के बाद भी एकांश वर्शाली का चेहरा दैखकर लड़खड़ाते कदम से आगे बड़ रहा था। एकांश वर्शाली को देख कर एक हल्की मुस्कान देता है और आगे बढ़ने लगता है। 



एकांश के चेहरे से पसीने की बड़ी बड़ी बुंदे टपकने लगा था। कुछ बुंदे वर्शाली के चेहरे पर गिरता है जिससे वर्शाली की निंद खुल जाती है तो वर्शाली देखती है के एकांश पसीने से लतपथ था। एकांश को देखकर वर्शाली सोचती है के धरती पर ऐसे भी मानव रहते हैं जो दुसरो की खुशी के लिए स्वयं कष्ट सहन करे। 


वर्शाली एकांश से कहती है--


वर्शाली :- मुझे यही उतार दिजिये एकांश जी आप बहुत थक गए हो। मैं स्वयं चलने की कोसिस करुंगी। 


एकांश :- नहीं वर्शाली तुम बहुत कमजोर हो चुकी हो। मेैं तुम्हें नहीं उतर सकता और देखो तुम्हारा घर भी नजदिक है।


 वर्शाली मुड़कर देखती है के सच में वो दोनो झरने के पास पँहुच चूका था। एकांश वर्शाली को झरने के पिछे कमरे में लेकर जाता है और बिस्तर पर सुला देता है। 



इधर आलोक दक्षराज और दयाल हवेली से बहार आता है। जहां पर गांव वाले उन्हे देखकर अपना छाती पीठ कर रोने लगता है। सभी बहोत घायल और दूखी थे। कई लोगो के सरीर पर गहरे घांव थे तो किसीने अपने को खो दिया। 



सभी दक्षराज से यही कह रहा था कि कुम्भन अब मुक्त हो चुका है। अब वो सब को मारने लगा है । सभी लोगों को देखकर आलोक मायुस हो जाता है और कहता है---


आलोक :- देखिये आप लोग डरिये मत हमने पहले भी अपनो को खोया था और आज भी खोया हूं। इस बात का मुझे बहुत दुख है। पर हम सबने मीलकर इसी दैत्य को कैद भी किया था। पर इस बार उसे कैद नही करेगे़ इस बार उस देत्य को मार देगें । जो लोग इस मेला में अपने को खोया है। उन्हे मेैं वापस तो नहीं ला सकता पर जो लोग घायल हुए हैं उनका इलाज मेैं करवाउंगा। और आप लोग मेरा साथ दिजिये ताकि हम सब मिलकर उस दैत्य को मार सके।


तभी एक गांव वाले कहता है ---

" हम उसे कैसे मार पायेगें आलोक बाबु "

आलोक :- हर किसीका कुछ ना कुछ तो कमजोरी होती ही है , और हमे उसी कमजोरी को ढुंडना है ।


 इतना बोलकर आलोक दयाल से कहता है---


आलोक :- काका आप सब को लेकर अस्पताल पहुँचिये मेैं एकांश को लेकर आता हूं। 



इतना बोलकर आलोक एकांश को फोन लगता है। पर एकांश का फोन आउट ऑफ नेटवर्क था।


अमावस्या की रात थी दक्षराज अपने हवेली मे परेशान बैठा था । तभी दयाल वहां पर आता है और दक्षराज को दैखकर कहता है ---

दयाल :- क्या हूआ मालिक आप गांव वालो को लेकर परेशान हो क्या ।


दधराज :- नही दयाल , आज अमावस की रात है । और अभी रात होने मे कुछ ही समय शेष है । तुझे तो पता है ना मुझे अपने श्राप के कारण आज पता नही किसका शिकार करना होगा । 

दयाल :- मालिक आपके पास तो अघोरी बाबा का उपाय है ना , आप उसे करके फिर से एक अच्छा शरिर पा सकते हो और फिर मैं आपके लिए एक खुबसूरत लड़की का बंदोबस्त करता हूँ ।

दक्षराज :- उसी बात की तो चितां है दयाल । कुम्भन के कारण सभी गांव वाले आज एक साथ रहेगे , घर की औरते बाहर नही निकलेगी । तो फिर मुझे लड़की मिलेगी कहां से ? और अगर मैने अघोरी बाबा का उपाय नही किया तो मैं पता नही किसके साथ संभोग कर बैठू ।


दयाल :- मालिक आप अपना काम किजिये, मैं आपके लिए लड़की लेकर आउगां ।

इतना बोलकर दयाल वहां से चला जाता है और दक्षराज अघोरी बाबा का दिया हूआ उपाय करने लगता है ।


आलोक के काई बार फोन लगाने के बाद भी एकांश का फोन नहीं लगा। तब आलोक के मन में वृंदा का ख्याल आता है और आलोक वृंदा को फोन लगता है। वृंदा फोन रिसीव करके कहती है--


वृदां :- हेलो...! हाँ आलोक बोलो। 


अलोक वृंदा को सारी बात बताता है। आलोक की बात सुनने के बाद वृंदा कहती है---


वृदां :- ठिक आलोक तुम हॉस्पिटल पँहुचो मैं इंद्रजीत अंकल से हॉस्पिटल की चाभीयां लेकर आती हूं।



 इतना बोलकर दोनो फोन कट कर देता है। आलोक और दयाल सभी को लेकर एक एक करके अस्पताल पहूँचा रहा था और फिर वृंदा सबका इलाज सुरु कर देती है। पर कुछ दवाइयां कम होने के कारण वृंदा आलोक से कहती है--


वृदां :- इन सब लोगों के इलाज के लिए और भी दवाइयों की जरुरत है जो कल सुबह तक चाहिये वरना 
इनका इलाज नहीं हो पाएगा।


 आलोक :- तुम चिंता मत करो तुम मुझे दवा का नाम लिख कर दे दो मैं आज रात तक लेकर आउंगा। 


वृंदा :- नहीं आलोक तुम नहीं जा सकते तुम्हारा यहाँ 
रहना बहुत जरुरी है मेैं अकेले़ी इतने सारे आदमियों का इलाज नहीं कर सकती और एकांश भी यहां नहीं है। 



आलोक कुछ सौचता है और फिर गुना को फोन लगाता है। उधर से गुना की आवाज आती है---


गुना :- हां भाई बोल क्या बात है। 


आलोक :- यहां हॉस्पिटल में तुम सब की जरुरत है 
यार। गांव वाले बहुत घायल है और दवा लेने मुझे शहर जाना होगा पर वृंदा यहां अकेली इतने सारे आदमियों का देखभल नहीं कर सकती इसिलिए अगर तुम और चतुर यहाँ आ जाते तो..! 



आलोक की बात सुनकर गुना कहता है--


गुना :- बस इतनी सी बात। इसमे पुछने वाली क्या बात है दोस्त मेैं और चतुर अभी आया। 


आलोक थैंक्सबोलकर फोन काट देता है।

दयाल वहां से जल्दी निकलने के लिए सोच रहा था , दयाल आलोक और गुना की बात को सुनकर कहता है --


दयाल :- ये अच्छा है आलोक बाबा इधर गांव वाले के इलाज व्यस्त रहेगें और तब मैं आराम से किसी लड़की को ढुंड कर मालिक के पास ले जाउगां ।


इतना बोलकर दयाल वहां से हवेली की और जा रहा था तो रास्ते मे दयाल दैखता है के एक लड़की अकेली अस्पताल की और आ रही थी । दयाल उसे दैखकर खुश हो जाता है और उस लड़की से कहता है --

दयाल :- अरे माधुरी तु इतनी रात को अकेली कहां जा रही है ।

माधुरी :- मेरे काका अस्पताल मे है उनके पास जा रही हूँ ।

दयाल :- पर ऐसे अकेली तुझे नही निकलना चाहिए , पता है ना कुम्भन बाहर आ गया है और फिर अकेली लड़की को तो बिलकुल नही , जमाना बहोत खराब है ।

वो लंहगा पहनी थी जिससे वो काफी सुदंर दिख रही थी , दयाल मन ही मन सौचता है---

" क्यो ना इसको मालिक के लिए उठा लू । 

उस लड़की को दैखकर दयाल के मन मे भी उसके साथ संभोग करने का मन हो गया था , दयाल सौचने लगता है के क्या करे ।

To be continue.....592