दक्षराज कहता है---
>" वो मार्ग मुझे बताइये बाबा।
अघोरी कहता है---
>" तेरे लिए दो रास्ते है दक्ष। एक जो मैंने तुझे पहले
बताया था। दूसरा तुझे दोबारा परी साधना करनी होगी और परी को अपने के जाल में फसाना होगा और इस बार तुझे उसके साथ संभोग करना होगा।
दक्षराज हैरान होकर कहता है--
>" क्या कहा बाबा आपने संभोग ?
वो भी परि के साथ। दक्षराज बाबा के बात से हैरान था क्योंकी बाबा ने अभी कहा परि के साथ संभोग करने से श्राप लगा है और बाबा अब अचानक से परि के संभोग करने को कह रहे है । अधोरी दक्षराज से कहता है---
क्या सौच रहे हो । यही ना के बाबा ये कैसी बात कर रहा है। हा हा हा हा। दक्षराज अब ये भी एक उपाय है तेरे पास मैने वहां पर स्थित एक झरने के बारे मे पता किया जो जिवन दायी है जो भी पुरूष उस झरने मे किसी ऐसी स्त्री के साथ स्नान करे जो उसे प्रेम या मन का मिलन हो तब उस झरने का जल उन दौनो के लिए अमृत बन जाता है और और वो जल सभी तरह के रोग और श्राप से मुक्ती दे सकती हैं। और जबरन करने से श्राप।
दक्षराज कहता है---
>" पर बना मुझे कैसे पता चलेगा के परी मेरे साथ प्रेम करती है।
अघोरी कहता है---
>" मूर्ख हे़ै तु दक्षराज । एक परि कभी किसी मनुष्य के साथ प्रेम नही कर सकती। संम्भोग..! तुझे परी के
साथ संभोग करनी होगी।
दक्षराज हैरानी से कहता है---
>" संम्भोग ?
अघोरी कहता है---.
>" हां दक्ष संम्भोग। क्योंकि जब तक कोई स्त्री किसी को अपना मन नहीं देता तब तक वो संम्भोग नहीं करेगी और तुझे इसी बात का फ़ायदा उठाना है। तु परि को अपने वस मै करके उसे संम्भोग के लिए उकसाना होगा और संम्भोग करते समय तुझे ध्यान रखना है के उसका ध्यान सिर्फ संम्भोग में लगा रहे और तूझे उसके साथ संम्भोग करते हुए उस जल में स्नान करना है। ताकि उसका मन तुझमे ही रहे और तू इस श्राप से मुक्त हो जाए।
दक्षराज कहता है--
>" पर बाबा एक भूल से संम्भोग किया था , जिसका परिणाम मैं अब तक भूगत रहा हूँ ?
बाबा कहता है---
>" क्योंकी उस समय तुने मेरे मना करने के बाद भी किया था , तु परी को जिस कारण के लिए बुलाओगे तुम्हें उसके अलावा और कुछ आशा नही रखना चाहिए । पर तुने मेरे चेताने के बाद भी उसके साथ संम्भोग किया , पर अब तु उसकी आराधना संभोग के लिए करेगा ।
दक्षराज कहता है---
>" पर परि ही क्यों बाबा क्या कोई मानव स्त्री के साथ स्नान नहीं कर सकता ?
अघोरी कहता है---
>" मुझे ये भी ज्ञात हुआ है दक्ष। के अगर दोनो में मन में सची प्रेम हो तो कोई भी इंसान उस झरने के जल से स्नान कर सकता है और सभी श्राप और रोग से मुक्त हो सकता है। परतुं उस झरने को ढुंडना किसी इंसान के बस की बात नहीं है। उस जगह तक केवल परी ही लेकर जा सकती है। इसिलिए तुम्हें परी साधना करके परी को बुलाना पड़ेगा और उसको अपने वश में करके उसके साथ संम्भोग करना हैं और उस झरने में स्नान करना है।
दक्षराज कहता है---
>" पर में उसे अपने वश में कैसे करू बाबा।
अघोरी कहता है---
>" तू बस साधना की तैयारी कर उसे वश में करने की विधि में तुझे बाद में बताउंगा। एक बात और दक्षराज कुम्भन को ये ज्ञात हो गया है। के सांतक मणी भी इसी गांव में है और जन्माष्टमी को परियां यहां आती है। वो भी इस मणि को प्राप्त करना चाहेगा। चाहे वो तुमसे हो या परी से। परतुं व परी साधना नहीं करेगा और ना ही वो अपनी पुत्री को उस झरने तक लेकर जाएगा क्योंकी वो झरना मुर्दो को जीवन नहीं दे सकता तो इसका अर्थ ये हुआ के , वो मणी के बारे
पता करके तुमसे छिन लेगा। उसे भी ज्ञान हो गया है के सांतक और मेघ मणी से किसी को भी श्राप मुक्त किया जा सकता है। इसिलिए दक्ष सावधान रहना। अभी उसे ये ज्ञान नहीं है के वो मणी किसके पास है और कहां है।
दक्षराज कहता है ---
>" बाबा पर उसकी बेटी को ये श्राप कौन और क्यों दिया ?
अघोरी कहता है---
>" इतना तो मुझे भी ज्ञात नहीं है। परंतु इतना जनता हू के उसके पीड़ा का कारण कोई मनुष्य ही है। जो उसकी गर्जना और रोने से पता चला था। अब तू जा और अपने कार्य में लग जा। कुम्भन तुझ तक पँहुचे उससे पहले तुम अपना कार्य कर लो। क्यूंकी जीतना समय तुम्हारे पास है उतना ही उस कुम्भन के पास भी है। अगर तुम अपने कार्य में सफल नहीं हुए तो वो देत्य अवश्यं हो जाएगा।
अघोरी के बात से दक्षराज डर जाता है अघोरी फिर कहता है---
>" डरो मत दक्षराज अभी तो बहुत कुछ करना है तुम्हें , क्योंकि अब परी भी अपना सांतक मणी ढूढं रही है। ताकि वो भी अपनी परी को जो तेरे वजह से श्रापित हुआ है उसे बचा सके और वो परी बहोत पहले से ही यहाँ आ गई है जिसका ज्ञान मुझे कल ही हुआ। अब तेरे पास ज्यादा समय नहीं है दक्षराज तू अब जल्दी जा और अपने कार्य में लग जा।
दक्षराज वहाँ से निकल जाता है और सुंदरवन से बहार आने लगता है। के तभी वहां एक भयानक आवाज सुनाई देने लगता है जिसे सुनकर दक्षराज बहुत डर जाता है। धिरे - धिरे वो भयानक आवाज उसके करिब आता है।
दक्षराज डर से एक झाड़ी में छुप जाता है। वो आवाज इतनी भयानक थी के दक्षराज थर-थर कांपने लगता है। ऐसा लग रहा था जैसे कुम्भन दक्षराज से कुछ ही दूरी पर हो। उसकी गर्जना इतनी भयानक थी के दक्षराज डर से कांप रहा था। दक्षराज मन ही मन सोचता है----
>" ये कुंम्भन ऐसे क्यों दहाड़ रहा है। बहुत वर्षो बाद उसकी ऐसी गर्जना सुनी। मुझे जल्द ही परी साधना करके इस श्राप से मुक्त होना पड़ेगा और मेघ मणी को ढुंढना पड़ेगा। वर्ना ये कुंम्भन मेरे से ये सांतक मणी भी ले लेगा और मैं हमेशा ऐसे ही रह जाऊंगा। शापित....!
जब तक ये सांतक मणी मेरे पास है। ये मुझे मेरे श्राप के प्रभाओ से बचाएगा। मैं इसे किसी भी हलत में कुम्भन को नहीं दे सकता। तभी वह भयानक आवाज आनी बंद हो जाती है।
दक्षराज कहता है----
>" लगता है कुंभन यहा से चला गया। अब मुझे जल्दी यहां से निकलना पड़ेगा।
इतना बोलकर दक्षराज वहाँ से निकलने लगता है। उधर आलोक और एकांश सभी दयाल के साथ कार में रक्षा कवच को देखने जा रहा था। आलोक के ऐसे चुप हो जाने से एकांश पुछता है---
>" तुम्हें इस बात की चिंता है के कहीं वो शिला वहा
से हटा दिया गया है।
आलोक कहता है---
>" हां एकांश।
एकांश मन ही मन सोचता है-----
>" अच्छा तो वो लाल शिला ही रक्षा कवच है।
To be continue....483