चतुर कहता है---
>" वो तो मेला में है क्योंकि हम दोनो ने उधर एक
फास्टफूड का दुकान लगाया है। वो वही पर है।
आलोक कहता है ---
>" तुझे पता नहीं के मेला में क्या चल रहा है।
चतुर कहता है---
>" हां यार फूटबॉल का मैच , क्यों तुझे पता नहीं ।
आलोक गुस्से से चतूर की और दैखता है चतुर कुछ
जवाब नहीं देता और चुपचाप एकांश के साथ चौक पर से आलोक के साथ गाड़ी में बैठ जाता है।
कुछ ही दैर में सभी मेला पँहुच जाता है। जहां पर सब का गांव वाले जोर सोर से स्वागत करता है। आलोक अपने जेब से एक पैसे की गड्डी निकाल कर एक गांव वाले के हाथ में दे देता है ताकि मेला में हो रहे फुटबॉल मैच का खर्चा गांव वाले इस पैसे से कर सके।
जो हर साल दक्षराज गांव वालो को देता आ रहा है। गांव वाले में से एक आलोक को माइक पकड़ा देता है। आलोक माइक पकड़कर कहता है---
>" इस मेला का उदघाटन हर साल मेरे बड़े पापा दक्षराज वर्मा करता है पर इस साल उनकी तबियत ठिक ना होने के कारण से वो इस बार नहीं आ पाए और मैं भी कुछ दिन से अपने काम में व्यस्त था इसिलिए मैं भी नहीं आ पाया था पर आज मैं यहां इस मेला में आया हूं और यहां पर आए हुए सभी फुटबॉल टीम को मैच के लिए बधायी देता हूं और आप लोगों से आशा करता हूं के आप सभी खेल भावना को बनाए रखेगें । कल इस मैच का फाइनल होगा और उसके साथ ही ये मेला भी पूरा हो जाएगा।
इतना बोलकर आलोक माइक को रख देता है। कुछ ही दैर मैं वहाँ पर फुटबॉल का मैच सुरु हो जाता है। आलोक एक गांव के लड़के से उन जानवरो के बारे में पुछता है। वो लड़का सभी को अपने साथ ले जाता है जहां पर जानवरो के कंकाले एकट्टी रखी थी। सभी उन कंकालो को दैख कर हैरान हो जाता है। एकांश कंकाल को देखता है और कहता है---
>" ये क्या इतने सारे जनवारो के कंकाल? वो भी इस हालत में। पर ऐसा कौन कर सकता है।
तभी गुना भी आ जाता है और कहता है---
>" ये क्या इनके हड्डियों मे तो मांस का एक टुकड़ा तक नही है ये काम तो किसी इंसान का नहीं लगता है कि क्योंकी इंसान ऐसे किसी जंवर को नहीं मार सकता जिस प्रकार इनके कंकाल की हालत है।
तभी चतुर कहता है---
>" तो फिर किसका काम हो सकता है ? क्या किसी देत्य का..!
आलोक चुपचाप हो कर कंकालो को देख रहा था। एकांश आलोक से पुछता है--
>" आलोक तुझे क्या लगता है। ये इस तरह जनवारो का शीकार कौन कर रहा है। आलोक कहता है। चल यहाँ से जल्दी। एकांश हैरानी से पुछता है। क्या हुआ यार। कहा जाना है? आलोक कहता है। वो सब तुझे बीद में बताता हूं। लेकिन अभी समय नहीं है जल्दी चलो मेरे साथ।
आलोक की बात से सभी हैरान हो जाता है के ये आलोक अचानक सब को कहां जाने के लिए बोल रहा है। आलोक उस गांव के लड़के से कहता है---
>" तुमलोग यहां मेला को संभालो मैं कुछ दैर बाद यहां आता हूं।
इतना बोलकर आलोक और सभी वहाँ से चला जाता है। सिर्फ गुना वही मेला में अपने दुकान में रुक जाता है। गाड़ी चला रहे दयाल आलोक से पुछता है---
>" आलोक बाबा कहाँ जाना है।
आलोक कहता है---
>" रक्षा कवच के पास। आप दौनो और की रक्षा कवच के पास ले कर चलो जल्दी।
दयाल कहता है ---
>" आलोक बाबा कल मालीक ने भी मुझसे इसे देखने के कहां था पर कल मैं जा नही पाया ।
आलोक के मुह से रक्षा कवच का नाम सुनकर एकांश हैरानी से पुछता है---
>" रक्षा कवच..! पर ये रक्षा कवच क्या है।
आलोक कहता है---
>" ये कवच हमारी गांव की दोनो सीमाओ में है जो काली मंदिर में रह रहे हैं साधु बाबा ने लगाए थे।
एकांश पुछता है---
>" पर रक्षा कवच क्यों और किस लिए ?
तभी चतुर कहता है---
>" कुंभन के लिए एकांश। तुझे याद है आज से करिब आठ साल पहले गांव के जानवर और इंसान इसी तरह गायब हो रहे थे। और उसका कंकाल और मानव सर हमें एक पेड़ के निचे मिलता था।
एकांश हां में अपना सर हिलाता है और कहता है---
>" हां यार याद है।
चतुर फिर कहता है---.
.>" तब तुझे ये भी पता होगा के ये काम किसका था।
एकांश कहता है---
>" ऐसा सुना तो था के ये काम कुम्भन का था। पर फिर मैं लंदन चला गया तो फिर इनसब बातों के बारें नही जान पाया ।
आलोक कहता है--
>" तेरे जाने के बाद साधु बाबा ने उसी पेड़ के निचे एक काली मां का एक शक्ति सिला रखी है जिस वजह से कुम्भन इसी सुंदरवन मे कैद हो गया और फिर कभी गांव में प्रवेश नहीं कर पा रहा था और तब से एक भी जानवर और इंसान का शिकार नहीं हुआ । इसिलिए हम उन शक्ति सिला को देखने जा रहे हैं। मुझे इस बात की चिंता है के कहीं वो रक्षा कवच वहाँ से...
इतना बोलकर आलोक चुप हो जाता है। उधर राजनगर में अघोरी बाबा का शिष्य चेतन दक्षराज से मिलने उसके हवेली आता है और उसके कान में कुछ कहता है---
जिसे सुनकर दक्षराज का चेहरा उतर जाता है और दक्षराज नीलू को अपने साथ लेकर सुंदरवन की या चला जाता है। दक्षराज की कार सुंदरवन के पास रुकती है और वो गाड़ी से उतर कर बिना कुछ कहे चेतन के साथ सुंदरवन के अंदर चला जाता है।
जिसे देख कर निलू कहता है---
>" ये मालिक को ऐसा कहा दिया चेतन ने जो मालिक इतना परेसान हो गए।
कुछ दैर बाद दोनो अघोरी बाबा के गुफा तक कुछ जाता है और दोनो ही गुफा के अंदर चला जाता है जहां पर अघोरी बाबा ध्यान में थे। दक्षराज अघोरी बाबा को प्रणाम करता है और कहता है----
>" बाबा आपने मुझे बुलाया है बाबा क्या सच में कोई और रास्ता निकला है मेरे इस श्राप से मुक्ति का?
अघोरी अपना आंखें खोलता है और कहता है---
>" हां दक्षराज। पर तुझे हर बात की बड़ी जल्दी रहती है दक्ष। मैंने तुझसे पहले भी कहा था के इतनी उतावलापन अच्छी बात नहीं है। आगर तुम उस समय मेरा बात मान लेते तो आज तुझे ये श्राप नही लगता। उस समय मैने तुझसे कहा था के तू सिर्फ परी से असीम शक्ति मांगेगा और शक्ती मिलते ही वापस आ जाओगे पर तुमने मेरी बात नहीं मानी और परी को दैखकर अपने काम उत्तेजना को सांत नही रख पाए और उसके साथ संम्भोग कर लिया । मैंने तुझे वो शक्ति सिर्फ परी को वश में करने के लिए दिया के अगर वो तुझे नुकसान पहूँचाने की कोशिश करे तो तुम उसे अपने वस में कर लेना पर तुम उसके रूप से मोहित होकर उसके साथ संम्भोग कर लिया । जिस कारन तुझे ये श्राप भोगनी पड़ रही है।
दक्षराज हाथ जोड़कर बाबा से कहता है---
बाबा मुझे माफ कर दो बाबा। मुझसे भूल हो गई। मै उसकी सुदंरता को दैखकर उस पर मोहित हो गया था । पर बाबा चेतन बता रहा था के एक रास्ता और भी है। मेरे इज श्राप से मुक्ति का।
अघोरी कहता है--
>" सही कहा है चेतन ने तुझसे।
To be continue....471
दक्षराज कहता है---
>" वो मार्ग मुझे बताइये बाबा।