अनुराधा की आवाज़ टेप रिकॉर्डर में गूंज रही थी -
"तारीख सत्रह अगस्त उन्नीस सौ निन्यानवे ।
हवेली में आते ही कुछ बदल गया है। फरज़ाना की उपस्थिति हर जगह महसूस होती है। रुख़साना की आत्मा शांत है, जैसे इंतज़ार में हो — लेकिन फरज़ाना... उसके अंदर एक अजीब विद्रोह है। मैं समझती थी, आत्माओं को तर्क से समझा जा सकता है। पर ये आत्मा... सवाल नहीं सुनती, सिर्फ़ अपने जवाब दोहराती है।”
डॉक्टर अनवर और अनुराधा ने हवेली की छत के उस हिस्से में एक छोटी सी पूजा की थी, जहाँ पुराने जमाने की टाइल्स अब भी खून के निशानों से धुंधली थीं। वहाँ ही पहली बार अनुराधा को एक फटी हुई लाल चुनरी मिली थी — और उसी के नीचे एक ताबीज़।
“ये आगाज़ ख़ान का है,” अनुराधा ने कहा था, “और ये वही रात थी, जब फरज़ाना ने आगाज़ को अंतिम बार देखा था…”
फिर अचानक अनुराधा के कही बातें डॉक्टर अनवर को याद आने लगी और वो जैसे उन्नीस सौ पैंतालिस में हवेली के उस गुप्त कक्ष की यादों में पहुँच गए जहां आगाज खान खडा था ।
अंधेरे कमरे में आगाज़ ख़ान दीवार के पास खड़ा है। सामने फरज़ाना है — चेहरे पर आँसू और होठों पर अधूरी हँसी।
“तुम्हें क्या लगा था, आगाज़?” फरज़ाना धीमे स्वर में कहती है। “तुम रुख़साना को मार दोगे… और मैं चुप रहूँगी?”
आगाज ने ने थके स्वर में कहा - “मैंने उसे नहीं मारा,”
फरजाना रहस्यमय तरीके से हसी और बोली- “पर तुम्हारी ख़ामोशी ने मारा!”
“तुम जानते थे कि वो नासिर से मोहब्बत करती है… फिर भी तुमने उसका रास्ता रोका। और अब जब उसकी रूह भटक रही है, तो तुम क्यों चुप हो?”
आगाज़ की आँखों में जलती हुई शर्म और पछतावे का धुआँ भर गया था।
“मैंने सिर्फ़ उसे खोया नहीं, खुद को भी खो दिया… मुझे सिर्फ़ रुख़साना से नहीं, तुमसे भी माफ़ी मांगनी चाहिए थी।”
फरज़ाना की आँखों से आँसू नहीं निकले — उसकी रूह काँप गई।
“पर तुमने माफ़ी नहीं माँगी… और मेरी आत्मा उसी अधूरे शब्द के इंतज़ार में जलती रही। मैं नहीं चाहती थी कि रुख़साना मरे… मैं चाहती थी कि वो ज़िंदा रहे और तुम्हें हर जन्म में तुम्हारी मोहब्बत की सज़ा देती रहे।”
डॉक्टर अनवर ने सारी बातें अपूर्व और अन्वेषा को बताते हुए डायरी का पन्ना पलटा।
“अनुराधा ने लिखा था कि फरज़ाना की आत्मा को बस एक शब्द चाहिए — जो कभी बोला नहीं गया।”
“कौन सा शब्द?” अपूर्व ने पूछा, गले में फँसी साँसों के साथ।
“माफ़ी,” डॉक्टर अनवर ने कहा। “पर ये माफ़ी सिर्फ़ एक औपचारिकता नहीं है। ये उस इंसान के हृदय से आनी चाहिए… जिसने फरज़ाना को नकारा, उसकी वफ़ा को कभी समझा ही नहीं। और वो कोई और नहीं… तुम ही हो, अपूर्व — या यूँ कहें, आगाज़ ख़ान।”
अपूर्व सन्न रह गया। उसकी उंगलियाँ अन्वेषा के हाथ को कसकर थामे थीं — जैसे कोई समय की रेखा को मुठ्ठी में पकड़े बैठा हो।
उसने कहा - “लेकिन मैं माफी मांग तो चुका हूँ ….”
डॉक्टर अनवर बोले - “वो महज एक औपचारिकता थी, अन्वेषा को बचाने के लिए ..”
अपूर्व ने पूछा - “तो मुझे... उस आत्मा से फिर माफ़ी माँगनी होगी?”
“हाँ,” डॉक्टर अनवर बोले, “सच्चे दिल से….. पर उसके लिए तुम्हें वहां जाना होगा, जहाँ फरज़ाना की आत्मा अंतिम बार रोई थी — हवेली के उत्तर-पश्चिमी गुम्बद में। अनुराधा वहीं पहुँची थी… और फिर कभी लौट नहीं सकी।”
अपूर्व ने धीमे स्वर में कहा, “और अगर मैंने माफ़ी माँग भी ली, तो क्या वो आत्मा मान जाएगी?”
डॉक्टर अनवर की नज़रें अपूर्व के भीतर झाँकती रहीं।
उन्होंने कहा - “यह आत्माएँ तुम्हारे शब्द नहीं, तुम्हारे पश्चाताप को पहचानती हैं। अगर तुम्हारा पछतावा सच्चा हुआ… तो वो तुम्हें छोड देगी। नहीं तो…”
एक झटका लगा — और हवेली की दीवारों से एक बार फिर वो चूडियों की खनक सुनाई दी।
अन्वेषा की आँखें बंद थीं — लेकिन उसकी पलकों के नीचे आंसू चमकने लगे।
डॉक्टर अनवर ने कहा, “अब समय आ गया है — उस पन्ने को पूरा करने का… उस कहानी को मुकम्मल करने का जो अधूरी रही। तुम्हारे लिए, तुम्हारी माँ के लिए… और उस आत्मा के लिए, जो बस एक शब्द के इंतज़ार में मरी भी नहीं।”
शाम के धुंधलके में अपूर्व अन्वेषा और डॉक्टर अनवर के साथ हवेली के उसी गुम्बद पर पहुंचा, जिसका जिक्र डॉक्टर अनवर ने किया था।
हवेली के सबसे दूर और ऊँचे हिस्से की सीढियां दीमकों से खाए लकडी की तरह चरमरा रही थी, बारिश अब धीमी हो चली थी, लेकिन भीतर की नमी हवा में बर्फ़ जैसी जम गई थी।
डॉक्टर अनवर की मोमबत्ती थरथरा रही थी।
अन्वेषा, जो अब चुप थी, पर डरी नहीं थी — बल्कि उसके चेहरे पर अजीब सी शान्ति थी।
“यही है वो जगह,” डॉक्टर अनवर बोले, “जहाँ अनुराधा की आवाज़ आख़िरी बार रिकॉर्ड हुई थी...”
और उन्होंने साथ लाए हुए टेप रिकार्डर को ऑन कर दिया -
"तारीख — अठारह अगस्त उन्नीस सौ निन्यानवे
समय — रात के तीन बजकर चार मिनिट
मैं अब इस आत्मा के सामने खडी हूँ। मैंने आज फरज़ाना को देख लिया है। नहीं, सिर्फ़ महसूस नहीं किया — सच में देखा। वो वही है — वैसी ही, जैसी रुख़साना की मौत के अगले दिन थी। पर अब उसकी आँखों में आँसू नहीं, अंगार हैं।"
गुम्बद के ठीक नीचे एक दरार थी, जिसके पास बैठकर अनुराधा ने तांत्रिक विधि से संवाद शुरू किया था।
अनुराधा ने पूछा - "तुम अब भी क्यों रुकी हो, फरज़ाना?"
एक औरत की धीमी, काँपती हुई आवाज़ गूँजी —
"क्योंकि उसने कभी माफ़ी नहीं माँगी।"
तभी अनुराधा ने सामने दीवार पर कुछ लिखा हुआ देखा — एक शब्द, खून से लिखा:
"ताजिर-ए-मौत"
…..जो मोहब्बत बेच दे, उसे ज़िंदा रहने का हक़ नहीं
और फिर — अचानक — दीवार से बाहर निकला चेहरा।
फरज़ाना।
वो ही आँखें, वो ही हरी चुनरी, वही माथे पर अटका चाँद —
पर चेहरा अब प्यार नहीं, प्रतिशोध का प्रतीक बन चुका था।
फरजाना ने पूछा - "अनुराधा, तुम आगाज़ की माँ हो?"
अनुराधा ने जवाब दिया - “मैं… मैं उसकी माँ नहीं। मैं उसकी मदद करना चाहती हूँ।”
फरजाना की आवाज गूंजी - “तब उसे यहाँ लाओ। माफ़ी इसी जगह माँगनी होगी। जहां उसने हमें तोडा था…”
…..और फिर टेप रिकॉर्डर बंद हो गया ।
अपूर्व ने हैरानी से डॉक्टर अनवर की तरफ देखा और पूछा - “माँ यहीं थीं?”
डॉक्टर अनवर ने धीरे से सिर हिलाया और कहा -
“और उन्होंने तुमसे पहले आगाज़ को पहचान लिया था… उनकी डायरी के मुताबिक, उन्होंने यही कहा था — 'अगर आत्मा को शांति चाहिए, तो अधूरी मोहब्बत को स्वीकार करना होगा।'"
अपूर्व ने धीरे-धीरे आँखें बंद कीं।
अन्वेषा अब उसकी तरफ़ नहीं देख रही थी। वो दीवार के कोने में बैठी थी — जहाँ एक पुराना, काले धागे से बँधा ताबीज़ रखा था।
अन्वेषा ने पूछा - “ये क्या है?”
“तुम्हारा ही है,” डॉक्टर अनवर बोले, “या कहो… रुख़साना का। आगाज़ ने मरते समय तुम्हें ये लौटाना चाहा था, लेकिन…”
उनकी आवाज़ बुझ गई।
अपूर्व ताबीज़ को उठाकर खडा हो गया ।
“फरज़ाना,” उसने कहा, “अगर तुम यहाँ हो… तो सुनो।
मैं जानता हूँ, मैं आगाज़ था…
मैं जानता हूँ, मैंने तुमसे वो माफ़ी कभी नहीं माँगी,
क्योंकि मेरे भीतर वो साहस ही नहीं था।
पर आज… मैं तुम्हें देखे बिना हाथ जोडता हूँ —
मुझे माफ़ कर दो।”
तभी वहां सन्नाटा फ़ैल गया ।
फिर… हवा में जैसे पायल की एक अधूरी ध्वनि गूँजी।
तभी… दीवार से वो ही आवाज़ आई —
“अगर माफ़ी सच्ची है, तो एक प्रश्न का उत्तर दो…”