अपूर्व ज़ोर से चीखा। उसकी चेतना जैसे दो युगों के बीच फट गई थी। अब वो सिर्फ़ अपूर्व नहीं था — वो आगाज़ बन गया था। एक साथ दो समयरेखाओं का बोझ उसके दिल पर उतर चुका था।
अचानक दीवार के पीछे से आवाज़ आई — एक औरत स्वर, धीमा और थरथराता हुआ।
“अगर तुम इस तक पहुँचे, तो जानो… मेरी मौत सिर्फ़ हादसा नहीं थी…”
अपूर्व अपनी माँ की आवाज सुनकर सिहर गया।
“मैंने तुम्हें बचाने के लिए वो सच छुपा लिया, जो आज भी हवेली की नींवों में छुपा है। फरज़ाना... सिर्फ़ रुख़साना की क़ातिल नहीं थी। मेरी मौत भी उसी की वजह से हुई थी।”
आवाज़ धीमे-धीमे मिटने लगी, लेकिन अब अपूर्व की आँखों में आँसू नहीं थे — केवल आग थी।
और अचानक ही पीछे खड़ी अन्वेषा, अब पूरी तरह रुख़साना जैसी लग रही थी। उसकी आँखें, उसकी चाल, और उसकी उपस्थिति… अपूर्व ने धीरे से उसका हाथ पकडा और कहा - “तुम्हें एक बार फिर खोने नहीं दूँगा…”
रुख़साना की आत्मा ने धीमी आवाज में कहा —
“फरज़ाना अब भी यहीं है… उसे हर जन्म में किसी न किसी की मोहब्बत से नफ़रत रही है। उसने मुझे मारा, तुम्हारी माँ को मारा… और अब तुम्हें भी रोकेगी…”
एक कोने से अचानक तेज़ हवा चली — और धुंए से एक परछाई उभरी। उसका चेहरा झुलसा हुआ था, और आँखों में सिर्फ़ बदला।
“तुम फिर लौटे अगाज़? क्या इस बार भी मोहब्बत का नकाब पहनोगे?”
अपूर्व आगे बढा । लेकिन अब उसकी आँखों में डर नहीं था, वो बोला -
“नहीं फरज़ाना, इस बार मैं अपनी मोहब्बत को जला कर राख नहीं बनने दूँगा।”
हवेली की दीवारें गूंजने लगीं। आईना चटक उठा, और तहख़ाने के बाहर की दीवार में एक दरवाज़ा धीरे-धीरे खुलने लगा — अचानक ही पीछे की दीवारों से आईना चटककर गिर पड़ा — और हवेली में एक अद्भुत शांति फैल गई।
पहली बार, हवेली ने किसी को जाने दिया था…
पर क्या यह अंत था?
बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी। हवेली की घंटी बजी —
एक धीमी, ठहरी हुई आवाज़…
मानो वक्त खुद दरवाज़े पर खडा हो।
अपूर्व ने दरवाज़ा खोला।
सामने खडा था एक अजनबी —
लंबा कद, चेहरे पर हल्की दाढी , गहरे भूरे कोट में भीगे बाल,
और हाथ में चमडे का पुराना सूटकेस।
“मैं डॉक्टर अनवर अली हूँ,”
उसने कहा, “और शायद… मैं देर से नहीं आया।”
अपूर्व ने हैरानी से उस अजनबी को देखा ।
उसने पूछा - “आप कौन?”
“आपको कैसे पता कि हम…”
डॉक्टर अनवर ने बिना उत्तर दिए धीरे से सूटकेस ज़मीन पर रखा।
और जवाब दिया - “ये हवेली मुझे खींच लाई है — जैसे वो तुम्हारी माँ को लाई थी।
अनुराधा … मैं उन्हें जानता था। बल्कि… मैं उनके आखिरी अधूरे शोध में सहयोगी था।”
अन्वेषा चुपचाप पीछे खडी थी, अपूर्व का हाथ पकडे हुए।
डॉक्टर अनवर ने सूटकेस खोला —
अंदर एक मोटी, काली डायरी, कुछ फीके नक्शे और एक पीतल की घंटी थी।
डायरी पर एक नाम लिखा था —
“केस फाइल नम्बर सत्तावीस – फरजाना”
उस डायरी को हाथ में लेते ही अपूर्व ने धीरे से कहा - “ये तो मेरी माँ की लिखावट है…”
डॉक्टर अनवर ने सिर हिलाया और कहा —
“तुम्हारी माँ सिर्फ़ रूहों को नहीं समझती थीं… वो उन्हें मुक्त करने की राहें खोजती थीं।
पर एक आत्मा… वो नहीं मान रही थी — फरज़ाना।”
अपूर्व ने पूछा - “क्या… ये वही फरज़ाना है जिसने…”
अपूर्व की आवाज़ भर्रा गई।
“हाँ,” अनवर ने कहा, “जिसने तुम्हारी माँ को… सीढियों से नहीं, बल्कि अंधे अतीत से धकेला था।”
डॉक्टर अनवर ने डायरी का आख़री पन्ना पलटा —
और सब चौंक गए —
पन्ना अधूरा था, बीच से फटा हुआ।
उन्होंने कहा - “ये पन्ना अनुराधा की मौत के बाद गायब हो गया,”
“पर इसका गायब होना एक इत्तेफ़ाक नहीं था —
बल्कि आत्मा का सुराग मिटाना था।”
तभी अन्वेषा ने पुछा - “क्या अब भी इसे हासिल किया जा सकता है?”
“शायद,” अनवर बोला, “क्योंकि हवेली हर रहस्य को तभी बाहर करती है… जब अगला सच उसके दरवाज़े पर दस्तक देता है।”
तभी वहां एक अजीब सन्नाटा फैल गया।
पीछे से हवेली की छत से एक धीमी आवाज़ आई —
जैसे कोई नन्हें-नन्हें क़दमों से चल रहा हो…
चूडियो की खनक, और कोई पायल सी थिरकती धुन।
अपूर्व ने ऊपर देखा —
वहीं, छत पर एक लड़की खडी थी, बहुत दूर…
और उसके हाथ में एक फटा हुआ काग़ज़।
पर उसकी परछाईं… इंसानी नहीं थी।
डॉक्टर अनवर ने कहा —
“अगर वो पन्ना उसके पास है… तो फरज़ाना अब फिर से जाग रही है।”
अन्वेषा ने काँपती आवाज़ में पूछा -
“क्या वो जिन्दा है ?”
“नहीं,” डॉ. अनवर बोले, “पर वो मरी हुई भी नहीं है।
वो इंतज़ार कर रही है — उस आख़री ‘शब्द’ का, जिसे आगाज़ ख़ान ने कभी कहा ही नहीं।”
अपूर्व की साँसें तेज़ थीं, उसकी मुट्ठियाँ कस चुकी थीं। ऊपर हवेली की छत पर खडी वो परछाईं — लडकी की शक्ल में, पर आंखों में एक बुझा हुआ आकाश — अपूर्व जान गया था, ये कोई सपना नहीं… फरज़ाना लौट चुकी थी।
डॉक्टर अनवर ने धीमे स्वर में कहा, “अगर वो पन्ना उसके पास है, तो वह अब अंतिम मोड़ की तैयारी कर रही है। उसे अधूरा पन्ना नहीं चाहिए… उसे चाहिए तुम्हारी जुबान से निकला वो अंतिम शब्द, जो उसके अतीत को मुकम्मल कर दे।”
अपूर्व ने अन्वेषा की ओर देखा — अब वो पूरी तरह होश में थी, लेकिन उसकी आँखों में एक गहराई थी जो किसी आम इंसान की नहीं हो सकती थी। वहाँ रुख़साना बोल रही थी, चुपचाप।
डॉक्टर अनवर ने पूछा - “क्या तुम याद कर सकते हो वो शब्द?”
अपूर्व ने खुद से एक सवाल किया — क्या वाकई मैं ही आगाज़ था?
और फिर जैसे किसी छुपे हुए बंद कमरे की कुंडी खुल गई।
“मैंने कभी माफ़ी नहीं मांगी…” उसने बुदबुदाते हुए कहा, “मैंने रुख़साना से माफ़ी नहीं मांगी थी… और न ही फरज़ाना से।”
डॉक्टर अनवर ने सिर झुकाया, “इसीलिए फरज़ाना अब भी भटकी हुई है — उसके हिस्से की माफ़ी… किसी ने कभी नहीं माँगी।”
अचानक —
हवेली की छत पर तेज़ रोशनी चमकी।
फरज़ाना की परछाईं अब और भी साफ़ थी। धीरे धीरे वो लडकी एक औरत में बदलने लगी जिसका चेहरा अधजला, आँखों में एक रहस्यमयी चमक — मानो अब वह अपनी कहानी ख़ुद कहेगी।
“माफ़ी?” उसकी फटी-फूटी आवाज़ हवेली में गूंजी, “मुझे मौत दी गई — बिना कसूर… और आज तुम चाहते हो कि मैं बस एक शब्द से मिट जाऊँ?”
डॉक्टर अनवर ने घंटी उठाई — पीतल की वह घंटी, जो आत्मा की उपस्थिति को साधने के लिए बनाई गई थी।
“अगर वो पूरी तरह जीवित नहीं है, तो यह घंटी उसे बाँध सकती है। लेकिन…”
अपूर्व ने पूछा- “लेकिन क्या?”
“लेकिन कोई उसे पुकारेगा तो वो बंद भी हो सकती है — और फटे हुए पन्ने से उसकी आखिरी इच्छा पूरी होने पर वो फिर से मुक्त हो जाएगी।”
इसी बीच —
अन्वेषा की आँखें एक बार फिर बंद हुईं। और जब उसने उन्हें खोला, तो रुख़साना नहीं, कोई और बोल रही थी।
“मैं फरज़ाना हूँ…”
वो आवाज़ — जो कभी हवेली की दीवारों से टकराती थी, अब अन्वेषा की देह में उतर आई थी।
डॉक्टर अनवर ने तुरंत सूटकेस से एक शीशे की बोतल निकाली — उसमें गाढा लाल पानी था।
“ये आखिरी सुरक्षा है — अगर फरज़ाना का नियंत्रण अन्वेषा पर पूरी तरह हो जाए, तो इसे पिलाना होगा।”
“नहीं,” अपूर्व ने कहा, “इस बार मैं इसे बातों से रोकूँगा — जैसे माँ ने कोशिश की थी… लेकिन मैं अधूरा नहीं छोडूंगा।”
अपूर्व ने अन्वेषा की ओर देखा — जो अब फरज़ाना थी।
“फरज़ाना,” उसने सख्त आवाज में कहा, “मैं तुमसे माफ़ी माँगता हूँ। आगाज़ की ओर से… जिसने तुम्हें समझने की जगह इस्तेमाल किया। तुम्हें धोखा दिया… और तुम्हारी मौत का तमाशा बन गया।”
एक पल के लिए हवेली पूरी तरह शांत हो गई।
अन्वेषा का शरीर कांपने लगा, जिसे अभी फरज़ाना की रूह ने कैद किया हुआ था।
अपूर्व ने पूछा - “तुम्हें माफ़ी चाहिए?”
अन्वेषा की भारी आवाज गूंजी - “तो सुनो… मुझे सिर्फ़ माफ़ी नहीं चाहिए… मुझे वो नाम चाहिए… जो आगाज़ ने आख़िरी बार रुख़साना को पुकारा था।”
डॉक्टर अनवर चौंक गए, उन्होंने पूछा - “नाम?”
“हाँ,” फरज़ाना बोली, “वो आख़िरी नाम… आगाज़ ने रुख़साना को किस नाम से पुकारा था? जिस नाम में प्यार नहीं, केवल मालिकपना था — और वो नाम ही मेरी रूह को जला गया था।”
अपूर्व की स्मृति जागी।
वो दृश्य… आगाज़ के कक्ष में… रुख़साना रो रही थी… और आगाज़ चीख रहा था —
“मेरी रुक़ैया बन जा!”
नहीं रुख़साना… रुक़ैया… फरज़ाना का असली नाम था।
रुख़साना ने उसे उसी पल के बाद छोडा था… क्योंकि आगाज़ ने गलती से रुखसाना को अपनी बेगम के नाम से पुकारा था जो फरजाना की बेटी थी — वो पल , जिसने तीन ज़िंदगियाँ तबाह कर दी थीं।
“रुक़ैया…” अपूर्व ने धीरे से कहा।
हवेली हिल गई।
दरवाज़े खुले… और फरज़ाना की परछाईं चीख उठी —
“तुमने… याद रखा…”
वो चीख़ अब एक सिसकी में बदल गई।
फरज़ाना की आत्मा की पकड अन्वेषा से छूटने लगी।
अन्वेषा बेहोश होकर अपूर्व की बाँहों में गिर पड़ी।
और डॉक्टर अनवर ने घंटी बजाई — तीन बार।
और हवेली में एक अदृश्य धुंआ छाया… फिर सब थम गया।
कुछ देर बाद —
अन्वेषा अपूर्व के पास बैठी थी। अब वह होश में थी, और पूरी तरह से वापस।
डॉक्टर अनवर ने सूटकेस में डायरी रख दी।
अपूर्व ने पूछा - “क्या अब सब ख़त्म हो गया?”
डॉक्टर अनवर मुस्कुराए — “रूहें कभी पूरी तरह जाती नहीं… लेकिन अब वो इस हवेली से बंधी नहीं रहीं।
तुमने वो शब्द कहे… जो एक आत्मा सौ सालों से सुनना चाहती थी।”
“और मेरी माँ?” अपूर्व की आवाज़ भर्राई।
डॉक्टर अनवर ने कहा, “उसे तुम्हारा इन्तजार है।”
बाहर धूप निकल आई थी।
हवेली पहली बार — शांत थी।
सिर्फ़ शांत नहीं — खाली भी।
पर जब अपूर्व बाहर निकला…
हवेली की छत पर एक आख़िरी परछाईं अब भी देखी जा सकती थी।
और वो धीरे-धीरे दूर जा रही थी… जैसे कह रही हो —
"ये अंत नहीं… केवल विराम है।"
अगली सुबह -
बरसात धीमी-धीमी खिडकी से टकरा रही थी। हवेली की दीवारें अब शांत थीं — लेकिन भीतर एक असहनीय खिंचाव अब भी बना हुआ था।
डॉक्टर अनवर अली ने मोमबत्ती की लौ के पास डायरी खोली। उसके पन्ने पीले और नमी से सिकुडे हुए थे, लेकिन हर शब्द मानो जीता-जागता था।
“ये फाइल मैंने तुम्हारी माँ के साथ मिलकर तैयार की थी,” उन्होंने कहा। “लेकिन जब अनुराधा की मौत हुई, इस फाइल का एक हिस्सा भी उसी रात गायब हो गया। तब तक हमें ये नहीं पता था कि फरज़ाना सिर्फ़ एक आत्मा नहीं, एक अनकहा वजूद बन चुकी थी — जो अब भी अधूरे शब्दों का इंतज़ार कर रही है।”
डायरी की पहली लाइन पर स्याही अब भी गीली जैसी लग रही थी।
और अचानक ही डॉक्टर अनवर जैसे अतीत में चले गए।
उन्नीस सौ निन्यानवे की यादे जैसे उनके जेहन को कुरेद रही थी।