हवेली की दीवारें कंपकपाती हुईं चुप हो चुकी थीं। अपूर्व के सामने वह दरार अब धीरे-धीरे एक दरवाजे में बदल रही थी। सामने अंधकार की एक सुरंग सी खुल गई — परंतु भय नहीं था, बल्कि कोई मधुर संगीत वहाँ से बहकर आ रहा था।
“बेख़ुदी में खोया दिल…”
उसने अन्वेषा की हथेली थामी, उसकी आँखें अब भी बंद थीं, मगर उसका चेहरा अब शांत था — जैसे किसी स्मृति में डूबा हो।
अपूर्व ने आगे कदम बढ़ाया।
अंदर अंधकार नहीं, बल्कि एक अलग ही संसार था —
उन्नीस सौ चालीस का वो कमरा जीवित हो उठा था। मोमबत्तियों की मंद रौशनी, इत्र की भीनी ख़ुशबू, और रेशमी पर्दों से सजा कक्ष। सामने रुख़साना बैठी थी — गुलाबी सलवार-कुर्ता, माथे पर झुकी बिंदिया, हाथों में कंगन।
और उसके सामने — नासिर। सादा सफेद कुर्ता, आंखों में रौशनी, और होठों पर वो अधूरा गीत।
“तुम्हें पता है, नासिर?” रुख़साना बोली, “अगर ये वक़्त यहीं ठहर जाए तो मैं कभी कोई शिकायत नहीं करूँगी।”
नासिर ने मुस्कुरा कर उसका हाथ थामा।
“शिकायत तो मुझे करनी है… रब से। इतनी मोहब्बत क्यों दी, अगर मुक़म्मल नहीं करनी थी?”
अपूर्व उस दृश्य को सांस रोके देखता रहा। उसकी आंखों से आँसू बहने लगे — ये प्रेम, ये विरह, ये नियति का मज़ाक… और अब वह जान चुका था — ये सब सिर्फ एक कहानी नहीं, उसका अतीत था… उसका अपना अतीत।
रुख़साना और नासिर की वो आखिरी रात थी… और अपूर्व उसका गुमनाम गवाह ।
तभी उसे एक झटका लगा — और वह दृश्य टूटने लगा। हवेली की दीवारें वापस दिखाई देने लगी , संगीत बंद हो गया। अन्वेषा बेहोश थी, पर अब उसकी साँसें सामान्य थीं।
अपूर्व ने उसे बाहों में उठाया और ऊपर की ओर चल पडा । तभी सामने दरवाज़े पर वो ही परछाई उसे दिखाई दी ….ज़हेरा बेग़म की । उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन आवाज़ में वही रहस्यमयी भारीपन ।
उसने कहा - “तुमने देख लिया, ना?”
“हाँ…” अपूर्व ने थकी आवाज़ में कहा, “पर मेरी माँ इसमें कहाँ थी?”
ज़हेरा धीरे-धीरे पास आईं। “तुम्हारी माँ… वो सिर्फ इस हवेली की मालकिन बन कर नहीं आई थी ।”
अपूर्व ठिठक गया।
जाहेर ने आगे कहा - “वो रुख़साना की मौत के सौ साल बाद यहाँ आई थी — लेकिन तभी से कुछ बदलने लगा था। हवेली फिर से जाग उठी थी। रुख़साना की आत्मा को एक नया माध्यम चाहिए था… और तुम्हारी माँ अनुराधा वो माध्यम बन गई।”
अपूर्व ने शंका जताते हुए कहा - “मुझे तो हमेशा लगा, माँ कुछ छिपाती थीं…”
“वो तुम्हें बचा रही थीं,” ज़हेरा बोलीं, “लेकिन असल राज़ अभी बाकी है।”
ज़हेरा ने अपूर्व को धीरे से कहा -
“जिस दिन तुम्हारी माँ की मौत हुई… लोगों ने कहा था कि वो सीढियो से गिर गईं… लेकिन वो सच नहीं था।”
ये सब सुनकर अपूर्व का दिल बैठने लगा।
“मैं वहाँ थी… मैंने देखा था। उस रात हवेली में किसी और की भी मौजूदगी थी। और वो कोई इंसान नहीं था।”
अपूर्व ने चौंकते हुए पुछा - “कौन?”
ज़हेरा ने गहरी साँस ली और कहा - “वो फरज़ाना की आत्मा थी… जो अब तक हवेली की दीवारों में कैद थी।”
अपूर्व बोला - “पर फरज़ाना तो…”
जहेरा अपूर्व के कहने का मतलब समझते हुए बोली - “हाँ, मर चुकी थी। लेकिन मरते समय उसमें जो नफ़रत थी, वो मर नहीं पाई।”
अपूर्व हैरान था और उसके शब्द दूट रहे थे - “तो उसने मेरी माँ को…”
जहेरा आगे बोली - “धक्का दिया। सीढ़ियों से। तुम्हारी माँ उस रात रुख़साना की आत्मा को मुक्ति देने का एक अंतिम प्रयास कर रही थी — लेकिन फरज़ाना ने उसे रोक दिया।”
अपूर्व की आँखों में अब आँसू नहीं थे। सिर्फ़ चुप्पी।
उसने ज़हेरा की ओर देखा और पूछा — “अगर रुख़साना की आत्मा अब भी अन्वेषा के भीतर है, तो क्या मैं… उसे मुक्त कर सकता हूँ?”
“हाँ,” ज़हेरा बोलीं, “लेकिन इसके लिए तुम्हें उस अंतिम दरवाज़े से गुजरना होगा… जो तहख़ाने से भी नीचे है।”
“वहाँ क्या है?”
अपूर्व के पूछने पर जहेरा ने जवाब दिया - “तुम्हारी माँ की अंतिम साँस… और एक अधूरी माफ़ी।”
अब हवेली में कुछ बदलने लगा था।
दीवारें साँस ले रही थीं। ज़मीन थरथराई। और तहख़ाने की ज़मीन एक बार फिर खिसकने लगी।
एक और सुरंग — और एक आख़िरी दरवाज़ा सामने प्रकट हुआ।
ज़हेरा ने कहा, “यह है अंतिम दरवाज़ा — जहाँ तुम्हारी माँ की आख़िरी चीख़ अब भी गूंजती है… जहाँ वो अधूरी माफ़ी कैद है… जो किसी ने कभी नहीं मांगी।”
अपूर्व ने आगे बढते हुए दरवाज़े को छूआ। लोहे का था, लेकिन स्पर्श करते ही ठंडी हवा का झोंका उसके भीतर समा गया।
"इस बार मैं तुम्हें छोड़ कर नहीं जाऊँगा, माँ…" अपूर्व बुदबुदाया ।
उसके पीछे अन्वेषा अब होश में थी… उसकी आँखें खुलीं, और वह बुदबुदाई —
"आगाज़…"
अपूर्व डर मगर तभी ज़हेरा बेग़म की बातों के बाद हवेली का तहख़ाना जैसे किसी अनकहे बुलावे की तरह खुल गया था। अपूर्व की उंगलियाँ कंपकपाती हुई उस दरवाज़े पर गईं, जहाँ बरसों से कोई गया नहीं था। जैसे ही दरवाज़ा खुला, सीलन भरी एक पुरानी खुशबू और हवा की एक ठंडी लहर उसे अतीत की गहराइयों में खींच ले गई।
नीचे उतरती सीढ़ियाँ… हर कदम के साथ जैसे अंधकार बढता ही जा रहा था। दीवारें फुसफुसा रही थीं, जैसे वो किसी कहानी को दोहराना चाहती हों।
कमरे के बीचोंबीच एक बडा सा पुराना आईना था। उस पर धुंध फैली थी, लेकिन जैसे ही अपूर्व ने उसके पास कदम रखा, उसमें कुछ दिखाई देने लगा … और फिर यादें उभरने लगीं।
लेकिन ये केवल दृश्य नहीं थे — ये उसकी अपनी स्मृतियाँ थीं।
वो खुद को देख रहा था — आगाज़ ख़ान के रूप में। वही तेज चाल, वही नज़रों में हुक़ूमत और मोहब्बत दोनों का ताप। और सामने — रुख़साना, एक नाज़ुक, सुंदर और बग़ावती आत्मा… जिसकी आँखों में नासिर के लिए बेपनाह प्यार था।
“तुमने मेरा नासिर छीन लिया आगाज़…”
रुख़साना कह रही थी, और उसकी आवाज़ में मोहब्बत से ज़्यादा शिकवा था।
“क्योंकि मैं तुमसे मोहब्बत करता था…”
अगाज़ के स्वर में पछतावा था।
“फिर भी तुमने मुझे खो दिया… और खुद को भी।”
वो दृश्य ठहर गए — लेकिन अपूर्व के भीतर कुछ चटकने लगा। यादों की बर्फ़ीली लहरें उसकी रूह में उतरने लगीं — नासिर का खून, रुख़साना की चीख़ें, और आगाज़ की मौन टूटन।
अपूर्व चीखा - “मैं ही था… मैं ही अगाज़ हूँ… जिसने मोहब्बत को स्वार्थ में डुबोकर सब कुछ गंवा दिया…”