Kaali Kitaab - 7 in Gujarati Horror Stories by Rakesh books and stories PDF | काली किताब - 7

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काली किताब - 7

वरुण के हाथ काँप रहे थे, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा और काली किताब के पास पहुँचा। जैसे ही उसने उसे छूने की कोशिश की, एक ज़ोरदार झटका लगा और उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। जब उसने आँखें खोलीं, तो वह किसी और ही जगह पर था। यह हवेली का कोई पुराना कक्ष था, जहाँ दीवारों पर जली हुई तस्वीरें टंगी थीं और फर्श पर धूल की मोटी परत जमी थी।  

एक परछाईं सामने उभरी—वही आत्मा। लेकिन अब उसके चेहरे पर गहरी पीड़ा के निशान थे। उसने धीमे स्वर में कहा, "वरुण, मैं तुम्हें सब सच बताने आया हूँ।" आत्मा की आवाज़ में दर्द था। "सदियों पहले, इस हवेली में एक भयानक अनुष्ठान हुआ था। यह अनुष्ठान मुझे कैद करने के लिए किया गया था, लेकिन मैं अकेला नहीं था। एक और आत्मा थी, जो अब भी इस हवेली में बंधी हुई है—और वह मुझसे कहीं अधिक शक्तिशाली और खतरनाक है।"  

वरुण का शरीर सुन्न पड़ गया। उसने सोचा था कि यह सब खत्म हो गया है, लेकिन असली रहस्य तो अभी सामने आ रहा था। आत्मा ने आगे कहा, "जब तूने मुझे मुक्त किया, तो हवेली की असली शक्ति जाग गई। अब वह तेरी आत्मा को अपने वश में करने की कोशिश करेगी।"  

अचानक, हवेली की दीवारों में कंपन होने लगा। हवा में कुछ अजीब सा महसूस हुआ, मानो कोई अदृश्य शक्ति वहाँ मौजूद हो। किताब अब भी हवा में तैर रही थी, और उसके पन्ने तेज़ी से पलट रहे थे, जैसे कोई उसमें से कुछ खोज रहा हो। वरुण को एहसास हुआ कि अगर उसने जल्द ही कुछ नहीं किया, तो वह हमेशा के लिए इस हवेली में फँस जाएगा।  

उसने आत्मा की ओर देखा, "मुझे क्या करना होगा?"  

आत्मा ने एक गहरी सांस ली और कहा, "हवेली के नीचे एक और कक्ष है, जहाँ असली श्राप बंधा हुआ है। वहाँ जाने का एक ही रास्ता है—तुझे इस किताब में लिखे अंतिम मंत्र को पढ़ना होगा। लेकिन याद रख, यह आसान नहीं होगा। अगर तेरा मन डगमगाया, तो यह हवेली तुझे कभी जाने नहीं देगी।"  

वरुण ने काली किताब के पन्ने खोले और मंत्र पढ़ना शुरू किया। जैसे ही उसने पहला शब्द उच्चारित किया, हवेली की दीवारों में दरारें पड़ने लगीं, हवा में बिजली सी दौड़ने लगी। अचानक, फर्श हिल गया और वह नीचे गिरने लगा।  

जब उसकी आँखें खुलीं, तो वह एक विशाल कक्ष में था। वहाँ चारों ओर अजीब-अजीब प्रतीक खुदे हुए थे, और बीच में एक पत्थर का तख्त था, जिस पर किसी की परछाईं बैठी थी। यह कोई और नहीं, बल्कि उस शक्ति का स्रोत था, जिसने हवेली को अपने वश में कर रखा था।  

"तूने मुझे जगाया है, वरुण," एक भारी आवाज़ गूँजी। "अब देख, तू इस खेल का हिस्सा बन चुका है।"  

वरुण का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसे अब इस श्राप को खत्म करना ही था, चाहे इसकी कीमत कुछ भी हो।

वरुण की साँसें तेज़ हो गईं। उसकी आँखों के सामने बैठी परछाईं धीरे-धीरे आकार लेने लगी। अब वह एक स्पष्ट रूप में बदल रही थी—एक काली छाया, जिसकी आँखें जलती हुई अंगारों जैसी चमक रही थीं। हवेली की दीवारों पर साये नाचने लगे, जैसे कोई प्राचीन शक्ति जाग चुकी हो।  

"तूने मुझे मुक्त किया, लेकिन अब तुझे इसकी कीमत चुकानी होगी," वह गूंजती हुई आवाज़ चारों तरफ फैल गई।  

वरुण ने अपनी सारी हिम्मत जुटाई। "मैं इस श्राप को हमेशा के लिए खत्म करना चाहता हूँ। यह हवेली अब और किसी की क़ब्रगाह नहीं बनेगी।"  

परछाईं ने एक गहरी हँसी भरी। "तू समझता है कि यह इतना आसान है? यह श्राप केवल इस हवेली से नहीं, बल्कि तेरी आत्मा से भी जुड़ गया है। अगर तुझे इसे मिटाना है, तो तुझे सबसे बड़ा बलिदान देना होगा।"  

वरुण का शरीर सुन्न पड़ने लगा। हवेली की ज़मीन कंपन करने लगी। काली किताब अब भी हवा में तैर रही थी, लेकिन उसके पन्ने धीरे-धीरे जलने लगे। यह संकेत था कि अब ज्यादा समय नहीं बचा था।  

"क्या बलिदान देना होगा?" वरुण ने हिम्मत करके पूछा।  

परछाईं चुप रही, फिर धीरे से बोली, "अपनी यादें।"  

वरुण के अंदर एक अजीब सा डर दौड़ गया। "क्या मतलब?"  

"अगर तू इस श्राप को खत्म करना चाहता है, तो तुझे अपनी सारी यादों को मिटाना होगा। यह हवेली, यह किताब, यह आत्माएँ—सबकुछ भुलाना होगा। तेरी ज़िंदगी वहीं से शुरू होगी, जहाँ यह सब शुरू होने से पहले थी। लेकिन इसकी एक शर्त है—तू कभी अपने अतीत को याद करने की कोशिश नहीं करेगा, वरना यह श्राप फिर जाग उठेगा।"  

वरुण के अंदर एक द्वंद्व शुरू हो गया। क्या वह अपनी पहचान, अपनी यादें, अपने संघर्ष को यूँ ही मिटा सकता था? लेकिन अगर वह ऐसा नहीं करता, तो यह श्राप हमेशा बना रहेगा, और जाने कितने लोग इसकी चपेट में आते रहेंगे।  

हवेली की दीवारें अब टूटने लगी थीं। हवा में चिल्लाहटें गूंज रही थीं। वरुण जानता था कि उसे जल्दी निर्णय लेना होगा। उसने एक गहरी साँस ली और काली किताब को अपने हाथ में लिया।  

"मैं तैयार हूँ," उसने दृढ़ता से कहा।  

परछाईं की आँखें एक पल को चमकीं। "तो अपनी यादों को मेरे हवाले कर दे।"  

जैसे ही वरुण ने मंत्र पढ़ा, उसकी आँखों के सामने तेज़ रोशनी छा गई। अचानक, उसे महसूस हुआ कि उसके भीतर कुछ खिंच रहा है, जैसे उसकी पूरी ज़िंदगी किसी और ही जगह जा रही हो। उसे अपने नाम तक की पहचान धुंधली लगने लगी।  

धीरे-धीरे हवेली की दरारें भरने लगीं। अंधकार गायब होने लगा। वह परछाईं धीरे-धीरे हल्की पड़ने लगी, मानो वह भी इस दुनिया से विदा ले रही हो।  

एक ज़ोरदार झटके के साथ, सबकुछ शांत हो गया। हवेली अब भी खड़ी थी, लेकिन वह डरावना अहसास पूरी तरह मिट चुका था। वहाँ अब कोई आत्मा नहीं थी, कोई श्राप नहीं था—बस एक वीरान मकान, जो समय के साथ धूल में मिल जाएगा।  

वरुण ने आँखें खोलीं। वह गाँव की सड़क पर खड़ा था, लेकिन उसे कुछ भी याद नहीं था—न हवेली, न आत्मा, न काली किताब। वह बस एक राहगीर था, जो अपने गंतव्य की तलाश में था।  

हवेली अब भी वहीं थी, लेकिन अब वह बस एक पुरानी, उजड़ी हुई इमारत थी, जिसमें कोई रहस्य बाकी नहीं था।