कुछ महीनों बाद, गाँव की हवेली अब एक पुरानी, सुनसान इमारत बन चुकी थी। वहाँ अब कोई आत्मा नहीं थी, कोई अजीब घटनाएँ नहीं होती थीं, और गाँव वाले भी धीरे-धीरे उसे भूलने लगे थे। लेकिन वरुण के लिए, यह सब कभी हुआ ही नहीं था।
वह अब एक अलग शहर में था, एक नई ज़िंदगी जी रहा था। उसके पास एक नौकरी थी, दोस्त थे, लेकिन जब भी कोई उससे उसके अतीत के बारे में पूछता, वह बस कंधे उचका देता। उसे खुद भी नहीं पता था कि वह पहले कौन था, कहाँ से आया था।
कभी-कभी, उसे अजीब सपने आते। धुंधले चेहरे, अंधेरे में चमकती आँखें, और एक पुरानी किताब, जिसके पन्ने जल रहे थे। वह सपनों में कुछ ढूँढने की कोशिश करता, लेकिन हर बार जागने पर सबकुछ धुंधला हो जाता।
एक दिन, जब वह अपने ऑफिस से घर लौट रहा था, तो रास्ते में एक बूढ़ी औरत मिली। उसकी झुर्रियों भरी आँखों में कुछ अजीब था, जैसे वह वरुण को पहचानती हो।
"बेटा, तुमने अपना वादा तोड़ा," उसने धीमी आवाज़ में कहा।
वरुण चौंक गया। "आप मुझसे पहले मिली हैं?"
बूढ़ी औरत ने एक लंबी साँस ली। "नहीं, लेकिन तुमने कुछ छोड़ दिया था... और वो चीज़ तुम्हें वापस बुला रही है।"
वरुण का सिर दर्द से भारी हो गया। उसके कानों में कोई पुरानी आवाज़ गूंजने लगी—"अगर तू कभी अपने अतीत को याद करने की कोशिश करेगा, तो यह श्राप फिर जाग उठेगा।"
हवा में एक सिहरन दौड़ गई। कहीं दूर, किसी वीरान जगह पर, एक पुरानी किताब के जले हुए पन्ने फिर से खुलने लगे थे...
वरुण की साँसें तेज़ हो गईं। बूढ़ी औरत की आँखों में एक अजीब सी चमक थी, मानो वह सबकुछ जानती हो। उसके शब्दों ने वरुण के भीतर कहीं गहराई में दबी यादों को झकझोर दिया था। अचानक, उसके दिमाग में धुंधली छवियाँ उभरने लगीं—हवेली, काली किताब, अंधेरे में चमकती आँखें, और वह श्राप जिसे मिटाने के लिए उसने अपनी यादों का बलिदान दिया था।
"मैं... मैं नहीं जानता आप किस बारे में बात कर रही हैं," वरुण ने हड़बड़ाते हुए कहा।
बूढ़ी औरत ने हल्की मुस्कान दी। "तुम जानोगे, बेटा... बहुत जल्द।"
जैसे ही वह आगे बढ़ी, वरुण के सिर में तीव्र दर्द उठा। उसकी आँखों के आगे सबकुछ घूमने लगा। वह वहीं सड़क के किनारे घुटनों के बल गिर पड़ा। अंधेरे में कोई फुसफुसा रहा था—कोई उसे पुकार रहा था। और फिर, अचानक सबकुछ साफ़ होने लगा।
वरुण को सब याद आ गया। वह श्राप, वह आत्मा, वह अंतिम बलिदान... और यह चेतावनी कि अगर उसने अतीत को याद करने की कोशिश की, तो श्राप फिर जाग उठेगा।
उसकी आँखें खुलीं, और उसने खुद को हवेली के सामने पाया। वह उसी जगह खड़ा था, जहाँ से यह सब शुरू हुआ था। लेकिन इस बार, हवेली पहले से भी ज्यादा डरावनी लग रही थी—मानो वह उसके लौटने का इंतजार कर रही हो।
काले बादल आसमान में घिरने लगे। हवेली के अंदर से धीमी-धीमी फुसफुसाहटें सुनाई देने लगीं। वरुण को एहसास हो गया था—श्राप टूटा नहीं था, सिर्फ सो गया था। और अब, जब उसने अपनी यादें वापस पा ली थीं, वह फिर से जाग चुका था।
"अब क्या करूँ?" उसने खुद से पूछा।
परछाइयाँ फिर से बनने लगीं। हवेली की खिड़कियाँ खुद-ब-खुद खुलने लगीं। हवा में एक जानी-पहचानी आवाज़ गूँजी—"तूने अपना वादा तोड़ दिया, वरुण। अब भाग नहीं सकता।"
लेकिन इस बार, वरुण डरा नहीं। उसने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं और दृढ़ निश्चय के साथ हवेली के अंदर कदम बढ़ाया। वह जानता था कि अब उसे इस श्राप को हमेशा के लिए खत्म करना होगा—इस बार बिना किसी बलिदान के।
अंधेरे के बीच वह आगे बढ़ता गया, और हवेली का दरवाज़ा उसके पीछे खुद-ब-खुद बंद हो गया।
जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, हवेली के भीतर घना अंधकार छा गया। चारों ओर एक अजीब सन्नाटा था, जिसे केवल धीमी-धीमी फुसफुसाहटें तोड़ रही थीं। वरुण ने गहरी साँस ली और अपने कदम बढ़ाए। उसे पता था कि यह उसकी अंतिम परीक्षा थी—या तो वह इस श्राप को हमेशा के लिए खत्म कर देगा या फिर हमेशा के लिए इसका हिस्सा बन जाएगा।
हवेली के अंदर बढ़ते ही उसकी आँखों के सामने पुराने दृश्य तैरने लगे। दीवारों पर परछाइयाँ दौड़ रही थीं, और फर्श पर अजीब आकृतियाँ बन रही थीं। अचानक, सामने काली किताब हवा में तैरती हुई प्रकट हुई। उसके पन्ने अपने आप पलटने लगे, और उसमें लिखे शब्द चमकने लगे। वरुण को लगा मानो कोई अदृश्य शक्ति उसे कुछ समझाने की कोशिश कर रही हो।
"तूने वादा तोड़ा," वही रहस्यमयी आवाज़ गूँजी। "अब इसकी कीमत चुकाने के लिए तैयार हो जा।"
अचानक, हवेली की छत से काले धुएँ जैसी आकृतियाँ निकलने लगीं। वे हवा में घूमती हुईं वरुण की ओर बढ़ने लगीं। उनकी आँखों में लाल रोशनी चमक रही थी।
लेकिन वरुण अब पीछे हटने वालों में से नहीं था। उसने काली किताब को अपनी ओर बुलाया और उसमें लिखे अंतिम मंत्र को जोर से पढ़ा। हवेली की दीवारें काँपने लगीं, और काले साए दर्द से चीखने लगे।
"यह श्राप अब खत्म होगा!" वरुण चिल्लाया।
जैसे ही उसने अंतिम मंत्र पढ़ा, हवेली के अंदर रोशनी की एक तीव्र लहर दौड़ गई। काले साए चीखते हुए भस्म होने लगे। हवेली की छत से एक शक्तिशाली प्रकाश फूटा और पूरा अंधकार मिटने लगा।
किताब के आखिरी पन्ने खुद-ब-खुद जल उठे, और उनके साथ ही वह श्राप भी हमेशा के लिए खत्म हो गया। हवेली की खिड़कियाँ और दरवाज़े ज़ोर से खुले, और अंदर की हवा एकदम शांत हो गई।
वरुण थका हुआ ज़मीन पर गिर पड़ा, लेकिन उसकी आँखों में संतोष था। उसने आखिरकार इस श्राप से छुटकारा पा लिया था।
जब वह जागा, तो खुद को हवेली के बाहर पाया। सूरज की पहली किरणें आसमान में फैल रही थीं। हवेली अब बस एक पुरानी, खंडहर हो चुकी इमारत थी—जिसमें अब कोई रहस्य, कोई श्राप नहीं बचा था।
वरुण मुस्कुराया और बिना पीछे देखे वहाँ से चला गया। उसकी परीक्षा खत्म हो चुकी थी।