प्रार्थना:तूने हमें उत्पन्न किया, पालन कर रहा है तू।
तुझसे ही पाते प्राण हम, दुखियों के कष्ट हरता तू ॥
तेरा महान् तेज है, छाया हुआ सभी स्थान।
सृष्टि की वस्तु-वस्तु में, तू हो रहा है विद्यमान ॥
तेरा ही धरते ध्यान हम, मांगते तेरी दया।
ईश्वर हमारी बुद्धि को, श्रेष्ठ मार्ग पर चला ॥
मंत्र:
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।।
अर्थः सभी सुखी हों, सभी निरोग हों, सभी मंगलमय घटनाओं को देखें और कोई भी दुःख का भागी न हो।
गर्भ संवाद
“मेरे बच्चे, जब से मैंने तुम्हें महसूस किया है, मेरी जिंदगी जादुई बन गई है। तुम्हारी हर हलचल मेरे दिल को सुकून देती है। मैं तुम्हें अपनी बाहों में लेने का इंतजार कर रही हूं। तुमने मेरे जीवन को नई दिशा दी है, और हर दिन तुम्हारे साथ बिताने की कल्पना मेरी सबसे बड़ी खुशी है। तुम मेरी आत्मा के सबसे करीब हो।”
पहेली:
ऐसा शब्द बताये जिससे, फूल, मिठाई, फल बन जाए।
कहानी: कृष्ण की लीलाएं
भगवान श्री कृष्ण का जन्म मथुरा के कारागार में हुआ था। उनका जीवन न केवल एक अद्भुत और दिव्य यात्रा थी, बल्कि उन्होंने अपने अद्वितीय कार्यों और लीलाओं से सृष्टि के हर क्षेत्र को उजागर किया। उनके जीवन की लीलाएं प्रेम, सत्य, धर्म और भक्तिरस की मिसाल बन चुकी हैं।
श्री कृष्ण का बचपन विशेष रूप से अपूर्व था। उन्होंने अपनी जन्मस्थली मथुरा में कंस के अत्याचारों के खिलाफ कई वीरता की मिसालें पेश की। कंस जो उनके मामा थे, ने कई बार श्री कृष्ण को मारने के लिए विविध योजनाएं बनाई, लेकिन कृष्ण ने हर बार उसे नाकाम कर दिया। उनकी लीलाओं में उनके रूप, उनका चमत्कारी खेल और उनका अप्रतिम कौशल था।
उनकी बाल लीलाएं और माखन चुराना प्रसिद्ध हैं। गोकुल में उनके मित्रों के साथ खेलते हुए कृष्ण ने माखन चुराकर गांव वालों को चौंका दिया। उन्होंने अपनी चतुराई से हर कठिनाई को आसान बना लिया और नन्हे कृष्ण का रूप सच्चे प्रेम का प्रतीक बना। उनके हर कृत्य में आनंद और शांति का संदेश छुपा हुआ था।
एक और प्रसिद्ध लीला थी ‘गोवर्धन पर्वत उठाना।’ जब इंद्रदेव ने गोकुलवासियों से नाराज होकर मूसलधार बारिश शुरू कर दी, तब श्री कृष्ण ने अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर सभी गोकुलवासियों को बचाया। यह लीला केवल एक चमत्कारी घटना नहीं थी, बल्कि इसने हमें यह सिखाया कि सही समय पर सही निर्णय और ईश्वर की कृपा से हर समस्या का समाधान संभव है।
कृष्ण का प्रेम राधा के प्रति भी बहुत प्रसिद्ध है। राधा और कृष्ण के रिश्ते को कभी भी सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं माना जा सकता।
यह रिश्ते की गहराई और समर्पण को दिखाता है। राधा और कृष्ण का प्रेम आध्यात्मिक प्रेम का सर्वोच्च रूप है, जो हमें ईश्वर के प्रति अनकहे प्रेम और भक्ति का मार्ग दिखाता है। राधा के साथ कृष्ण की रास लीला आज भी सच्चे प्रेम और भक्ति के प्रतीक के रूप में देखी जाती है।
महाभारत के युद्ध में भी श्री कृष्ण का योगदान महत्वपूर्ण था। अर्जुन को कुरुक्षेत्र के युद्ध में मार्गदर्शन देते हुए, कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया। गीता के संदेश में भगवान ने हमें जीवन, कर्म, योग, और धर्म के असल अर्थ को समझाया। गीता का उपदेश आज भी हमारे जीवन को दिशा देने वाला है। कृष्ण ने अर्जुन को बताया कि धर्म की राह पर चलने के लिए किसी से डरने की आवश्यकता नहीं होती। सत्य, धर्म और कर्म की निष्ठा पर चलकर ही विजय प्राप्त की जा सकती है।
श्री कृष्ण का जीवन केवल एक भगवान का जीवन नहीं था, बल्कि एक आदर्श जीवन था। उन्होंने अपनी लीलाओं से हमें यह सिखाया कि जीवन में सुख और दुख का एक ही मार्ग है, और वह मार्ग है — प्रेम, कर्म और भक्ति। जीवन में हम जो कुछ भी करते हैं, वह केवल भगवान की इच्छा और हमारे कर्मों का परिणाम होता है इसलिए हमें अपने कर्मों में ईश्वर की भक्ति और प्रेम को हमेशा प्राथमिकता देनी चाहिए।
कृष्ण की लीलाएं हर भक्त के दिल में एक अनूठा आनंद और शांति का अनुभव कराती हैं। उनके जीवन के हर पहलू ने यह साबित किया कि जब तक हम अपने उद्देश्य के प्रति समर्पित हैं, तब तक कोई भी शक्ति हमें हमारी मंजिल तक पहुँचने से रोक नहीं सकती।
शिक्षा
भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं से हमें यह महत्वपूर्ण शिक्षा मिलती है कि जीवन में हर कार्य को सही दिशा में करना चाहिए। हर कठिनाई का समाधान ईश्वर के विश्वास, धैर्य और कर्म में छुपा होता है। प्रेम, भक्ति और सत्य के मार्ग पर चलकर ही हम अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं। कृष्ण की लीलाएं हमें यह भी सिखाती हैं कि जीवन में किसी भी स्थिति में हमें अपने धर्म और कर्तव्यों से समझौता नहीं करना चाहिए क्योंकि यही जीवन का असली उद्देश्य है।
पहेली का उत्तर : गुलाब जामुन
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प्रार्थना:
हे जग त्राता विश्व विधाता,
हे सुख शांति निकेतन।
प्रेम के सिन्धु, दीन के बन्धु,
दुःख दारिद्र विनाशन।
हे जग त्राता विश्व विधाता,
हे सुख शांति निकेतन
हे नित्य अखंड अनंन्त अनादि,
पूरण ब्रह्म सनातन।
हे जग त्राता विश्व विधाता,
हे सुख शांति निकेतन
हे जग आश्रय जग-पति जग-वन्दन,
अनुपम अलख निरंजन।
हे जग त्राता विश्व विधाता,
हे सुख शांति निकेतन
प्राण सखा त्रिभुवन प्रति-पालक,
जीवन के अवलंबन।
हे जग त्राता विश्व विधाता,
हे सुख शांति निकेतन
हे जग त्राता विश्व विधाता,
हे सुख शांति निकेतन
हे सुख शांति निकेतन
हे सुख शांति निकेतन।
मंत्र:
सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्।।
अर्थः सत्य की ही विजयी होती है, असत्य की नहीं। सत्य के माध्यम से ही देवताओं का मार्ग प्रशस्त होता है। सत्य की प्राप्ति से ही ऋषि अपने सभी कार्य पूरे करते हैं।
गर्भ संवाद
“मेरे प्यारे बच्चे, मैं हमेशा तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान देखने के लिए जीती हूं। तुम्हारी खुशी मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी। मैं चाहती हूं कि तुम्हारा जीवन खुशियों और सफलता से भरा हो। तुम मेरी दुनिया का सबसे अनमोल हिस्सा हो, और मैं तुम्हारे हर कदम पर तुम्हारे साथ खड़ी रहूंगी।”
पहेली:
एक छोटा-सा बंदर, जो उछले पानी के अंदर।
कहानी: शिव का क्रोध और शांति
भगवान शिव, त्रिदेवों में एक महत्वपूर्ण देवता हैं जिनका स्वरूप और व्यक्तित्व दोनों ही अत्यधिक रहस्यमय हैं। वे भूत-प्रेतों के स्वामी, आचार्य, योगी और सभी प्रकार के भक्तों के परम गुरु हैं। लेकिन इसके साथ ही उनका क्रोध भी असीमित और अत्यधिक भयानक माना जाता है। भगवान शिव का क्रोध उनके स्वभाव का एक अलग पक्ष है और यह हमेशा एक महत्वपूर्ण संदेश देता है।
एक बार की बात हैं जब देवताओं और असुरों के बीच युद्ध चल रहा था। असुरों ने देवताओं के खिलाफ एक भयंकर युद्ध छेड़ दिया था और देवताओं के पास कोई रास्ता नहीं था। तब भगवान शिव ने अपनी शक्ति का उपयोग किया और असुरों का वध करने के लिए युद्ध में भाग लिया।
लेकिन एक असुर, जिसका नाम 'तारकासुर' था, बहुत शक्तिशाली था। तारकासुर ने अपनी तपस्या से ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया था। जिसमें यह शर्त थी कि वह केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों मारा जाएगा। भगवान शिव के इस वचन के कारण देवताओं को यह समस्या थी कि यदि भगवान शिव के पुत्र का जन्म नहीं हुआ तो वह असुर कभी मारा नहीं जाएगा।
सभी देवताओं के मन में चिंता और भय था। तब पार्वती माता, जो भगवान शिव की पत्नी थीं ने यह निर्णय लिया कि वह भगवान शिव के साथ विवाह करेंगी ताकि उनका पुत्र जन्म ले सके। भगवान शिव ने पार्वती माता की तपस्या को स्वीकार किया और उनके साथ विवाह किया। इसके बाद उनका पुत्र 'कार्तिकेय' जन्मा जिसने तारकासुर का वध किया और देवताओं की रक्षा की।
लेकिन एक घटना और घटी जो भगवान शिव के क्रोध को उजागर करने वाली थी। एक बार जब भगवान शिव ध्यान में थे, तो उनके पास एक राक्षस आया और भगवान शिव को अपशब्द कहने लगा।
यह राक्षस इतना अधिक घमंडी था कि उसने भगवान शिव का अपमान करना शुरू कर दिया। भगवान शिव की तपस्या और ध्यान में कोई विघ्न डालने की हिम्मत नहीं करता था लेकिन यह राक्षस भगवान शिव के क्रोध को उकसाने में सफल हो गया।
भगवान शिव की आंखों में अचानक भयंकर क्रोध का संचार हुआ। उनके क्रोध से तीसरी आंख से एक अग्नि की ज्वाला फूटी जो तुरंत उस राक्षस को भस्म कर गई। भगवान शिव का क्रोध इतना प्रचंड था कि एक पल में राक्षस का अस्तित्व मिट गया। यह घटना साबित करती है कि भगवान शिव का क्रोध अकल्पनीय और अप्रतिबंधित होता है जब किसी ने उनके या उनके भक्तों के प्रति अपमान किया हो। लेकिन भगवान शिव का स्वभाव केवल क्रोध तक ही सीमित नहीं था। उनकी एक और प्रसिद्ध लीला है जो हमें उनके शांति के रूप को समझाने में मदद करती है।
एक दिन, एक योगी को भगवान शिव के दर्शन का अवसर मिला। वह योगी बहुत तपस्वी था और भगवान शिव के प्रति अत्यधिक श्रद्धा रखता था। भगवान शिव ने उसे अपनी तीसरी आंख दिखाई और उसकी तपस्या को स्वीकार किया। योगी भगवान शिव के दर्शन से अत्यधिक प्रभावित हुआ और उसने भगवान शिव से यह पूछा "हे महादेव, आपने क्रोध और शांति दोनों का अनुभव किया है। दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाता है?"
भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "क्रोध और शांति दोनों मानवता के भीतर होते हैं। क्रोध कभी भी अशांति का कारण बन सकता है लेकिन शांति में शक्ति और साहस है। जब क्रोध अनियंत्रित हो जाता है, तो वह विनाश का कारण बनता है लेकिन जब शांति से कोई कार्य किया जाता है, तो वह शाश्वत और संतुलित परिणाम लाता है।"
शिव के इस उत्तर ने योगी को गहरे विचार में डाल दिया। उसने भगवान शिव की शांति और क्रोध दोनों को समझा और यह महसूस किया कि सच्ची शक्ति न केवल क्रोध में है, बल्कि शांति में भी है। भगवान शिव ने यह सिखाया कि यदि किसी स्थिति में क्रोध उत्पन्न हो, तो उसे काबू में करना आवश्यक है लेकिन, जो सच्चा योगी है, वह हर परिस्थिति में शांति बनाए रखता है और क्रोध को अपनी ऊर्जा का हिस्सा बनाकर उसका सही उपयोग करता है।
भगवान शिव की यह लीला हमें यह सिखाती है कि क्रोध और शांति दोनों का सही संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। भगवान शिव का क्रोध हमेशा धर्म की रक्षा और बुराई का नाश करने के लिए होता है, लेकिन उनकी शांति में संसार की कल्याणकारी शक्ति निहित है।
हमें अपने जीवन में भी हर परिस्थिति में संतुलन बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि हम अपने कर्मों से सत्य और धर्म का पालन कर सकें।
शिक्षा
भगवान शिव की लीलाओं से यह शिक्षा मिलती है कि क्रोध और शांति दोनों का स्थान जीवन में है, लेकिन हमें समझदारी से इनका उपयोग करना चाहिए। क्रोध एक प्राकृतिक भावना है, लेकिन जब इसे काबू में किया जाता है और सही उद्देश्य के लिए उपयोग किया जाता है, तो यह सही दिशा में कार्य कर सकता है। शांति में शक्ति है, और यह जीवन में संतुलन और स्थिरता बनाए रखता है। जब हम अपने क्रोध को शांतिपूर्वक नियंत्रित करते हैं और हर परिस्थिति में शांति बनाए रखते हैं, तो हम अपने जीवन में सफलता और संतोष प्राप्त कर सकते हैं। भगवान शिव की तरह हमें भी अपने भीतर के दोनों पक्षों को समझकर जीवन में संतुलन बनाए रखना चाहिए।
पहेली का उत्तर: मेंढक
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गीता सार:
क्यों व्यर्थ चिन्ता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? कौन तुम्हें मार सकता है? आत्मा न पैदा होती है, न मरती है ।
जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है। जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्य की चिन्ता न करो। वर्तमान चल रहा है।
तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाये थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर आये, जो लिया यहीं से लिया, जो दिया यहीं से दिया। जो लिया इसी (भगवान) से लिया। जो दिया, इसी को दिया। खाली हाथ आए, खाली हाथ चले। जो आज तुम्हारा है, कल किसी और का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो रहे हो। बस यह प्रसन्नता ही तुम्हारे दुःखों का कारण है।
परिवर्तन ही संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ो के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया मन से मिटा दो, विचार से हटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।
न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जायेगा। परन्तु आत्मा स्थिर है, फिर तुम क्या हो? तुम अपने आपको भगवान् के अर्पित करो। यह सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है, वह भय, चिन्ता शोक से सर्वदा मुक्त है।
जो कुछ तू करता है, उसे भगवान को अर्पण करता चल। इसी में तू सदा जीवन-मुक्त अनुभव करेगा।
मंत्र:
आयुर्वेदं च शास्त्रं च धर्मं च पालयामहे।
जीवनं धारणं नित्यं सेवा च भवतु सत्यम्।।
अर्थः आयुर्वेद, धर्म और शास्त्र का पालन करते हुए, नित्य जीवन में सेवा और सत्य का आचरण करना चाहिए।
गर्भ संवाद
“मेरे बच्चे! तुम्हारे आने से यह घर एक मंदिर जैसा पवित्र बन जाएगा। तुम्हारी मासूमियत और प्यार इस घर को रोशनी से भर देगा। तुम मेरे जीवन में एक दिव्य प्रकाश हो, जो हर अंधेरे को दूर कर देगा। मैं तुम्हारे साथ हर दिन को खास बनाने का सपना देख रही हूं।”
पहेली:
थल में पकड़े पैर तुम्हारे,
जल में पकड़े हाथ।
मुर्दा होकर भी रहता है,
जिंदो के ही साथ।
कहानी: कबीर की सादगी
कबीर दास, भारतीय संतों और कवियों में एक महान व्यक्तित्व थे, जिनकी शिक्षाओं ने समाज को एक नई दिशा दी। वे एक ऐसे संत थे, जिन्होंने भक्ति, सत्य और समाजिक समरसता के संदेश दिए। कबीर की जीवन यात्रा सादगी, सहजता और सत्य की खोज से प्रेरित रही। उनका जीवन किसी भी प्रकार की भव्यता या दिखावे से दूर था, और उनकी कविताओं में जीवन के असली और सरल रूप को समझने का प्रयास किया गया है।
कबीर का जन्म लगभग 1440 के आस-पास हुआ था और उनका जीवन मीराबाई, गुरु नानक, रामानंद जैसे संतों के साथ मेल खाता था। उनकी शिक्षाओं में कोई दिखावा या धार्मिक अनुष्ठान नहीं था। उनका जीवन एक साधारण जीवन था, जिसमें वे भगवान के नाम का सच्चे दिल से जाप करते थे, और उसी साधना में उन्होंने सच्चाई का अनुभव किया।
कबीर का जीवन एक तपस्वी की तरह था लेकिन उनकी साधना और भक्ति में कोई भव्यता नहीं थी। वे जितने बड़े संत थे, उतने ही सादा और सरल थे। कबीर की कविता का सबसे बड़ा संदेश यही था कि सत्य को जानने के लिए हमें दिखावे की आवश्यकता नहीं है। सत्य सरल और स्वाभाविक होता है। उनके जीवन में भक्ति, साधना और सादगी का गहरा संबंध था।
कबीर की सादगी का एक महत्वपूर्ण उदाहरण उनकी दिनचर्या और जीवनशैली से मिलता है। वे न तो किसी धार्मिक मंदिर के पंखे के नीचे पूजा करते थे और न ही किसी प्रकार की धार्मिक पूजा विधि का पालन करते थे। वे साधारण तरीके से भगवान के नाम का स्मरण करते थे और उनके हर क्रिया-कलाप में एक अनूठा सरलता का प्रतीक था।
उनका जीवन इतना सादा था कि उनके पास न तो कोई संपत्ति थी, न ही वे किसी भव्य घर में रहते थे। वे जिस भी स्थान पर रहते थे, वहाँ एक साधारण झोपड़ी होती थी और वही उनके घर का रूप था।
कबीर की सादगी का एक और उदाहरण उनकी कविताओं से मिलता है। उनकी रचनाएँ, जिसे 'बीजक' के नाम से जाना जाता है, जीवन की सच्चाई को बहुत सरल शब्दों में व्यक्त करती थीं। उनकी कविताओं में कहीं भी जटिलता या असमझी का तत्त्व नहीं था। वे सीधे तौर पर भगवान से जुड़ी बातों को जीवन के सरलतम रूप में व्यक्त करते थे। उन्होंने हमें यह सिखाया कि सच्ची भक्ति या साधना कोई दिखावा नहीं, बल्कि एक सरल जीवन जीने और भगवान के साथ निरंतर संबंध बनाए रखने का तरीका है।
कबीर का विश्वास था कि हम सभी के अंदर भगवान बसा है और हमें उसकी पूजा करने के लिए किसी मंदिर या पूजा घर की आवश्यकता नहीं है। वे मानते थे कि व्यक्ति को अपनी असली पूजा अपने आंतरिक संसार से करनी चाहिए।
उनका प्रसिद्ध उद्धरण “पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा, पंडित भए न कोय” इसका प्रमाण है, जिसमें उन्होंने यह कहा था कि कितनी भी धार्मिक किताबें पढ़ने से कोई सच्चा संत नहीं बन सकता। सच्चे संत का अस्तित्व उसके कर्मों और विचारों में है न कि धार्मिक अनुष्ठानों में।
एक बार की बात है जब कबीर एक गाँव में रह रहे थे तो वहाँ के लोग उनके पास आए और उनसे पूछा, “स्वामी, आप इतने बड़े संत हैं, फिर आपके पास पूजा का क्या तरीका है? क्या आप किसी विशेष देवता की पूजा करते हैं?” कबीर मुस्कुराए और बोले, “जो दिल में सच्चा प्यार और विश्वास हो, वही असली पूजा है। भगवान किसी मूर्ति में नहीं, बल्कि हमारे दिल में बसे होते हैं।” इस तरह, कबीर ने जीवन के सरलतम रूप में भगवान को जानने की शिक्षा दी।
कबीर का यह सरल जीवन और उनका सरल दृष्टिकोण हमें यह सिखाता है कि जीवन को जटिल बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है। हम अपने जीवन में जितनी अधिक सादगी अपनाएंगे, उतना ही अधिक शांति और संतुलन प्राप्त कर सकेंगे। हमे भगवान को समझने के लिए किसी बाहरी दिखावे या भव्यता की आवश्यकता नहीं है, बल्कि हमें अपने भीतर की सादगी और शांति को महसूस करना होगा।
कबीर की एक और प्रसिद्ध शिक्षा यह थीं कि हमें समाज में व्याप्त आडंबर और असमानताओं से बाहर निकलकर एक दूसरे के साथ प्रेम और समानता से रहना चाहिए। उनका मानना था कि हर व्यक्ति को एक समान सम्मान और प्यार मिलना चाहिए चाहे वह किसी भी जाति, धर्म या समाज से हो।
कबीर के जीवन से यह भी संदेश मिलता है कि हमें किसी भी प्रकार के दिखावे या भव्यता से दूर रहना चाहिए। उन्होंने अपने जीवन में पूरी तरह से सादगी अपनाई और यह सिद्ध किया कि सच्चे संत वही होते हैं, जो अपने जीवन को सरल और निर्मल रखते हैं।
शिक्षा
संत कबीर की सादगी हमें यह सिखाती है कि जीवन को सरल और सहज बनाकर हम शांति और संतुलन प्राप्त कर सकते हैं। हमें किसी बाहरी दिखावे की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि असली पूजा और भक्ति हमारे दिल में बसती है। सच्चे संत वही होते हैं, जो अपनी जीवनशैली में सादगी और शांति रखते हैं, और जो दूसरों के साथ प्रेम और समानता से पेश आते हैं। कबीर ने हमें यह भी सिखाया कि समाज में हर व्यक्ति को समान अधिकार और सम्मान मिलना चाहिए और हमें अपने आडंबर और भेदभाव से दूर रहकर एक दूसरे के साथ सच्चे प्रेम और मित्रता से रहना चाहिए। उनका जीवन और उनकी शिक्षाएँ आज भी हमें मार्गदर्शन देती हैं।
पहेली का उत्तर : जूता
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प्रार्थना:
मैं उमापति, देवगुरू, जो ब्रह्मांड के कारण हैं, को नमन करता हूँ। मैं उनको नमन करता हूँ जिनका आभूषण सर्प है, जो मृगधर हैं एवं जो सभी प्राणियों के स्वामी हैं। सूर्य, चंद्रमा और अग्नि जिनके तीन नेत्र हैं और जो विष्णु प्रिय हैं, मैं उन्हें नमन करता हूँ। मैं भगवान शंकर को नमन करता हूँ जो सभी भक्तों को शरण देने वाले हैं, वरदानों के दाता हैं एवं कल्याणकारी हैं।
मंत्र:
ॐ अद्य लक्ष्मी महालक्ष्मी लक्ष्मी श्रीं नमोस्तुते।
विध्या लक्ष्मी प्रसन्न लक्ष्मी लक्ष्मी श्रीं नमोस्तुते।।
अर्थः अष्टलक्ष्मी! आप हमें धन, शिक्षा और समृद्धि प्रदान करें।
गर्भ संवाद
“मेरे बच्चे, तुम्हारे बिना मेरी जिंदगी अधूरी है। तुम्हारे बारे में सोचते ही मेरी आंखों में खुशी के आंसू आ जाते हैं। तुम्हारे आने से मेरी हर कमी पूरी हो जाएगी। मैं तुम्हें हर तरह की सुरक्षा और प्यार देने का वादा करती हूं।”
पहेली:
बच्चे भी कहते है मामा
बूढ़े भी कहते है मामा।
दीदी भी कहती है मामा
बोलो कोन से मामा।
कहानी: मीराबाई की भक्ति
मीराबाई, जिनका नाम भारतीय संतों और भक्तों में सबसे सम्मानित है एक ऐसी अद्वितीय संत और कवयित्रि थीं जिनकी भक्ति और प्रेम की गहरी भावना ने उन्हें इतिहास में एक विशेष स्थान दिलाया। उनका जन्म 1498 ई. में राजपूत शाही परिवार में हुआ था और उनका नाम एक महान भक्त के रूप में जाना जाता है, जो भगवान श्री कृष्ण के प्रति अपनी अपार श्रद्धा और प्रेम के लिए प्रसिद्ध थीं। मीराबाई की भक्ति जीवन के प्रति एक सशक्त दृष्टिकोण और निष्ठा का प्रतीक है जो हमें अपने उद्देश्य और प्रेम के प्रति समर्पण का पाठ सिखाती है।
मीराबाई का जीवन शुरुआत से ही कठिनाइयों और संघर्षों से भरा था। उनका विवाह एक राजकुमार से हुआ था, लेकिन वह जीवन के अन्य सभी भौतिक सुखों को त्यागकर केवल भगवान कृष्ण के प्रेम में रम गईं। मीराबाई की भक्ति का आधार शुद्ध प्रेम था और उनके जीवन का उद्देश्य केवल कृष्ण की आराधना करना था। उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुखों को पूरी तरह से त्याग दिया और अपना पूरा जीवन भगवान के प्रति समर्पित कर दिया।
मीराबाई के जीवन में भक्ति का अनुभव तब प्रगट हुआ जब उन्होंने श्री कृष्ण को अपने जीवन का परम प्रेमी और भगवान के रूप में स्वीकार किया। उनके लिए कृष्ण की भक्ति सिर्फ एक धर्म या पूजा नहीं थी बल्कि यह एक आत्मीय संबंध था। उनके गीत और भजनों में श्रीकृष्ण के प्रति उनके प्रेम और भक्ति की गहरी भावना व्यक्त होती है।
मां मीराबाई का विश्वास था कि जब तक हम भगवान के साथ अपने दिल का सच्चा रिश्ता नहीं बना लेते, तब तक हम भक्ति के सही अर्थ को समझ नहीं सकते।
मीराबाई का भक्ति मार्ग हमेशा सरल और सहज था। वे किसी भी मंदिर, पूजा या धार्मिक अनुष्ठान के पीछे नहीं भागतीं थीं। उनकी भक्ति की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे केवल दिल से भगवान के साथ जुड़ना चाहती थीं न कि किसी बाहरी दिखावे या समाजिक पहचान से। उनके लिए सच्ची भक्ति का मतलब था अपने आत्मा को शुद्ध करना और उसे भगवान के चरणों में समर्पित कर देना।
उनके जीवन में एक और प्रमुख घटना तब घटी जब उनके ससुराल वालों ने उन्हें अपमानित किया और उनसे भगवान के प्रति उनकी भक्ति को छोड़ने के लिए कहा लेकिन मीराबाई ने कभी भी अपनी भक्ति को छोड़ने का विचार नहीं किया। वे हमेशा कृष्ण के नाम का जप करती रहीं और उनका विश्वास कभी भी डिगा नहीं। उन्होंने अपने जीवन के संघर्षों और दुखों को भगवान श्री कृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया। यही कारण था कि मीराबाई के भक्तिगीत और कविताएँ समय के साथ बहुत प्रसिद्ध हुई। उनका कहना था कि जब तक हम भगवान के प्रेम में न डूब जाएं, तब तक हमारी भक्ति अधूरी रहती है।
मीराबाई की भक्ति के प्रति प्रेम और समर्पण का एक और उदाहरण उनके गीतों और भजनों के रूप में मिलता है। उनके द्वारा रचित गीत और भजन आज भी हमारे दिलों में गूंजते हैं। “पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।” और “मुझे तो श्री कृष्ण कृपा की जोहरी है।” जैसे उनके भक्तिगीत आज भी लोगों के दिलों को छूते हैं।
इन गीतों में उनके कृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति की भावना प्रकट होती है। मीराबाई की भक्ति ने न केवल उन्हें व्यक्तिगत रूप से शांति दी, बल्कि उनके गीतों और भजनों ने समाज के एक बड़े हिस्से को कृष्ण के प्रेम और भक्ति के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया।
मीराबाई का भक्ति मार्ग केवल एक आस्था या धार्मिक क्रिया नहीं थी, बल्कि यह एक जीवन की शैली थी। उनके लिए भगवान के साथ संबंध बनाना, उसके प्रति प्रेम और श्रद्धा दिखाना और अपनी भक्ति को हर कार्य में प्रकट करना यही सच्ची भक्ति थी। उन्होंने समाज को यह समझाया कि भगवान से सच्ची भक्ति में हमे दिखावे की आवश्यकता नहीं है, बल्कि हमें केवल दिल से भगवान के प्रति प्रेम और श्रद्धा रखनी चाहिए।
उनकी भक्ति ने यह भी सिद्ध किया कि समाज के किसी भी बंधन से मुक्त होकर एक व्यक्ति अगर सच्चे मन से भगवान के प्रति समर्पित होता है, तो उसे सच्ची शांति और आनंद की प्राप्ति होती है। मीराबाई ने यह दिखाया कि भक्ति कोई बाहरी कार्य नहीं है, बल्कि यह हमारी आंतरिक भावना और विश्वास का परिणाम है।
मीराबाई की भक्ति का सबसे बड़ा संदेश यह था कि भगवान को प्राप्त करने के लिए किसी भी प्रकार के समाजिक बंधन या परंपराओं की आवश्यकता नहीं है। वे हमेशा यह कहती थीं कि भगवान केवल प्रेम और भक्ति में निवास करते हैं और हमें उसी प्रेम और समर्पण के साथ जीवन जीने की आवश्यकता है।
मीराबाई ने हमें यह भी सिखाया कि भक्ति केवल पूजा या मंत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे हर कार्य, विचार और भावना में बसी होती है।
मीराबाई की भक्ति हमें यह भी सिखाती है कि जीवन में सच्ची संतुष्टि और शांति पाने के लिए हमें किसी बाहरी साधन या वस्तु की आवश्यकता नहीं होती। जब हम भगवान से सच्चा प्रेम करते हैं तो हमारी आत्मा शुद्ध हो जाती है और हमें जीवन का असली उद्देश्य समझ में आता है। मीराबाई की भक्ति और उनका जीवन यह साबित करता है कि प्रेम और भक्ति सबसे महान शक्तियाँ हैं, जो किसी भी व्यक्ति को शांति, सुख, और आत्मसाक्षात्कार की दिशा में मार्गदर्शन करती हैं।
शिक्षा
मीराबाई की भक्ति हमें यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति केवल बाहरी पूजा-पाठ या दिखावे का परिणाम नहीं होती, बल्कि यह हमारे दिल में बसने वाली प्रेम और समर्पण की भावना है। अगर हम भगवान के प्रति सच्चे प्रेम में डूब जाएं तो हमें शांति और संतुष्टि प्राप्त होती है। मीराबाई का जीवन हमें यह बताता है कि भक्ति एक आंतरिक प्रक्रिया है जो किसी भी बाहरी समाजिक बंधन से मुक्त है। हमें अपनी आस्थाओं को शुद्ध और सरल बनाकर भगवान के साथ एक गहरे संबंध में रहना चाहिए।
पहेली का उत्तर : चंदा मामा
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सप्तश्लोकी गीता:
श्री भगवान ने कहा— अनुभव, प्रेमाभक्ति और साधनों से युक्त अत्यंत गोपनीय अपने स्वरूप का ज्ञान मैं तुम्हें कहता हूं, तुम उसे ग्रहण करो।
मेरा जितना विस्तार है, मेरा जो लक्षण है, मेरे जितने और जैसे रूप, गुण और लीलाएं हैं—मेरी कृपा से तुम उनका तत्व ठीक-ठीक वैसा ही अनुभव करो।
सृष्टि के पूर्व केवल मैं-ही-मैं था। मेरे अतिरिक्त न स्थूल था न सूक्ष्म और न तो दोनों का कारण अज्ञान। जहां यह सृष्टि नहीं है, वहां मैं-ही-मैं हूं और इस सृष्टि के रूप में जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह भी मैं ही हूं और जो कुछ बचा रहेगा, वह भी मैं ही हूं।
वास्तव में न होने पर भी जो कुछ अनिर्वचनीय वस्तु मेरे अतिरिक्त मुझ परमात्मा में दो चंद्रमाओं की तरह मिथ्या ही प्रतीत हो रही है, अथवा विद्यमान होने पर भी आकाश-मंडल के नक्षत्रो में राहु की भांति जो मेरी प्रतीति नहीं होती, इसे मेरी माया समझना चाहिए।
जैसे प्राणियों के पंचभूतरचित छोटे-बड़े शरीरों में आकाशादि पंचमहाभूत उन शरीरों के कार्यरूप से निर्मित होने के कारण प्रवेश करते भी है और पहले से ही उन स्थानों और रूपों में कारणरूप से विद्यमान रहने के कारण प्रवेश नहीं भी करते, वैसे ही उन प्राणियों के शरीर की दृष्टि से मैं उनमें आत्मा के रूप से प्रवेश किए हुए हूं और आत्म दृष्टि से अपने अतिरिक्त और कोई वस्तु न होने के कारण उन में प्रविष्ट नहीं भी हूं।
यह ब्रह्म नहीं, यह ब्रह्म नहीं— इस प्रकार निषेध की पद्धति से और यह ब्रह्म है, यह ब्रह्म है— इस अन्वय की पद्धति से यही सिद्ध होता है कि सर्वातीत एवं सर्वस्वरूप भगवान ही सर्वदा और सर्वत्र स्थित है, वही वास्तविक तत्व है। जो आत्मा अथवा परमात्मा का तत्व जानना चाहते हैं, उन्हें केवल इतना ही जानने की आवश्यकता है।
ब्रह्माजी! तुम अविचल समाधि के द्वारा मेरे इस सिद्धांत में पूर्ण निष्ठा कर लो। इससे तुम्हें कल्प-कल्प में विविध प्रकार की सृष्टि रचना करते रहने पर भी कभी मोह नहीं होगा।
मंत्र:
शान्ताकारं भुजंगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥
अर्थ: मैं ऐसे सर्वव्यापी भगवान विष्णु को प्रणाम करता हूं जिनका स्वरूप शांत है। जो शेषनाग पर विश्राम करते हैं, जिनकी नाभि पर कमल खिला है और जो सभी देवताओं के स्वामी हैं।
जो ब्रह्मांड को धारण करते हैं, जो आकाश की तरह अनंत और असीम हैं, जिनका रंग नीला है और जिनका शरीर अत्यंत सुंदर है।
जो धन की देवी लक्ष्मी के पति हैं और जिनकी आंखें कमल के समान हैं। जो ध्यान के जरिए योगियों के लिए उपलब्ध हैं।
ऐसे श्रीहरि विष्णु को नमस्कार है जो सांसारिक भय को दूर करते हैं और सभी लोगों के स्वामी हैं।
गर्भ संवाद
“मेरे बच्चे! तुम मेरे दिल की सबसे प्यारी भावना हो। तुम्हारे बिना मेरी आत्मा खाली लगती है। तुम्हारी मासूमियत और प्यारा चेहरा मेरे दिल को सुकून देता है। मैं तुम्हारे हर दर्द को अपने प्यार से मिटाने का प्रयास करूंगी।”
पहेली:
तीन पैर की तितली,
नहा-धोकर निकली
कहानी: प्रकृति
एक बार एक छोटे से गांव में एक बच्चा रहता था जिसका नाम आरव था। आरव स्वभाव से बहुत चंचल और जिज्ञासु था। उसे प्रकृति के हर पहलू में कुछ नया खोजने की आदत थी। उसके दादा जी उसे हमेशा सिखाते थे कि प्रकृति हमारी सबसे बड़ी शिक्षक है और हमें इससे बहुत कुछ सीखने को मिलता है।
आरव हर दिन गांव के पास के जंगल में जाता, जहां वह पक्षियों के गीत सुनता, बहती नदी का संगीत महसूस करता, और पेड़ों की ठंडी छांव में बैठता। उसे वहां जाकर ऐसा लगता जैसे वह प्रकृति की गोद में आ बैठा हो।
एक दिन उसने देखा कि जंगल का एक हिस्सा सूखने लगा है। पक्षियों का चहचहाना कम हो गया, और वहां की हरियाली भी फीकी पड़ने लगी। यह देखकर आरव चिंतित हो गया। उसने गांव के बुजुर्गों से इस बारे में बात की। उन्होंने उसे बताया कि पिछले कुछ महीनों से लोग जंगल से लकड़ी काट रहे हैं और पेड़ कम हो रहे हैं, जिसके कारण जंगल की सुंदरता खत्म हो रही है।
आरव को यह सुनकर बहुत दुख हुआ। उसने तय किया कि वह कुछ करेगा। उसने अपने दोस्तों और गांव के बच्चों को इकट्ठा किया और सभी को समझाया कि हमें अपने जंगल को बचाना होगा।
बच्चों ने आरव के साथ मिलकर एक योजना बनाई। उन्होंने पेड़ लगाने का संकल्प लिया और गांव के हर घर में जाकर लोगों को समझाया कि पेड़ों की कितनी जरूरत है।
धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाई। गांव के लोग जागरूक हुए और पेड़ों की कटाई बंद कर दी। सभी ने मिलकर नए पेड़ लगाए और जंगल को फिर से हरा-भरा बनाया । पक्षी वापस आ गए, नदी का संगीत लौट आया, और जंगल फिर से जीवंत हो गया।
आरव ने महसूस किया कि जब हम प्रकृति के करीब होते हैं, तो हमें उससे अपार सुख और शांति मिलती है। लेकिन जब हम इसे नुकसान पहुंचाते हैं, तो यह हमें वापस प्यार देने में सक्षम नहीं होती।
शिक्षा
प्रकृति हमारी मां है। यदि हम उसकी रक्षा करेंगे, तो वह हमें अपनी गोद में सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद देती रहेगी। हमें उसकी देखभाल करनी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां भी उसकी सुंदरता का आनंद ले सकें।
पहेली का उत्तर : समोसा
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प्रार्थना:
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।।
भावार्थ– जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की है और जो श्वेत वस्त्र धारण करती है, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली सरस्वती हमारी रक्षा करें।
ॐ सहनाववतु सहनौ भुनक्तु।
सहवीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः
भावार्थ– ईश्वर हम दोनों (गुरू एवं शिष्य) की रक्षा करें! हम दोनों का पोषण करें! हम दोनों पूर्ण शक्ति के साथ कार्यरत रहें! हम तेजस्वी विद्या को प्राप्त करें! हम कभी आपस में द्वेष न करें ! सर्वत्र शांति रहे!
ॐ असतो मा सद्गमय।।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।।
मृत्योर्मामृतं गमय।।
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।।
भावार्थ– हे ईश्वर! हमको असत्य से सत्य की ओर ले चलो। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से अमरता के भाव की ओर ले चलो।
मंत्र:
ॐ भूर्भुवः स्वः।
तत्सवितुर्वरेण्यं।
भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥
अर्थ– हे परमात्मा! आप सब कुछ हैं— जीवन, प्रकाश और प्रेम। हम आपके दिव्य तेज का ध्यान करते हैं। आप हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करें।
गर्भ संवाद:
— मेरे प्यारे शिशु, मेरे राज दुलार, मैं तुम्हारी माँ हूँ.......माँ !
— मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ, तुम मेरे गर्भ में पूर्ण रूप से सुरक्षित हो, तुम हर क्षण पूर्ण रूप से विकसित हो रहे हो।
— तुम मेरे हर भाव को समझ सकते हो क्योंकि तुम पूर्ण आत्मा हो।
— तुम परमात्मा की तरफ से मेरे लिए एक सुन्दरतम तोहफा हो, तुम शुभ संस्कारी आत्मा हो, तुम्हारे रूप में मुझे परमात्मा की दिव्य संतान प्राप्त हो रही है, परमात्मा ने तुम्हें सभी विलक्षण गुणों से परिपूर्ण करके ही भेजा है, परमात्मा की दिव्य संतान के रूप में तुम दिव्य कार्य करने के लिए ही आए हो। मेरे बच्चे! तुम
ईश्वर का परम प्रकाश रूप हो, परमात्मा की अनंत शक्ति तुम्हारे अंदर विद्यमान है, ईश्वर का तेज तुम्हारे माथे पर चमक रहा है, परमात्मा के प्रेम की चमक तुम्हारी आँखों में दिखाई देती है, तुम ईश्वर के प्रेम का साक्षात भण्डार हो, तुम परमात्मा के एक महान उद्देश्य को लेकर इस संसार में आ रहे हो, परमात्मा ने तुम्हें इंसान रूप में इंसानियत के सभी गुणों से भरपूर किया है।
— तुम हर इंसान को परमात्मा का रूप समझते हो, और सभी के साथ प्रेम का व्यवहार करते हो, तुम जानते हो अपने जीवन के महानतम लक्ष्य को, तुम्हें इस संसार की सेवा करनी है, सभी से प्रेम करना है, सभी की सहायता करनी है, और परमात्मा ने जो विशेष लक्ष्य तुम्हें दिया है, वह तुम्हें अच्छे से याद रहेगा।
— परमात्मा की भक्ति में तुम्हारा मन बहुत लगता है, तुम प्रभु के गुणों का गायन करके बहुत खुश होते हो, तुम्हारे रोम-रोम में प्रभु का प्रेम बसा हुआ है। स्त्रियों के प्रति तुम विशेष रूप से आदर का भाव अनुभव करते हो, सभी स्त्रियों को सम्मान की दृष्टि से देखते हो।
— तुम्हारा उद्देश्य संसार में सबको खुशियाँ बाँटना है, सब तरह से आजाद रहते हुए तुम सबको कल्याण का मार्ग दिखाने आ रहे हो, परमात्मा से प्राप्त जीवन से तुम पूर्ण रूप से संतुष्ट हो, तुम सदैव परमात्मा के साये में सुरक्षित हो।
— मानव जीवन के संघर्षो को जीतना तम्हें खूब अच्छी तरह से आता है, जीवन के प्रत्येक कार्य को करने का तुम्हारा तरीका बहुत प्यारा है, जीवन की हर परेशानी का हल ढूँढने में तुम सक्षम हो, तुम हमेशा अपने जीवन के परम लक्ष्य की ओर निरंतर आगे बढ़ते रहोगे।
— मेरी तरह तुम्हारे पिता भी तुम्हें देखने के लिए आतुर हैं, मेरा और तुम्हारे पिता का आशीष सदैव तुम्हारे साथ है।
— यह पृथ्वी हमेशा से प्रेम करने वाले अच्छे लोगों से भरी हुई है, यह सृष्टि परमात्मा की अनंत सुंदरता से भरी हुई है, यहाँ के सभी सुख तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं, गर्भावस्था का यह सफर तुम्हें परमात्मा के सभी दैविक संस्कारों से परिपूर्ण कर देगा।
—घर के सभी सदस्यों का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है।
गर्भ संवाद:
“मेरे बच्चे, तुम मेरे जीवन का सबसे बड़ा खजाना हो। तुम्हारे बिना मेरा जीवन खाली और अधूरा लगता है। मैं तुम्हें हर खुशी देने और तुम्हें सुरक्षित रखने का वादा करती हूं। जब मैं तुम्हारी हलचल महसूस करती हूं, तो यह मुझे याद दिलाता है कि मेरी दुनिया तुम्हारे इर्द-गिर्द घूमती है। तुम्हारे आने से मेरी जिंदगी में हर रंग भर जाएगा।”
पहेली:
न काशी, न काबाधाम
बिन जिसके हो चक्का जाम।
पानी जैसी चीज है वह
झट बताओ उसका नाम।
कहानी: वन के रक्षक
प्राकृतिक सौंदर्य और वनस्पतियों की अनमोल धरोहर से परिपूर्ण वन हमेशा से मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। इनमें छिपे जीवन, उनकी धड़कनें और उनकी एकता में बसा सामूहिक अस्तित्व हर किसी के लिए एक प्रेरणा स्रोत होते हैं। लेकिन जब यह वन संकट में आते हैं, जब उनकी छांव और शांति को खतरा होता है, तब कुछ लोग उनकी रक्षा के लिए खड़े होते हैं। ऐसी ही एक प्रेरक कहानी उस वीर व्यक्ति की है जिसने अपने जीवन को वन की रक्षा के लिए समर्पित किया और अपनी वीरता, साहस और प्रतिबद्धता से अनगिनत जीवन बचाए।
यह कहानी एक छोटे से गाँव के एक युवक अर्जुन की है। अर्जुन का जन्म एक वनवासी परिवार में हुआ था। बचपन से ही उसने जंगल को अपने घर जैसा समझा था। उसके पिता और दादा पीढ़ियों से जंगलों के पास रहते आए थे और उनका जीवन जंगल से ही जुड़ा था। अर्जुन ने हमेशा अपने परिवार से यह सुना था कि जंगल केवल एक संसाधन नहीं है, बल्कि यह जीवन का आधार है। जंगल में रहनेवाले जीव-जंतु, पौधे और वृक्ष हर किसी की मदद करते हैं और अगर जंगल को नुकसान पहुँचाया गया, तो इसका असर सीधे-सीधे हमारे जीवन पर पड़ेगा ।
अर्जुन के बचपन की अधिकांश यादें जंगल में बिता हुआ समय था। वह पेड़ों से प्रेम करता था, उनके साथ खेलता था और उनके बारे में गहरी जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करता था। उसे यह महसूस हुआ कि जब जंगल सशक्त होता है, तो जीवन भी स्वस्थ और समृद्ध होता है। जंगल की आवाज़ें, पत्तियों की सरसराहट, पंखों की हल्की फड़फड़ाहट और विभिन्न जीवों के शोर उसके लिए शांति और संतुलन का प्रतीक थीं।
लेकिन एक दिन, अर्जुन को यह खबर मिली कि उस क्षेत्र के जंगलों में बड़े पैमाने पर कटाई हो रही थी। जंगल के अंदर कीमती लकड़ी की तस्करी हो रही थी और पर्यावरण पर इस अव्यवस्थित कटाई का गहरा असर हो रहा था। यह सुनकर अर्जुन का दिल टूट गया। वह समझ गया कि अगर यह कटाई यूँ ही जारी रही तो जंगल और उसके पर्यावरणीय तंत्र का नष्ट होना तय है।
अर्जुन ने ठान लिया कि वह किसी भी हालत में इस जंगल की रक्षा करेगा। उसने अपने गाँव के बुजुर्गों से जंगल के संरक्षण के बारे में सुनी हुई पुरानी कहानियाँ याद कीं। गाँव के लोग कहते थे कि जंगल की आत्मा होती है और उसके रक्षक ही उसकी रक्षा करते हैं। अर्जुन ने तय किया कि वह इस जंगल का रक्षक बनेगा, भले ही इसके लिए उसे अपनी जान क्यों न दांव पर लगानी पड़े।
उसने सबसे पहले गाँव के कुछ और युवाओं को अपने साथ लिया और एक योजना बनाई। वे जंगल के चारों ओर गश्त करेंगे, ताकि तस्करों की गतिविधियों का पता चल सके और उन्हें समय रहते रोकने का प्रयास किया जा सके।
अर्जुन ने यह भी सुनिश्चित किया कि जंगल की जैव विविधता को बनाए रखने के लिए पेड़ों की अंधाधुंध कटाई को रोकने के लिए गाँव के लोगों को जागरूक किया जाए। उसने यह समझाया कि जंगल की रक्षा केवल जंगल के लिए नहीं, बल्कि समग्र मानवता के लिए भी आवश्यक है। जंगल न केवल पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने में मदद करता है, बल्कि यह हमें जल, वायु और अन्न की आपूर्ति भी करता है।
अर्जुन और उसके साथी रात-रात भर जंगल की निगरानी करते थे। उन्होंने तस्करों को पकड़ने के लिए जाल बिछाए, और धीरे-धीरे उनकी अवैध गतिविधियों को कम किया। एक रात, जब वे जंगल के एक घने हिस्से में गश्त कर रहे थे, उन्होंने देखा कि कुछ लोग चुपके से पेड़ काट रहे थे।
अर्जुन ने अपनी टोली को इशारा किया और वे चुपके से तस्करों के पास पहुँचे। एक बार तस्करों को पकड़ लिया गया, तो अर्जुन ने उन्हें चेतावनी दी कि अगर उन्होंने फिर से ऐसा किया, तो गाँव के लोग उनकी सहायता नहीं करेंगे। यह एक महत्वपूर्ण कदम था, क्योंकि इससे तस्करों को समझ में आ गया कि अब जंगल के रक्षक जाग गए हैं।
समय के साथ, अर्जुन का नाम जंगल के रक्षक के रूप में प्रसिद्ध हो गया। उसकी मेहनत और दृढ़ता ने गाँववालों को प्रेरित किया। उन्होंने भी जंगल के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझी और वन संरक्षण में हाथ बटाने लगे।
अर्जुन ने गाँव के स्कूलों में भी वन्य जीवन और पर्यावरण संरक्षण के बारे में शिक्षा देना शुरू किया। वह बच्चों को यह समझाता कि अगर हमें अपने भविष्य को सुरक्षित करना है, तो हमें अपने जंगलों की रक्षा करनी होगी।
एक दिन अर्जुन ने एक बड़े सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें उसने विभिन्न विशेषज्ञों को बुलाया जो पर्यावरण और वन्य जीवन के संरक्षण में काम कर रहे थे। इस सम्मेलन ने जंगल की अहमियत को और अधिक लोगों तक पहुँचाया और एक व्यापक आंदोलन का रूप लिया। अर्जुन की लगन और समर्पण ने उसे एक आदर्श बना दिया। उसकी मेहनत ने यह साबित किया कि एक व्यक्ति अगर ठान ले, तो वह किसी भी समस्या का हल निकाल सकता है, चाहे वह समस्या कितनी भी बड़ी क्यों न हो।
अर्जुन की कोशिशों ने जंगल की कटाई को रोकने में मदद की, और वह क्षेत्र धीरे-धीरे पुनः हरियाली से भर गया। पेड़-पौधों की वृद्धि होने लगी, और वन्य जीवों की संख्या भी बढ़ने लगी। अर्जुन ने यह सिद्ध कर दिया कि जब हम किसी उद्देश्य के प्रति समर्पित होते हैं तो उस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए हमें अपने मन, समय और शक्ति का सही उपयोग करना होता है।
वह अब एक उदाहरण बन चुका था और उसके नाम से न केवल गाँव में बल्कि आस-पास के इलाकों में भी जंगल की रक्षा के प्रति जागरूकता फैलने लगी।
अर्जुन ने यह साबित कर दिया कि जब हम अपने प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करते हैं, तो हम न केवल प्रकृति का, बल्कि मानवता का भी संरक्षण करते हैं।
शिक्षा
समुद्र की तरह विशाल और शक्तिशाली जंगलों का संरक्षण प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। अर्जुन की तरह अगर हम अपनी जिम्मेदारी समझें और सामूहिक प्रयास करें तो हम पर्यावरण की रक्षा कर सकते हैं। जंगल हमारी जीवन रेखा हैं और उनका संरक्षण हमारे भविष्य के लिए आवश्यक है। अर्जुन ने हमें यह सिखाया कि कोई भी कार्य, चाहे वह कितना भी कठिन क्यों न हो अगर हमारी नीयत सही हो और हमें अपने उद्देश्य में विश्वास हो तो हम सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
पहेली का उत्तर : पैट्रोल
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प्रार्थना:
हे हंसवाहिनी ज्ञान दायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे।।
जग सिरमौर बनाएँ भारत,
वह बल विक्रम दे। वह बल विक्रम दे।।
हे हंसवाहिनी ज्ञान दायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे..
साहस शील हृदय में भर दे,
जीवन त्याग-तपोमय कर दे,
संयम सत्य स्नेह का वर दे,
स्वाभिमान भर दे। स्वाभिमान भर दे ॥ १ ॥
हे हंसवाहिनी ज्ञान दायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे..
लव-कुश, ध्रुव, प्रहलाद बनें हम
मानवता का त्रास हरें हम,
सीता, सावित्री, दुर्गा मां,
फिर घर-घर भर दे। फिर घर-घर भर दे॥२॥
हे हंसवाहिनी ज्ञान दायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे..
मंत्र:
ॐ असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मामृतं गमय॥
अर्थ— हे प्रभु! हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलें।
अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलें।
मृत्यु से अमरता की ओर ले चलें।
गर्भ संवाद:
मेरे प्यारे शिशु, मेरे बच्चे, मैं तुम्हारी माँ हूँ …… माँ!
— आज मैं तुम्हे तुम्हारे कुछ महानतम गुणों की याद दिला रही हूँ जो तुम्हें परमात्मा का अनमोल उपहार हैं।
— प्रेम स्वरूप परमात्मा का अंश होने के कारण तुम्हारा हृदय भी प्रेम से भरपूर है, तुम्हारी हर अदा में परमात्मा का प्रेम झलकता है।
— तुम्हारे हृदय में सम्पूर्ण मानवमात्र के प्रति समभाव है।
— तुम्हारा हृदय सबके लिए दया और करुणा से भरपूर रहता है।
— क्षमाशीलता के गुण के कारण सभी तुम्हारा सम्मान करते हैं, जिससे तुम्हारा स्वभाव और विनम्र हो जाता है।
— नम्रता तुम्हारा विशेष गुण है।
— मेरे बच्चे। तुम्हारा प्रत्येक कार्य सेवा-भाव से परिपूर्ण होता है।
— सहनशीलता तुम्हारा स्वाभाविक गुण है।
— धैर्यपूर्वक प्रत्येक कार्य को करना तुम्हारी महानता है।
— तुम्हारा मन आंतरिक रूप से स्थिर और शांत है।
— मेरे बच्चे! तुम बल और साहस के स्वामी हो।
— तुम अनुशासन प्रिय हो।
— कृतज्ञता का गुण तुम्हारे व्यवहार की शोभा बढ़ाता है।
— तुम अपनो से बड़ों को सम्मान और छोटों को प्रेम देते हो।
— तुम भाव से बहुत भोले हो लेकिन जरूरत पड़ने पर अपनी कठोरता भी दिखाते हो।
— तुम अपनो से छोटों के लिए प्रेरणा के स्त्रोत हो।
— तुम सत् और असत के पारखी हो।
— तुम्हारा व्यवहार चन्द्रमा के समान शीतल है।
— तुम सबसे इतना मीठा बोलते हो कि सभी तुम पर मोहित हो जाते हैं।
— तुम्हारा व्यक्तित्व परम प्रभावशाली है।
— तुम हमेशा सत्य बोलना ही पसंद करते हो।
— तुम हाजिर जवाबी हो।
— तुम्हारे मुख से निकला एक-एक शब्द मधुर और आकर्षक होता है।
— तुम मन, वचन और कर्म से पवित्र हो।
— घर के सभी सदस्यों का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है। तुम्हारे रूप में मुझे जैसे दिव्य संतान प्राप्त हो रही है, तुम्हे पाकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। जल्द ही इस सुन्दर संसार में तुम्हारा आगमन होगा। तुम्हारा स्वागत करने के लिए सभी बेचैन हैं।
गर्भ संवाद:
“मेरे प्यारे बच्चे! तुम्हारी मासूमियत मेरी आत्मा को सुकून देती है। जब मैं तुम्हारे बारे में सोचती हूं, तो मेरी आंखों में अपने आप खुशी के आंसू आ जाते हैं। मैं चाहती हूं कि तुम्हारा जीवन हमेशा मासूमियत और दया से भरा हो। तुम्हारा हर पल मेरी दुनिया को और खास बनाता है।”
पहेली:
शुरू कटे तो नमक बने,
मध्य कटे तो कान।
अंत कटे तो काना बने,
जो न जाने उसका बाप शैतान।
कहानी: प्रार्थना का प्रभाव
एक छोटे से गाँव में एक साधारण परिवार रहता था, जिसमें एक पिता, मां और उनका बेटा था। यह परिवार बहुत ही खुशहाल था, लेकिन उनके जीवन में एक समस्या थी जो उनका मन हमेशा परेशान किए रहती थी। उनका बेटा रामु, बचपन से ही शारीरिक रूप से कमजोर था और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहा था। गाँव के डॉक्टरों से इलाज कराने के बावजूद रामु की तबियत में कोई खास सुधार नहीं हो रहा था।
रामु की मां राधा, उसे बहुत प्यार करती थी। उसे देख-देख कर राधा का दिल तड़पता था क्योंकि वह जानती थी कि रामु के जीवन में हर दिन एक संघर्ष है। उसने रामु के इलाज के लिए हर संभव कोशिश की लेकिन सब व्यर्थ ही जाता था। एक दिन, राधा ने गाँव के मंदिर में जाकर बैठने का फैसला किया। वह जानती थी कि अब उसके पास कोई और रास्ता नहीं था। उसने एक त्वरित निर्णय लिया कि वह अब भगवान से प्रार्थना करेगी, क्योंकि उसे विश्वास था कि प्रार्थना का एक विशेष प्रभाव होता है और अगर प्रार्थना दिल से की जाए तो वह कभी व्यर्थ नहीं जाती।
राधा रोज़ मंदिर जाती और भगवान से अपनी परेशानियों का समाधान मांगती। वह अपनी पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ प्रार्थना करती थी।
गाँव में लोग राधा की प्रार्थना के बारे में सुनते थे और कई लोग इसे सिर्फ़ एक साधारण धार्मिक गतिविधि समझते थे लेकिन राधा को पूरा यकीन था कि वह जो कर रही है वह सही है।
एक दिन एक साधु बाबा गाँव में आए और राधा से मिले। उन्होंने राधा से पूछा “तुम दिन-रात भगवान से क्या प्रार्थना करती हो और तुम्हारा विश्वास इतना गहरा क्यों है?” राधा ने उन्हें रामु की बीमारी और उसकी चिंताओं के बारे में बताया। बाबा मुस्कराए और बोले, “जो लोग सच्चे मन से प्रार्थना करते हैं, उनका मन कभी निराश नहीं होता। प्रार्थना एक महान शक्ति है और उसका प्रभाव समय के साथ धीरे-धीरे सामने आता है।”
राधा ने बाबा की बातों को गहराई से सुना और फिर से भगवान से प्रार्थना की। इस बार, उसने अपनी प्रार्थना में कुछ विशेष जोड़ दिया। उसने कहा “हे भगवान यदि यह मेरे बेटे के लिए अच्छा हो, तो कृपया उसकी बीमारी को दूर करें। अगर इस बीमारी के माध्यम से वह कुछ सीख सकता है, तो मुझे स्वीकार है लेकिन कृपया उसे हर दर्द से मुक्त कर दो, ताकि वह एक स्वस्थ जीवन जी सके।”
राधा की प्रार्थना न केवल उसकी आत्मा को शांति देती थी, बल्कि प्रार्थना से उसकी आस्था और विश्वास भी मजबूत हो गया था।
उसकी जीवन शक्ति उसकी प्रार्थनाओं में समाहित हो गई थी। और फिर एक दिन, वह चमत्कारी बदलाव आया। रामु की तबियत में धीरे-धीरे सुधार होने लगा। पहले तो उसे खांसते हुए आराम आना शुरू हुआ। फिर उसकी कमजोरी में कमी आई और कुछ ही दिनों में उसकी पूरी सेहत में सुधार हो गया। राधा के दिल में यह बात पूरी तरह से बैठ गई कि प्रार्थना का प्रभाव बहुत शक्तिशाली होता है। वह भगवान की कृपा से विश्वास करने लगी थी और उसका आत्मविश्वास और भी बढ़ गया।
रामु की तबियत में सुधार देखकर गांव वाले हैरान रह गए। उन्होंने राधा से पूछा कि वह क्या कर रही थी जिससे रामु की सेहत में अचानक सुधार हुआ।
राधा मुस्कुराते हुए बोली, “यह सब भगवान की कृपा और सच्चे विश्वास का परिणाम है। मैंने अपनी पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ प्रार्थना की और भगवान ने मेरी प्रार्थना सुनी। अगर हम ईमानदारी से किसी चीज के लिए प्रार्थना करते हैं, तो उसका प्रभाव जरूर होता है।”
राधा का यह अनुभव और उसका विश्वास सभी के लिए एक प्रेरणा बन गया। गाँव के लोग अब यह समझने लगे थे कि प्रार्थना सिर्फ एक धार्मिक क्रिया नहीं है बल्कि यह हमारी आस्था और विश्वास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब हम सच्चे दिल से प्रार्थना करते हैं, तो यह न केवल हमें मानसिक शांति देती है, बल्कि यह हमारे जीवन में चमत्कारी बदलाव भी ला सकती है।
राधा ने अपने बेटे की बीमारी से उबरने के बाद यह सिखाया कि कभी भी किसी परिस्थिति में निराश नहीं होना चाहिए बल्कि भगवान में विश्वास और प्रार्थना से हम हर कठिनाई का सामना कर सकते हैं।
शिक्षा
प्रार्थना केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह एक मानसिक शक्ति भी है। जब हम किसी कठिन परिस्थिति में होते हैं और हमारी कोशिशें व्यर्थ होती हैं तो प्रार्थना हमारी आत्मा को शांति देती है और हमें विश्वास देती है कि हमें हर समस्या का हल मिलेगा। सच्चे मन से की गई प्रार्थना का प्रभाव अवश्य होता है, क्योंकि यह हमारी आस्था और विश्वास को मजबूत करती है। राधा की तरह अगर हम भी किसी समस्या का हल प्रार्थना और विश्वास के साथ ढूंढें तो जीवन में सुखशांति और समाधान मिलेगा।
पहेली का उत्तर : कानून
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प्रार्थना:
हे शारदे माँ, हे शारदे माँ
अज्ञानता से हमें तारदे माँ
हे शारदे माँ, हे शारदे माँ
अज्ञानता से हमें तार दे माँ
तू स्वर की देवी, ये संगीत तुझसे
हर शब्द तेरा है, हर गीत तुझसे
हम है अकेले, हम है अधूरे
तेरी शरण हम, हमें प्यार दे माँ
हे शारदे माँ, हे शारदे माँ
अज्ञानता से हमें तार दे माँ
मुनियों ने समझी, गुणियों ने जानी
वेदों की भाषा, पुराणों की बानी
हम भी तो समझे, हम भी तो जाने
विद्या का हमको अधिकार दे माँ
हे शारदे माँ, हे शारदे माँ
अज्ञानता से हमें तार दे माँ
तू श्वेतवर्णी, कमल पर विराजे
हाथों में वीणा, मुकुट सर पे साजे
मन से हमारे मिटाके अँधेरे
हमको उजालों का संसार दे माँ
हे शारदे माँ, हे शारदे माँ
अज्ञानता से हमें तार दे माँ
मंत्र:
योगस्थः कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।
अर्थ: भगवान कहते है— हे अर्जुन! सफलता और असफलता की आसक्ति को त्याग कर तुम दृढ़ता से अपने कर्तव्य का पालन करो। यही समभाव योग कहलाता है।
गर्भ संवाद:
मेरे प्यारे शिशु, मेरे बच्चे, मैं तुम्हारी माँ हूं…… माँ!
— आज मैं तुम्हे तुम्हारे कुछ भौतिक गुणों की याद दिला रही हूँ जो तुम्हे परमात्मा का अनमोल उपहार हैं।
— परम तेजस्वी ईश्वर का अंश होने के कारण तुम्हारे मुख पर सूर्य के समान दिव्य तेज और ओज रहता है।
— तुम्हारे नैन-नक्श तीखे और बहुत सुन्दर है, तुम्हारा सुन्दर मुखड़ा सबको बहुत प्यारा लगता है।
— तुम्हारे चेहरे का रंग गोरा और सबका मन मोह लेने वाला है।
— तुम्हारी हर अदा सुन्दरतम ईश्वर की झलक लिए हुए है, तुम्हारा माथा चौड़ा है, तुम्हारी आँखें बड़ी है, तुम्हारी भौहें तीर के आकार की तरह बड़ी है, तुम्हारी पलकें काली और बड़ी हैं।
— तुम्हारे होंठ फूल की तरह कोमल और सुन्दर हैं, तुम्हारे चेहरे पर हर पल एक मधुर मुस्कान छाई रहती है।
— तुम्हारी बुद्धि कुशाग्र है, तुम्हारी वाणी मधुर और सम्मोहन करने वाली है।
— तुम बहुत अच्छे खिलाडी हो, तुम्हारा शरीर तंदुरुस्त और फुर्तीला है। (किसी विशेष खेल के प्रति शिशु के मन में प्रतिभा विकसित करनी हो तो यहाँ कह सकते हैं)
— तुम बहुत सुंदर दिखते हो, बड़े होने पर भी तुम्हारी सुंदरता और निखरती जाएगी।
— तुम्हारी हर अदा बहुत निराली और अनोखी है।
— घर के सभी सदस्यों का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है। तुम्हारे रूप में मुझे जैसे दिव्य संतान प्राप्त हो रही है, तुम्हे पाकर में बहुत प्रसन्न हूँ, जल्द ही इस सुन्दर संसार में तुम्हारा आगमन होगा। तुम्हारा स्वागत करने के लिए सभी बेचैन है।
गर्भ संवाद
मेरे बच्चे! तुम्हारे आने से मेरी जिंदगी हर दिन एक जश्न जैसी होगी। मैं तुम्हें अपनी बाहों में लेकर हर पल को जीने के लिए उत्सुक हूं। तुम्हारे साथ बिताए गए हर पल को मैं अपनी सबसे अनमोल यादों में संजो लूंगी। तुम मेरे जीवन का सबसे बड़ा उपहार हो।”
पहेली:
शिवजी जटा में गंगा का पानी
जल का साधु, बूझो तो ज्ञानी।
कहानी: संत का संदेश
एक समय की बात है एक छोटे से गाँव में एक संत रहते थे। उनका नाम संत रामदास था और वे अपनी सरलता, विनम्रता और ज्ञान के लिए पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध थे। संत रामदास हमेशा लोगों को अच्छे कार्य करने की प्रेरणा देते थे और उन्हें यह समझाते थे कि जीवन का असली उद्देश्य केवल भौतिक सुखों की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मा की शांति और मानसिक संतुलन है।
गाँव में एक व्यापारी था जिसका नाम विक्रम था। विक्रम बहुत ही अमीर था लेकिन वह हमेशा किसी न किसी परेशानी में घिरा रहता था। उसे यह समझ में नहीं आता था कि इतने धन के बावजूद भी उसका मन शांत क्यों नहीं रहता। एक दिन, विक्रम ने संत रामदास से मिलने का निश्चय किया, ताकि वह अपने जीवन में शांति और संतोष पा सके। विक्रम ने संत से निवेदन किया, “प्यारे संत! मुझे धन, ऐश्वर्य और सुख सब कुछ प्राप्त है, लेकिन फिर भी मेरा मन अशांत है। मुझे कोई उपाय बताएं जिससे मैं सच्ची शांति पा सकूं।”
संत रामदास मुस्कराए और विक्रम से कहा, “तुम्हारे पास सब कुछ है लेकिन तुम्हारे भीतर जो खालीपन है वह किसी भी भौतिक सुख से नहीं भर सकता। शांति और संतोष केवल बाहरी दुनिया से नहीं बल्कि अपने अंदर से प्राप्त होते हैं। तुम चाहते हो कि तुम्हारे जीवन में शांति हो लेकिन तुमने कभी अपने भीतर झांकने की कोशिश की है?”
विक्रम को संत की बातें समझ नहीं आईं। वह सोचने लगा, “क्या सचमुच अंदर कुछ ऐसा है जो मुझे शांति दे सकता है?” लेकिन फिर भी उसने संत के शब्दों को नजरअंदाज नहीं किया और एक सप्ताह बाद फिर से संत से मिलने पहुँचा। विक्रम ने संत से पूछा “क्या आप मुझे कोई उपाय बता सकते हैं, जिससे मैं अंदर की शांति को पा सकूँ?”
संत रामदास ने उसे एक सरल उपाय बताया। उन्होंने कहा, “तुम हर दिन कुछ समय अपनी दिनचर्या से निकालकर चुपचाप बैठो और ध्यान करो।”
विक्रम ने संत की बातों को ध्यान से सुना और एक महीने के लिए यह अभ्यास करने का निर्णय लिया। शुरुआत में उसे यह थोड़ा अजीब लगा लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया वह अनुभव करने लगा कि उसे पहले से कहीं अधिक शांति मिल रही थी। उसका मन स्थिर होने लगा और वह आंतरिक शांति का अनुभव करने लगा।
विक्रम ने देखा कि वह पहले कोई समस्या आने पर घबरा जाया करता था लेकिन अब वह हर स्थिति को एक नई दृष्टि से देखता था। वह समझ गया था कि शांति बाहरी दुनिया में नहीं, बल्कि अंदर के संतुलन और आत्म-साक्षात्कार में है।
एक दिन विक्रम फिर से संत रामदास से मिलने पहुँचा और उन्हें बताया, “संतजी, मैंने आपकी बातों को आत्मसात किया और अब मैं शांति महसूस कर रहा हूँ। मुझे यह समझ में आ गया है कि सच्ची शांति केवल बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से आती है। अब मैं समझता हूँ कि जीवन का असली उद्देश्य क्या है।”
संत रामदास ने विक्रम की बातों को सुनकर मुस्कराते हुए कहा, “तुमने वह सच्चाई समझ ली, विक्रम! अब तुम्हारा जीवन और भी अधिक खुशहाल और संतुष्ट होगा। ध्यान, साधना, और आत्म-साक्षात्कार ही वह मार्ग हैं जो तुम्हें वास्तविक सुख और शांति की ओर ले जाते हैं। बाहरी चीजों से मिलने वाली खुशी अस्थायी होती है, जबकि आंतरिक शांति स्थायी होती है। इस शांति को पाकर तुम न केवल अपने जीवन को बेहतर बना सकोगे, बल्कि दूसरों के जीवन में भी शांति का संदेश फैलाने में सक्षम हो सकोगे।”
विक्रम ने संत रामदास को धन्यवाद कहा और उनके बताये रास्ते पर चलने का संकल्प लिया। अब विक्रम न केवल स्वयं को शांति और संतोष का अनुभव कर रहा था, बल्कि वह दूसरे लोगों को भी आंतरिक शांति की ओर मार्गदर्शन करने लगा। उसने गाँव में कई लोगों को ध्यान और साधना की विधि सिखाई, और जल्द ही पूरे गाँव में शांति का वातावरण छा गया।
शिक्षा
संत रामदास का संदेश हमें यह सिखाता है कि शांति और संतोष का स्रोत बाहरी दुनिया में नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर छिपा हुआ है। हमें अपनी भीतरी दुनिया को समझने और उसे शांत करने के लिए समय निकालना चाहिए। ध्यान, साधना, और आत्म-साक्षात्कार के माध्यम से हम अपनी आंतरिक शांति को प्राप्त कर सकते हैं। जब हम अपने भीतर की शांति को महसूस करते हैं, तो हमारा बाहरी जीवन भी शांति और संतोष से भर जाता है। यही जीवन का असली उद्देश्य है।
पहेली का उत्तर : नारियल
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प्रार्थना:
माँ सरस्वती वरदान दो,
मुझको नवल उत्थान दो।
यह विश्व ही परिवार हो,
सब के लिए सम प्यार हो ।
आदर्श, लक्ष्य महान हो । माँ सरस्वती..........
मन, बुद्धि, हृदय पवित्र हो,
मेरा महान चरित्र हो।
विद्या विनय वरदान दो। माँ सरस्वती....
माँ शारदे हँसासिनी,
वागीश वीणा वादिनी।
मुझको अगम स्वर ज्ञान दो।
माँ सरस्वती, वरदान दो।
मुझको नवल उत्थान दो।
उत्थान दो। उत्थान दो...।
मंत्र:
ॐ असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मामृतं गमय॥
अर्थ— हे प्रभु! हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलें।
अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलें।
मृत्यु से अमरता की ओर ले चलें।
गर्भ संवाद:
मेरे प्यारे शिशु मेरे बच्चे, मैं तुम्हारी माँ हूं…… माँ!
— आज मैं तुम्हे तुम्हारे कुछ महानतम गुणों की याद दिला रही रही हूँ जो तुम्हे परमात्मा का अनमोल उपहार है।
— मेरे बच्चे! तुम्हारे मस्तिष्क में अपार क्षमता है। तुम्हारी बुद्धि तीव्र है।
— तुम आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक जैसी क्षमता लेकर आ रहे हो। तुममे कठिन से कठिन समस्या को सुलझाने की योग्यता है।
— तुम रामानुजन जैसी गणित के सवालों को हल करने की क्षमता रखते हो।
— विवेकानंद जैसी महान प्रतिभा है तुममें।
— तुम्हारी याददाश्त बहुत अच्छी है, जो बात तुम याद रखना चाहो तुम्हें सदा याद रहती है।
— तुम्हारी एकाग्रता कमाल की है। जिस काम पर तुम फोकस करते हो उसमें बेहतरीन परिणाम लेकर आते हो।
— कोई भी विषय, कोई भी टॉपिक तुम्हारे लिए कठिन नहीं, हर विषय को अपनी लगन से, परिश्रम से तुम सरल बना लेते हो।
— तुम्हारे भीतर अनंत संभावनाएं छुपी हुई है।
— तुम्हें म्यूजिक का बहुत शौक है, तुम सभी वाद्य यंत्र बजाना जानते हो। ढोलक, गिटार, तबला, हारमोनियम, तुम बहुत अच्छे से बजा सकते हो।
— तुम्हारा दिमाग बहुत तेज चलता है। मुश्किल से मुश्किल समस्या का भी तुम बड़ी आसानी से हल निकाल लेते हो।
— तुम्हारी वाणी में मिठास है। तुम एक बहुत अच्छे गायक हो। जब तुम गाते हो तो सभी मंत्रमुग्ध हो जाते है।
— तुम्हें पढ़ाई में सभी सब्जेक्ट अच्छे लगते है। जो भी पढ़ते हो बड़ी आसानी से याद हो जाता है।
गर्भ संवाद
“मेरे बच्चे! तुम मेरे हर सपने का सच हो। तुम्हारे बारे में सोचकर मैं हर मुश्किल को पार कर लेती हूं। तुम्हारे आने से मेरी जिंदगी को एक नया अर्थ मिला है। मैं हर दिन तुम्हारे उज्ज्वल भविष्य की कल्पना करती हूं।”
पहेली:
मंदिर में इसे शीश नवायें,
मगर राह में ठुकराये।
कहानी: नदी की लहरें
एक घने जंगल के बीच बहती थी एक नदी, जिसका नाम था नंदिनी। नंदिनी नदी पहाड़ों से निकलकर खेतों और गांवों से होकर गुजरती थी। वह अपनी निर्मल धारा से जीवन देती और सभी को खुशहाल बनाती। उसकी लहरों में एक अद्भुत संगीत था, जो उसके पास आने वाले हर किसी को शांत और प्रेरित करता था।
नंदिनी की लहरें दिन-रात बिना रुके बहती थीं। लेकिन उसकी धारा में कई चुनौतियां भी थीं। कभी ऊंचे-ऊंचे पत्थरों से टकराना पड़ता, तो कभी तेज़ बारिश से उसका जलस्तर बढ़ जाता। लेकिन इन सबके बावजूद नंदिनी कभी रुकती नहीं थी। वह हमेशा बहती रहती, क्योंकि उसे पता था कि रुकने का मतलब है अपना अस्तित्व खो देना।
एक दिन, नंदिनी के तट पर एक युवक बैठा था, जिसका नाम अर्जुन था। अर्जुन बहुत दुखी था। उसने अपने जीवन की कठिनाइयों से हार मान ली थी और उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि वह आगे क्या करे। उसने नंदिनी की लहरों को ध्यान से देखा। वे कभी शांत होतीं, कभी तेज़ बहतीं, और कभी बड़े पत्थरों से टकराकर भी अपनी दिशा बदल लेतीं।
अर्जुन ने नंदिनी से पूछा “हे नदी, तुम इतनी कठिनाइयों के बावजूद कैसे हमेशा बहती रहती हो? क्या तुम्हें डर नहीं लगता कि तुम बर्बाद हो जाओगी?”
नंदिनी की लहरें मुस्कराईं और बोलीं, “डर तो सबको लगता है, लेकिन रुक जाना कभी समाधान नहीं होता। मेरे मार्ग में पत्थर आते हैं, मुझे चोट पहुंचाते हैं, लेकिन मैं उनसे सीखती हूं कि कैसे बहना है। बारिश मेरे जलस्तर को बढ़ा देती है, लेकिन मैं उसे अपने प्रवाह में बदल देती हूं। जीवन में कठिनाइयां आती हैं, लेकिन वे हमें मजबूत बनाती हैं।” अर्जुन ने यह सुनकर कहा, “लेकिन मैं अपनी समस्याओं से लड़ने की हिम्मत खो चुका हूं। मेरे पास कोई मार्ग नहीं बचा है।”
नंदिनी ने कहा, “क्या तुम्हें पता है कि मेरा पानी कहां जाता है? यह गांवों के खेतों को सींचता है, प्यासे लोगों को पानी देता है, और अंत में समुद्र से मिल जाता है। तुम्हारे जीवन का भी एक उद्देश्य है। अगर मैं रास्ते में रुक जाऊं, तो मेरे पानी का कोई उपयोग नहीं होगा। तुम्हें भी अपनी समस्याओं का सामना करना होगा और अपने उद्देश्य को खोजना होगा।”
अर्जुन ने नंदिनी की बातों पर विचार किया। उसने महसूस किया कि उसकी समस्याएं उसकी लहरों की तरह ही हैं, जो उसे आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश करती हैं। लेकिन जैसे नंदिनी हर चुनौती का सामना करती है और अपनी दिशा बदलती है, वैसे ही उसे भी अपनी सोच और दृष्टिकोण को बदलना होगा।
अर्जुन ने अपनी हार मानने की भावना को छोड़ दिया। उसने तय किया कि वह अपनी समस्याओं का डटकर सामना करेगा और अपने जीवन को नई दिशा देगा। उसने नंदिनी से वादा किया कि वह भी उसकी तरह बहते हुए अपने जीवन का अर्थ खोजेगा।
अर्जुन ने मेहनत की, अपनी गलतियों से सीखा, और धीरे-धीरे उसने अपनी कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर ली। वह अपने जीवन में सफल हुआ और हमेशा नंदिनी की प्रेरणा को याद करता रहा।
शिक्षा
कठिनाइयां जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन उनका सामना करने और उनसे सीखने से ही हम अपने जीवन का सही मार्ग पा सकते हैं। नदी की लहरें हमें सिखाती हैं कि रुकने से कुछ नहीं मिलता, लेकिन आगे बढ़ने से हम अपने उद्देश्य तक पहुंच सकते हैं। जीवन में चाहे कितनी भी समस्याएं आएं, हमें निडर होकर उनका सामना करना चाहिए।
पहेली का उत्तर : पत्थर
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