प्रार्थना:
तूने हमें उत्पन्न किया, पालन कर रहा है तू।
तुझसे ही पाते प्राण हम, दुखियों के कष्ट हरता तू ॥
तेरा महान् तेज है, छाया हुआ सभी स्थान।
सृष्टि की वस्तु-वस्तु में, तू हो रहा है विद्यमान ॥
तेरा ही धरते ध्यान हम, मांगते तेरी दया।
ईश्वर हमारी बुद्धि को, श्रेष्ठ मार्ग पर चला ॥
मंत्र:
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽअत्मानं सृजाम्यहम्॥
अर्थः हे भारत! जब भी धर्म का पतन होता है और अधर्म बढ़ता है, तब मैं अपने आप को सृजित करता हूँ।
गर्भ संवाद
“मेरे बच्चे! तुम्हारा भविष्य जितना सकारात्मक दृष्टिकोण से होगा, उतना ही उसमें सफलताएं होंगी। जब तुम हर परिस्थिति को सकारात्मक रूप में देखोगे, तो तुम्हारा मार्गदर्शन अपने आप सही होगा। किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले अगर तुम अपनी सोच को सकारात्मक रखते हो, तो उस कार्य में सफलता का मार्ग स्वतः ही खुलता है। मैं चाहती हूं कि तुम भविष्य को हमेशा सकारात्मक दृष्टिकोण से देखो, क्योंकि यही तुम्हारे जीवन को रोशन करेगा।”
पहेली:
बीसों का सिर काट लिया,
ना मारा ना खून किया
कहानी: दादी का प्यार
एक छोटे से शहर में आरव नाम का एक लड़का अपनी दादी के साथ रहता था। आरव की माँ का देहांत उसके जन्म के समय हो गया था और उसके पिता काम के सिलसिले में अक्सर शहर से बाहर रहते थे। उसकी दादी, जिनका नाम सुमित्रा था, ने ही उसे माँ और पिता दोनों का प्यार दिया।
दादी का जीवन बहुत साधारण था। वह सुबह-सुबह उठतीं, घर के सारे काम निपटातीं और फिर आरव को स्कूल के लिए तैयार करतीं। आरव का हर काम दादी के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता। चाहे स्कूल की वर्दी प्रेस करनी हो या उसका पसंदीदा खाना बनाना। सुमित्रा का हर दिन आरव के लिए समर्पित था।
आरव को अक्सर यह महसूस होता था कि उसकी दादी उसके लिए कितनी मेहनत करती हैं, लेकिन वह अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाता था। वह एक शरारती लड़का था, जो कभी-कभी अपनी दादी की बात नहीं मानता था। सुमित्रा को कभी गुस्सा नहीं आता था। वह बस मुस्कुराकर कहतीं, “बेटा, जब तुम बड़े हो जाओगे, तो समझोगे कि मेरा प्यार क्या है।”
एक दिन स्कूल में आरव का एक बड़ा प्रोजेक्ट था, जिसके लिए उसे चार्ट पेपर और रंग चाहिए थे। उसने दादी से कहा, “दादी, मुझे प्रोजेक्ट के लिए चीज़ें चाहिए। क्या आप ला देंगी?”
दादी ने वादा किया, लेकिन वह भूल गईं। आरव को बहुत गुस्सा आया। उसने दादी से शिकायत की, “आपको मेरी बात कभी याद नहीं रहती। मैं आपसे कुछ भी नहीं कहूँगा अब!”
सुमित्रा चुपचाप उसकी बात सुनती रहीं। उन्हें दुख हुआ, लेकिन उन्होंने अपनी गलती का कोई बहाना नहीं बनाया। उन्होंने तुरंत बाजार जाकर सारी चीज़ें खरीदीं और आरव के पास लाकर दीं।
आरव ने बिना कुछ कहे सामान ले लिया और अपने कमरे में चला गया। लेकिन रात को जब वह सोने गया, तो उसने देखा कि उसकी दादी अभी भी जाग रही थीं और उसके प्रोजेक्ट के लिए मदद कर रही थीं। उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने पहली बार महसूस किया कि दादी ने उसकी हर ज़रूरत का ध्यान रखा है, चाहे वह छोटी हो या बड़ी।
अगले दिन, आरव ने अपनी दादी के लिए एक छोटी सी चिट्ठी लिखी। उसने लिखा, “दादी, आप मेरी माँ, मेरी दोस्त और मेरी सबसे बड़ी ताकत हो। मुझे माफ कर दो कि मैंने आपको कल डाँटा। मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ।” सुमित्रा ने चिट्ठी पढ़ी और उनकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उन्होंने आरव को गले लगाया और कहा, “तुम्हारी खुशी ही मेरी सबसे बड़ी खुशी है, बेटा।”
शिक्षा
यह कहानी हमें सिखाती है कि माता-पिता और दादा-दादी का प्यार निस्वार्थ और अनमोल होता है। वे अपने बच्चों और पोते-पोतियों के लिए बिना किसी शर्त के त्याग करते हैं। हमें उनके प्यार और मेहनत को समझना चाहिए और उनकी भावनाओं का आदर करना चाहिए। कभी-कभी छोटी-छोटी चीजें, जैसे एक धन्यवाद या प्यार भरे शब्द, उनके दिल को बहुत खुशी दे सकते हैं।
पहेली का उत्तर : नाख़ून
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प्रार्थना:
हे जग त्राता विश्व विधाता,
हे सुख शांति निकेतन।
प्रेम के सिन्धु, दीन के बन्धु,
दुःख दारिद्र विनाशन।
हे जग त्राता विश्व विधाता,
हे सुख शांति निकेतन
हे नित्य अखंड अनंन्त अनादि,
पूरण ब्रह्म सनातन।
हे जग त्राता विश्व विधाता,
हे सुख शांति निकेतन
हे जग आश्रय जग-पति जग-वन्दन,
अनुपम अलख निरंजन।
हे जग त्राता विश्व विधाता,
हे सुख शांति निकेतन
प्राण सखा त्रिभुवन प्रति-पालक,
जीवन के अवलंबन।
हे जग त्राता विश्व विधाता,
हे सुख शांति निकेतन
हे जग त्राता विश्व विधाता,
हे सुख शांति निकेतन
हे सुख शांति निकेतन
हे सुख शांति निकेतन।
मंत्र:
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
अर्थः सभी धर्मों को त्यागकर मेरे एकमात्र शरण में आओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा, चिंता मत करो।
गर्भ संवाद
“मेरे प्यारे बच्चे! तुम्हारा भविष्य तुम्हारी आज की मेहनत पर निर्भर करता है। अगर तुम भविष्य में सफलता पाना चाहते हो, तो तुम्हें अभी से ही मेहनत करनी होगी। हर दिन तुम्हारे प्रयासों का एक हिस्सा होगा जो तुम्हारे भविष्य को साकार करेगा। मैं चाहती हूं कि तुम आज से ही अपने लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाओ, क्योंकि जितनी जल्दी तुम मेहनत शुरू करोगे, उतनी जल्दी तुम अपने सपनों को साकार कर सकोगे।”
पहेली:
तीन अक्षर का मेरा नाम,
पहला कटे तो राम राम
दूसरा कटे तो फल का नाम,
तीसरा कटे तो काटने का काम
कहानी: पिता-पुत्री का अटूट रिश्ता
एक छोटे से शहर में रमेश नाम का एक व्यक्ति अपनी बेटी नेहा के साथ रहता था। नेहा उसकी दुनिया थी, और उसके जीवन का हर फैसला नेहा की खुशी के लिए होता था। नेहा की माँ का निधन तब हुआ था जब वह बहुत छोटी थी। तब से रमेश ने माँ और पिता, दोनों का दायित्व निभाया।
नेहा एक चंचल और जिज्ञासु बच्ची थी। उसके हर सवाल का जवाब रमेश बड़े धैर्य से देता। वह उसे सिखाता कि जीवन में मेहनत और ईमानदारी से बड़ा कोई गुण नहीं है। रमेश के लिए नेहा की हर छोटी खुशी बड़ी थी। चाहे वह स्कूल के किसी प्रोजेक्ट में मदद हो या नेहा की पसंदीदा कहानी सुनाना, रमेश हर पल नेहा के लिए हाजिर रहता।
नेहा का सपना था कि वह बड़ी होकर डॉक्टर बने और जरूरतमंदों की मदद करे। रमेश ने उसका सपना साकार करने के लिए हर संभव प्रयास करने का निश्चय किया। उनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, लेकिन उन्होंने नेहा की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी। वे दिनरात मेहनत करते, ताकि नेहा को उसकी जरूरत की हर चीज मिल सके।
नेहा को भी अपने पिता की मेहनत और त्याग का एहसास था। वह पढ़ाई में बहुत मन लगाती और हमेशा अपने पिता को गर्व महसूस कराती। लेकिन एक दिन, नेहा के स्कूल में एक बड़ी प्रतियोगिता का आयोजन हुआ। नेहा को उसमें भाग लेना था, लेकिन उसके लिए उसे एक महंगी किताब की जरूरत थी।
नेहा ने यह बात अपने पिता को बताई। रमेश ने बिना कोई झिझक उसे वादा किया कि वह किताब खरीद कर देगा। रमेश के पास उस समय पैसे नहीं थे, लेकिन उसने अपनी पुरानी घड़ी को बेचकर वह किताब खरीद ली। जब नेहा ने वह किताब देखी, तो उसकी आँखों में चमक आ गई। रमेश के पास उस समय पैसे नहीं थे, लेकिन उसने अपनी पुरानी घड़ी को बेचकर वह किताब खरीद ली। जब नेहा ने वह किताब देखी, तो उसकी आँखों में चमक आ गई।
नेहा ने प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और पहला स्थान हासिल किया। जब उसने अपनी जीत की ट्रॉफी रमेश को दी, तो उसकी आँखों में गर्व और खुशी के आँसू थे। रमेश ने नेहा को गले लगाते हुए कहा, “तुम्हारी सफलता ही मेरी सबसे बड़ी जीत है, बेटा।”
समय बीता, और नेहा बड़ी होकर एक सफल डॉक्टर बन गई। उसने अपने पिता के संघर्ष और त्याग को कभी नहीं भूला। जब उसने अपनी पहली कमाई से एक नई घड़ी खरीदी और अपने पिता को दी, तो रमेश की आँखों में गर्व और स्नेह के आँसू थे।
नेहा ने अपने पिता से कहा, “पापा, जो कुछ भी मैं हूँ, वह सब आपकी वजह से है। आपने मुझे जो प्यार और समर्थन दिया, वह मैं कभी नहीं चुका सकती।” रमेश ने मुस्कुराते हुए कहा, "बेटा, पिता और बेटी का रिश्ता कभी हिसाब-किताब का नहीं होता। यह प्यार का रिश्ता है और तुम्हारी खुशी ही मेरी सबसे बड़ी दौलत है।"
शिक्षा
यह कहानी हमें सिखाती है कि पिता और पुत्री का रिश्ता निस्वार्थ प्यार और त्याग पर आधारित होता है। एक पिता अपनी बेटी की हर खुशी के लिए हर त्याग करने को तैयार रहता है और एक बेटी अपने पिता की मेहनत और त्याग को समझकर उन्हें गर्व महसूस कराती है। यह रिश्ता जीवन का सबसे मजबूत और खूबसूरत बंधन है, जो प्यार, सम्मान और समर्पण से जुड़ा होता है।
पहेली का उत्तर : आराम
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प्रार्थना:
शान्ताकारं भुजंगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥
अर्थ: मैं ऐसे सर्वव्यापी भगवान विष्णु को प्रणाम करता हूं जिनका स्वरूप शांत है। जो शेषनाग पर विश्राम करते हैं, जिनकी नाभि पर कमल खिला है और जो सभी देवताओं के स्वामी हैं।
जो ब्रह्मांड को धारण करते हैं, जो आकाश की तरह अनंत और असीम हैं, जिनका रंग नीला है और जिनका शरीर अत्यंत सुंदर है।
जो धन की देवी लक्ष्मी के पति हैं और जिनकी आंखें कमल के समान हैं। जो ध्यान के जरिए योगियों के लिए उपलब्ध हैं।
ऐसे श्रीहरि विष्णु को नमस्कार है जो सांसारिक भय को दूर करते हैं और सभी लोगों के स्वामी हैं।
मंत्र:
न जायते मृयते वा कदाचि-नान्यां भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो- न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
अर्थ: आत्मा कभी जन्म नहीं लेती और न कभी मरती है। यह न तो कभी उत्पन्न होता है और न ही कभी नष्ट होता है। यह अनादि और नित्य है, प्राचीन है और शरीर के मारे जाने पर भी वह नहीं मारा जाता।
गर्भ संवाद
“मेरे बच्चे! तुम्हारे जीवन के हर निर्णय का प्रभाव तुम्हारे भविष्य पर पड़ता है। जब तुम हर निर्णय सोच-समझकर लेते हो, तो वह तुम्हें सफलता की ओर बढ़ाता है। अपने भविष्य के लिए सही निर्णय लेना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक गलत निर्णय भी तुम्हे गलत दिशा में ले जा सकता है। मैं चाहती हूं कि तुम हर कदम पर समझदारी से निर्णय लो, क्योंकि यही तुम्हारे भविष्य को आकार देगा और तुम्हें सही दिशा में ले जाएगा।”
पहेली:
काला हण्डा, उजला भात,
ले लो भाई हाथों-हाथ।
कहानी: विश्वास से भरी राहें
किसी समय की बात है, एक छोटे शहर में आर्या नाम की एक लड़की रहती थी। आर्या एक साधारण परिवार से थी, लेकिन उसकी महत्वाकांक्षाएँ बड़ी थीं। उसके मन में यह विश्वास था कि अगर इंसान अपने सपनों पर यकीन करे और पूरे दिल से मेहनत करे, तो वह कोई भी मुकाम हासिल कर सकता है।
आर्या का सपना था कि वह एक मशहूर चित्रकार बने लेकिन उसके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि उसे महंगे रंग और कैनवास खरीदकर दिए जा सकें। फिर भी, आर्या ने हार नहीं मानी। वह पुराने कागज़ और टूटी-फूटी पेंसिल से अपनी कला को निखारने की कोशिश करती रही।
उसके पड़ोसी अक्सर उसकी मेहनत देखकर हँसते थे। वे कहते, “तुम जैसे लोगों को बड़े सपने नहीं देखना चाहिए। तुम्हारे पास न तो साधन हैं, न कोई पहचान। यह दुनिया तुम्हारी कला को नहीं समझेगी।”
लेकिन आर्या को अपने सपनों पर भरोसा था। उसने यह तय किया कि वह इन बातों को अपने रास्ते की रुकावट नहीं बनने देगी। एक दिन, उसने एक स्थानीय प्रतियोगिता के बारे में सुना। प्रतियोगिता में जीतने वाले को शहर के सबसे बड़े कला विद्यालय में पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति मिलती थी।
आर्या ने सोचा, “यही मेरा मौका है। मुझे अपना सर्वश्रेष्ठ देना होगा.” उसने अपनी पुरानी सामग्री से ही एक सुंदर चित्र बनाया, जो उसके दिल के जज्बातों को दर्शाता था। वह चित्र उसकी मेहनत, संघर्ष और विश्वास का प्रतीक था।
प्रतियोगिता के दिन, जब वह अपना चित्र लेकर पहुँची, तो बाकी प्रतियोगियों के पास महंगे कैनवस और चमकीले रंग थे। उसने एक पल के लिए सोचा कि क्या उसका साधारण चित्र इस प्रतिस्पर्धा में टिक पाएगा। लेकिन फिर उसने अपने मन से सभी शंकाओं को दूर किया और कहा, "मेरा विश्वास ही मेरी सबसे बड़ी ताकत है।"
प्रतियोगिता के परिणाम घोषित हुए और आर्या का चित्र पहले स्थान पर रहा। जजों ने उसके चित्र की गहराई और सच्चाई की सराहना की। उन्होंने कहा, "यह चित्र हमें यह सिखाता है कि कला केवल सामग्री पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उस भावना पर आधारित होती है जिससे इसे बनाया गया है।"
इस जीत ने न केवल आर्या को उसका सपना साकार करने का मौका दिया, बल्कि उसे यह भी सिखाया कि सच्चा विश्वास इंसान को हर कठिनाई से जीत दिला सकता है। अब आर्या ने अपने सपने को पूरा करने के लिए कला विद्यालय में दाखिला लिया और अपने जीवन की नई शुरुआत की।
वह अपनी सफलता के साथ यह संदेश फैलाने लगी कि अगर आप अपने सपनों पर विश्वास रखें और लगातार मेहनत करें, तो कोई भी बाधा आपको रोक नहीं सकती।
शिक्षा
यह कहानी हमें सिखाती है कि विश्वास और मेहनत से हर कठिनाई को पार किया जा सकता है। अपने सपनों को साकार करने के लिए साधनों की कमी कभी बाधा नहीं बनती, अगर आपमें खुद पर विश्वास हो। सच्चा विश्वास इंसान को न केवल प्रेरित करता है, बल्कि उसे जीवन में सफलता और संतोष भी दिलाता है।
पहेली का उत्तर : सिंघाड़ा
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प्रार्थना:
हे हंसवाहिनी ज्ञान दायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे।।
जग सिरमौर बनाएँ भारत,
वह बल विक्रम दे। वह बल विक्रम दे।।
हे हंसवाहिनी ज्ञान दायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे..
साहस शील हृदय में भर दे,
जीवन त्याग-तपोमय कर दे,
संयम सत्य स्नेह का वर दे,
स्वाभिमान भर दे। स्वाभिमान भर दे ॥ १ ॥
हे हंसवाहिनी ज्ञान दायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे..
लव-कुश, ध्रुव, प्रहलाद बनें हम
मानवता का त्रास हरें हम,
सीता, सावित्री, दुर्गा मां,
फिर घर-घर भर दे। फिर घर-घर भर दे॥२॥
हे हंसवाहिनी ज्ञान दायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे..
मंत्र:
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च य:।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो य: स च मे प्रिय:॥
अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण कहते है— जिससे किसी को कष्ट नहीं पहुँचता तथा जो अन्य किसी के द्वारा विचलित नहीं होता, जो सुख-दुख में, भय तथा चिन्ता में समभाव रहता है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।
गर्भ संवाद
— मेरे प्यारे शिशु, मेरे राज दुलार, मैं तुम्हारी माँ हूँ.......माँ !
— मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ, तुम मेरे गर्भ में पूर्ण रूप से सुरक्षित हो, तुम हर क्षण पूर्ण रूप से विकसित हो रहे हो।
— तुम मेरे हर भाव को समझ सकते हो क्योंकि तुम पूर्ण आत्मा हो।
— तुम परमात्मा की तरफ से मेरे लिए एक सुन्दरतम तोहफा हो, तुम शुभ संस्कारी आत्मा हो, तुम्हारे रूप में मुझे परमात्मा की दिव्य संतान प्राप्त हो रही है, परमात्मा ने तुम्हें सभी विलक्षण गुणों से परिपूर्ण करके ही भेजा है, परमात्मा की दिव्य संतान के रूप में तुम दिव्य कार्य करने के लिए ही आए हो। मेरे बच्चे! तुम
ईश्वर का परम प्रकाश रूप हो, परमात्मा की अनंत शक्ति तुम्हारे अंदर विद्यमान है, ईश्वर का तेज तुम्हारे माथे पर चमक रहा है, परमात्मा के प्रेम की चमक तुम्हारी आँखों में दिखाई देती है, तुम ईश्वर के प्रेम का साक्षात भण्डार हो, तुम परमात्मा के एक महान उद्देश्य को लेकर इस संसार में आ रहे हो, परमात्मा ने तुम्हें इंसान रूप में इंसानियत के सभी गुणों से भरपूर किया है।
— तुम हर इंसान को परमात्मा का रूप समझते हो, और सभी के साथ प्रेम का व्यवहार करते हो, तुम जानते हो अपने जीवन के महानतम लक्ष्य को, तुम्हें इस संसार की सेवा करनी है, सभी से प्रेम करना है, सभी की सहायता करनी है, और परमात्मा ने जो विशेष लक्ष्य तुम्हें दिया है, वह तुम्हें अच्छे से याद रहेगा।
— परमात्मा की भक्ति में तुम्हारा मन बहुत लगता है, तुम प्रभु के गुणों का गायन करके बहुत खुश होते हो, तुम्हारे रोम-रोम में प्रभु का प्रेम बसा हुआ है। स्त्रियों के प्रति तुम विशेष रूप से आदर का भाव अनुभव करते हो, सभी स्त्रियों को सम्मान की दृष्टि से देखते हो।
— तुम्हारा उद्देश्य संसार में सबको खुशियाँ बाँटना है, सब तरह से आजाद रहते हुए तुम सबको कल्याण का मार्ग दिखाने आ रहे हो, परमात्मा से प्राप्त जीवन से तुम पूर्ण रूप से संतुष्ट हो, तुम सदैव परमात्मा के साये में सुरक्षित हो।
— मानव जीवन के संघर्षो को जीतना तम्हें खूब अच्छी तरह से आता है, जीवन के प्रत्येक कार्य को करने का तुम्हारा तरीका बहुत प्यारा है, जीवन की हर परेशानी का हल ढूँढने में तुम सक्षम हो, तुम हमेशा अपने जीवन के परम लक्ष्य की ओर निरंतर आगे बढ़ते रहोगे।
— मेरी तरह तुम्हारे पिता भी तुम्हें देखने के लिए आतुर हैं, मेरा और तुम्हारे पिता का आशीष सदैव तुम्हारे साथ है।
— यह पृथ्वी हमेशा से प्रेम करने वाले अच्छे लोगों से भरी हुई है, यह सृष्टि परमात्मा की अनंत सुंदरता से भरी हुई है, यहाँ के सभी सुख तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं, गर्भावस्था का यह सफर तुम्हें परमात्मा के सभी दैविक संस्कारों से परिपूर्ण कर देगा।
—घर के सभी सदस्यों का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है।
गर्भ संवाद:
“मेरे बच्चे! जब तुम किसी लक्ष्य को पाने की दिशा में काम करते हो, तो तुम्हें धैर्य और आत्मविश्वास बनाए रखना चाहिए। सफलता का रास्ता आसान नहीं होता, लेकिन धैर्य और आत्मविश्वास से तुम किसी भी चुनौती को पार कर सकते हो। मैं चाहती हूं कि तुम भविष्य में सफलता के लिए धैर्य रखो और अपने आत्मविश्वास को बनाए रखो, क्योंकि यही तुम्हारी सफलता की कुंजी होगी।”
पहेली:
हाथी, घोड़ा ऊँट नहीं,
खाए न दाना, घास।
सदा ही धरती पर चले,
होए न कभी उदास।
कहानी: आशा का दीपक
किसी छोटे से कस्बे में एक विधवा महिला सुजाता, अपनी आठ साल की बेटी परी के साथ रहती थी। सुजाता का जीवन संघर्षों से भरा हुआ था। पति के निधन के बाद, उस पर घर की जिम्मेदारी और बेटी को पालने का भार आ गया। वह दिन-रात मेहनत करती, सिलाई-बुनाई कर कुछ पैसे कमाती और अपनी बेटी को एक अच्छी जिंदगी देने की कोशिश करती।
परी बहुत समझदार बच्ची थी। वह अपनी माँ को परेशान नहीं करती और जितना हो सकता, उतना घर के कामों में मदद करती। लेकिन परी का दिल टूट जाता, जब वह अपनी सहेलियों को स्कूल जाते देखती। उसकी सबसे बड़ी ख्वाहिश थी कि वह भी स्कूल जाए और पढ़-लिखकर अपनी माँ का सहारा बने। लेकिन सुजाता के पास परी को स्कूल भेजने के लिए पैसे नहीं थे।
एक दिन दिवाली से कुछ दिन पहले, परी ने अपनी माँ से पूछा, “माँ, क्या मैं कभी स्कूल जा पाऊँगी?” सुजाता ने अपनी बेटी को गले लगाया और कहा “बेटा, जब भगवान चाहेंगे, तब सब कुछ ठीक हो जाएगा। बस हमें अपने दिल में आशा का दीप जलाए रखना होगा।”
दिवाली की रात आने वाली थी। कस्बे के हर घर में दीये जलाए जा रहे थे, लेकिन सुजाता के घर में अंधेरा था।
न तो घर में नए कपड़े थे और न ही मिठाई। लेकिन परी ने एक छोटा सा मिट्टी का दिया जलाया और उसे अपने घर के बाहर रखा।
परी ने उस दीपक को देखते हुए मन ही मन प्रार्थना की, “हे भगवान, मेरे घर को भी रोशनी से भर दो। मेरी माँ के जीवन में थोड़ी खुशियाँ ला दो।”
अगले दिन, एक अनोखी घटना घटी। कस्बे के एक बड़े व्यापारी, जो दीपावली पर गरीब बच्चों की मदद करते थे, सुजाता के घर पहुँचे उन्होंने परी के जलाए दीपक को देखकर सुजाता से पूछा, "क्या आप कुछ काम कर सकती हैं?"
सुजाता ने सिर हिलाया और कहा, "मैं सिलाई का काम जानती हूँ।" व्यापारी ने उसे अपने कपड़े की फैक्ट्री में काम दिया। सुजाता की मेहनत और ईमानदारी से खुश होकर व्यापारी ने परी की पढ़ाई का खर्च भी उठाने का वादा किया।
परी अब स्कूल जाने लगी। उसका सपना साकार हो रहा था, और उसकी माँ का संघर्ष रंग ला रहा था। उस दीपक ने न केवल उनके घर को रोशनी दी, बल्कि उनके जीवन में भी नई आशा जगा दी।
शिक्षा
यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में कितना ही अंधकार क्यों न हो, अगर हमारे दिल में आशा का दीपक जलता रहे, तो हर मुश्किल का हल मिल सकता है। ईश्वर हमेशा उन लोगों की मदद करते हैं, जो सच्चे मन और मेहनत से अपने जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करते हैं। आशा ही वह शक्ति है, जो हमें आगे बढ़ने और जीवन की कठिनाइयों से लड़ने का हौसला देती है।
पहेली का उत्तर : साइकिल
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प्रार्थना:
माँ सरस्वती वरदान दो,
मुझको नवल उत्थान दो।
यह विश्व ही परिवार हो,
सब के लिए सम प्यार हो ।
आदर्श, लक्ष्य महान हो । माँ सरस्वती..........
मन, बुद्धि, हृदय पवित्र हो,
मेरा महान चरित्र हो।
विद्या विनय वरदान दो। माँ सरस्वती....
माँ शारदे हँसासिनी,
वागीश वीणा वादिनी।
मुझको अगम स्वर ज्ञान दो।
माँ सरस्वती, वरदान दो।
मुझको नवल उत्थान दो।
उत्थान दो। उत्थान दो...।
मंत्र:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
अर्थः भगवान श्री कृष्णा कहते हैं– तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फलों में कभी नहीं। कर्म को फल की इच्छा से न करो और न ही आलस्यपूर्वक कर्म से विमुख हो।
गर्भ संवाद:
मेरे प्यारे शिशु, मेरे बच्चे, मैं तुम्हारी माँ हूँ …… माँ!
— आज मैं तुम्हे तुम्हारे कुछ महानतम गुणों की याद दिला रही हूँ जो तुम्हें परमात्मा का अनमोल उपहार हैं।
— प्रेम स्वरूप परमात्मा का अंश होने के कारण तुम्हारा हृदय भी प्रेम से भरपूर है, तुम्हारी हर अदा में परमात्मा का प्रेम झलकता है।
— तुम्हारे हृदय में सम्पूर्ण मानवमात्र के प्रति समभाव है।
— तुम्हारा हृदय सबके लिए दया और करुणा से भरपूर रहता है।
— क्षमाशीलता के गुण के कारण सभी तुम्हारा सम्मान करते हैं, जिससे तुम्हारा स्वभाव और विनम्र हो जाता है।
— नम्रता तुम्हारा विशेष गुण है।
— मेरे बच्चे। तुम्हारा प्रत्येक कार्य सेवा-भाव से परिपूर्ण होता है।
— सहनशीलता तुम्हारा स्वाभाविक गुण है।
— धैर्यपूर्वक प्रत्येक कार्य को करना तुम्हारी महानता है।
— तुम्हारा मन आंतरिक रूप से स्थिर और शांत है।
— मेरे बच्चे! तुम बल और साहस के स्वामी हो।
— तुम अनुशासन प्रिय हो।
— कृतज्ञता का गुण तुम्हारे व्यवहार की शोभा बढ़ाता है।
— तुम अपनो से बड़ों को सम्मान और छोटों को प्रेम देते हो।
— तुम भाव से बहुत भोले हो लेकिन जरूरत पड़ने पर अपनी कठोरता भी दिखाते हो।
— तुम अपनो से छोटों के लिए प्रेरणा के स्त्रोत हो।
— तुम सत् और असत के पारखी हो।
— तुम्हारा व्यवहार चन्द्रमा के समान शीतल है।
— तुम सबसे इतना मीठा बोलते हो कि सभी तुम पर मोहित हो जाते हैं।
— तुम्हारा व्यक्तित्व परम प्रभावशाली है।
— तुम हमेशा सत्य बोलना ही पसंद करते हो।
— तुम हाजिर जवाबी हो।
— तुम्हारे मुख से निकला एक-एक शब्द मधुर और आकर्षक होता है।
— तुम मन, वचन और कर्म से पवित्र हो।
— घर के सभी सदस्यों का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है। तुम्हारे रूप में मुझे जैसे दिव्य संतान प्राप्त हो रही है, तुम्हे पाकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। जल्द ही इस सुन्दर संसार में तुम्हारा आगमन होगा। तुम्हारा स्वागत करने के लिए सभी बेचैन हैं।
गर्भ संवाद
“मेरे प्यारे बच्चे! जब तुम भविष्य को आशावादी दृष्टिकोण से देखते हो, तो तुम्हारे पास हर समस्या का समाधान होता है। उम्मीद और सकारात्मकता से भरा दृष्टिकोण तुम्हारी सोच को विस्तृत करता है और तुम्हें हर परिस्थिति में हल निकालने की क्षमता देता है। मैं चाहती हूं कि तुम भविष्य के प्रति हमेशा आशावादी रहो, क्योंकि यही तुम्हें हर मुश्किल का हल दिखाएगा और तुम्हें सफलता की ओर ले जाएगा।”
पहेली:
चार हैं रानियाँ और एक हैं राजा,
हर एक काम में उनका अपना साझा।
कहानी: दशहरे की विजय कथा
दशहरे का पर्व सत्य, धर्म और अधर्म के बीच के संघर्ष की विजय का प्रतीक है। यह कहानी उसी विजय की गाथा को उजागर करती है, जब अच्छाई ने बुराई पर जीत हासिल की और मानवता को यह संदेश दिया कि अधर्म कितना भी बलशाली क्यों न हो, अंत में सत्य और धर्म की ही जीत होती है।
प्राचीन समय की बात है, रावण नाम का एक असुर लंका का राजा था। वह अपनी शक्ति, ज्ञान और तपस्या के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन उसका अहंकार और अधर्म उसकी सबसे बड़ी कमजोरियाँ थीं। रावण ने अपनी ताकत का दुरुपयोग कर कई निर्दोष लोगों को कष्ट दिया। उसने देवताओं और ऋषियों को भी नहीं छोड़ा। लेकिन उसकी सबसे बड़ी गलती तब हुई, जब उसने माता सीता का अपहरण किया और उन्हें अपनी लंका में कैद कर लिया।
भगवान राम, जो मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं, उस समय वनवास में थे। जब उन्होंने सीता जी के अपहरण की खबर सुनी, तो उन्होंने रावण के अधर्म का अंत करने का प्रण लिया। श्रीराम ने अपनी पत्नी को मुक्त कराने और रावण के अधर्म को समाप्त करने के लिए अपनी सेना तैयार की। उनकी सेना में वानरों का नेतृत्व हनुमान जी और सुग्रीव ने किया। श्रीराम की सेना धर्म, सच्चाई और न्याय की प्रतीक थी, जबकि रावण की सेना अधर्म, अहंकार और अन्याय की।
राम ने अपनी सेना के साथ लंका की ओर कूच किया। इस दौरान उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हर चुनौती का सामना अपने धैर्य और विवेक से किया। समुद्र पर सेतु का निर्माण करना और रावण की शक्तिशाली सेना से लड़ना आसान नहीं था, लेकिन राम और उनकी सेना अपने उद्देश्य से कभी पीछे नहीं हटे।
अंततः राम और रावण का भीषण युद्ध हुआ। रावण ने अपनी पूरी शक्ति का इस्तेमाल किया, लेकिन राम ने अपनी बुद्धिमत्ता, रणनीति और ईश्वर पर अडिग विश्वास से रावण को पराजित किया। राम ने रावण को मारकर माता सीता को मुक्त कराया और अधर्म के अंत का संदेश दिया।
लंका की विजय केवल रावण के अंत की कहानी नहीं थी बल्कि यह संदेश भी थी कि धर्म और सच्चाई की राह पर चलने वाला व्यक्ति हर कठिनाई को पार कर सकता है। राम ने न केवल अपने कर्तव्य को निभाया, बल्कि मानवता को यह भी सिखाया कि सत्य की ताकत के सामने कोई भी बुराई टिक नहीं सकती।
जब राम अपनी विजय के साथ अयोध्या लौटे, तो पूरे नगर ने उनका स्वागत दीप जलाकर किया। यह पर्व आज दीपावली के रूप में मनाया जाता है और दशहरे का पर्व, रावण का पुतला जलाकर उसकी हार का प्रतीक दिखाया जाता है, यह याद दिलाता है कि बुराई का अंत निश्चित है और सत्य की विजय अवश्य होती है।
शिक्षा
दशहरे की यह कथा हमें सिखाती है कि जीवन में सत्य, धर्म और न्याय का मार्ग कठिन हो सकता है, लेकिन अंततः विजय इन्हीं की होती है। यह पर्व हमें यह प्रेरणा देता है कि किसी भी परिस्थिति में हमें अपने मूल्यों और कर्तव्यों से विचलित नहीं होना चाहिए। अधर्म कितना भी बलशाली क्यों न हो, उसकी हार सुनिश्चित है, और सत्य की शक्ति अडिग रहती है।
पहेली का उत्तर : अंगूठा और अंगुलियाँ
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प्रार्थना:
राजाओं में श्रेष्ठ श्रीराम सदा विजय को प्राप्त करते हैं। मैं लक्ष्मीपति भगवान् श्रीराम का भजन करता हूँ। सम्पूर्ण राक्षस सेना का नाश करने वाले श्रीराम को मैं नमस्कार करता हूँ। श्रीराम के समान अन्य कोई आश्रयदाता नहीं। मैं उन शरणागत वत्सल का दास हूँ। मैं हमेशा श्रीराम मैं ही लीन रहूँ। हे श्रीराम! आप मेरा (इस संसार सागर से) उद्धार करें।
मंत्र:
ध्यानमूलं गुरुर्मूर्तिः पूजामूलं गुरु: पदम्।
मंत्रमूलं गुरुर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरुः कृपा ।।
अर्थः गुरु ही ध्यान का मूल हैं, गुरु के चरण पूजन का आधार हैं। गुरु का वचन ही मंत्र का मूल है और गुरु की कृपा ही मोक्ष का आधार है। गर्भावस्था में यह श्लोक गर्भवती को गुरु के प्रति आस्था और विश्वास बनाए रखने के लिए प्रेरित करता है।
गर्भ संवाद:
मेरे प्यारे शिशु, मेरे बच्चे, मैं तुम्हारी माँ हूं…… माँ!
— आज मैं तुम्हे तुम्हारे कुछ भौतिक गुणों की याद दिला रही हूँ जो तुम्हे परमात्मा का अनमोल उपहार हैं।
— परम तेजस्वी ईश्वर का अंश होने के कारण तुम्हारे मुख पर सूर्य के समान दिव्य तेज और ओज रहता है।
— तुम्हारे नैन-नक्श तीखे और बहुत सुन्दर है, तुम्हारा सुन्दर मुखड़ा सबको बहुत प्यारा लगता है।
— तुम्हारे चेहरे का रंग गोरा और सबका मन मोह लेने वाला है।
— तुम्हारी हर अदा सुन्दरतम ईश्वर की झलक लिए हुए है, तुम्हारा माथा चौड़ा है, तुम्हारी आँखें बड़ी है, तुम्हारी भौहें तीर के आकार की तरह बड़ी है, तुम्हारी पलकें काली और बड़ी हैं।
— तुम्हारे होंठ फूल की तरह कोमल और सुन्दर हैं, तुम्हारे चेहरे पर हर पल एक मधुर मुस्कान छाई रहती है।
— तुम्हारी बुद्धि कुशाग्र है, तुम्हारी वाणी मधुर और सम्मोहन करने वाली है।
— तुम बहुत अच्छे खिलाडी हो, तुम्हारा शरीर तंदुरुस्त और फुर्तीला है। (किसी विशेष खेल के प्रति शिशु के मन में प्रतिभा विकसित करनी हो तो यहाँ कह सकते हैं)
— तुम बहुत सुंदर दिखते हो, बड़े होने पर भी तुम्हारी सुंदरता और निखरती जाएगी।
— तुम्हारी हर अदा बहुत निराली और अनोखी है।
— घर के सभी सदस्यों का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है। तुम्हारे रूप में मुझे जैसे दिव्य संतान प्राप्त हो रही है, तुम्हे पाकर में बहुत प्रसन्न हूँ, जल्द ही इस सुन्दर संसार में तुम्हारा आगमन होगा। तुम्हारा स्वागत करने के लिए सभी बेचैन है।
गर्भ संवाद
“मेरे प्यारे बच्चे! तुम्हारा भविष्य तुम्हारे हाथों में है, और तुम्हें उसे बनाने के लिए अभी से काम शुरू करना होगा। भविष्य कभी भी स्वतः नहीं आता, उसे अपने प्रयासों, दृढ़ता और सही निर्णय से बनाना पड़ता है। मैं चाहती हूं कि तुम आज से ही अपने भविष्य को आकार देना शुरू करो, क्योंकि जितना जल्दी तुम काम शुरू करोगे, उतना ही तुम्हारा भविष्य उज्जवल होगा।”
पहेली:
मैं हरी, मेरे बच्चे काले,
मुझको छोड़, मेरे बच्चे खाले।
कहानी: हर आँसू की कहानी
सुभद्रा एक साधारण गृहिणी थी, लेकिन उसके जीवन में साधारण कुछ भी नहीं था। उसका हर दिन एक नए संघर्ष से शुरू होता और वही संघर्ष उसके दिन का अंत बनता। सुभद्रा की तीन बेटियाँ थीं, और वह चाहती थी कि उनकी परवरिश और शिक्षा में कोई कमी न हो। लेकिन समाज की तिरछी निगाहें और आर्थिक तंगी उसके रास्ते में हर दिन नई रुकावटें खड़ी करती थीं।
सुभद्रा का पति भरत, एक दिहाड़ी मजदूर था। वह अपनी सीमित आय से घर चलाने की कोशिश करता, लेकिन उनका गुजारा मुश्किल से होता था। कई बार भरत भी निराश हो जाता और कहता, “सुभद्रा, बेटियाँ पढ़-लिखकर क्या करेंगी? हमें बस यह देखना चाहिए कि वे बस समय पर शादी करके अपने घर चली जाएँ।”
लेकिन सुभद्रा इन बातों को अनसुना कर देती। उसके मन में यह विश्वास था कि उसकी बेटियाँ एक दिन बड़ा मुकाम हासिल करेंगी। वह हर रात उनके सिर पर हाथ फेरते हुए सोचती, “यह आँसू मेरे संघर्ष के हैं, लेकिन ये मेरी बेटियों के सपनों का पानी बनेंगे।”
घर में कभी-कभी खाने की भी कमी हो जाती, लेकिन सुभद्रा ने अपनी बेटियों की किताबों और स्कूल की फीस में कभी कोई कटौती नहीं होने दी। वह खुद कम खा लेती, लेकिन बेटियों के सपनों को कम नहीं होने देती। पड़ोसी और रिश्तेदार उसकी सोच पर ताने मारते।
वे कहते, “इतनी मेहनत करने के बाद भी तुम्हें क्या मिलेगा? लड़कियाँ तो पराया धन होती हैं।”
सुभद्रा ने इन बातों को नज़रअंदाज़ करते हुए अपनी बेटियों को सिखाया कि समाज की सोच से ऊपर उठकर अपने सपनों को पूरा करना ही उनका सबसे बड़ा कर्तव्य है। उसने अपनी बड़ी बेटी राधा को पढ़ाई में ध्यान देने के लिए प्रेरित किया। राधा पढ़ाई में बहुत होशियार थी, लेकिन स्कूल में उसे लड़कों के ताने सहने पड़ते थे। सुभद्रा ने उसे समझाया “बेटा, ये ताने तुम्हारी ताकत हैं। जब लोग तुम्हें नीचे गिराने की कोशिश करें, तो समझो तुम सही रास्ते पर हो।”
वर्षों की मेहनत और संघर्ष के बाद, राधा ने अपनी पढ़ाई पूरी की और डॉक्टर बनी। उसकी सफलता ने न केवल उसके परिवार को गौरवान्वित किया, बल्कि गाँव के अन्य लोगों को भी बेटियों की शिक्षा का महत्व समझाया। राधा की सफलता ने उसकी दो छोटी बहनों को भी प्रेरित किया और वे भी अपने-अपने क्षेत्रों में कामयाब हुईं।
आज, जब सुभद्रा अपनी बेटियों को उनके जीवन में ऊँचाइयाँ छूते देखती है, तो उसकी आँखों में खुशी के आँसू होते हैं। वह सोचती है कि उसके हर आँसू की एक कहानी थी — संघर्ष, त्याग और माँ के निस्वार्थ प्रेम की कहानी।
शिक्षा
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि माँ का प्रेम और त्याग किसी भी कठिनाई को पार कर सकता है। हर आँसू एक नई प्रेरणा और संघर्ष की कहानी है। माँ का विश्वास और दृढ़ निश्चय बच्चों के भविष्य की नींव है। समाज की रुकावटें और ताने चाहे कितने भी क्यों न हों, अगर माँ अपने बच्चों के सपनों पर विश्वास करे, तो वे सपने एक दिन जरूर सच होते हैं।
पहेली का उत्तर : इलायची
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प्रार्थना:
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।।
भावार्थ– जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की है और जो श्वेत वस्त्र धारण करती है, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली सरस्वती हमारी रक्षा करें।
मंत्र:
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ।।
अर्थः सब प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है और वर्षा यज्ञ से उत्पन्न होती है। यज्ञ कर्म का परिणाम है। गर्भवती महिलाओं को इस श्लोक के माध्यम से प्रकृति और कर्म के प्रति समर्पण का संदेश मिलता है।
गर्भ संवाद:
मेरे प्यारे शिशु मेरे बच्चे, मैं तुम्हारी माँ हूं…… माँ!
— आज मैं तुम्हे तुम्हारे कुछ महानतम गुणों की याद दिला रही रही हूँ जो तुम्हे परमात्मा का अनमोल उपहार है।
— मेरे बच्चे! तुम्हारे मस्तिष्क में अपार क्षमता है। तुम्हारी बुद्धि तीव्र है।
— तुम आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक जैसी क्षमता लेकर आ रहे हो। तुममे कठिन से कठिन समस्या को सुलझाने की योग्यता है।
— तुम रामानुजन जैसी गणित के सवालों को हल करने की क्षमता रखते हो।
— विवेकानंद जैसी महान प्रतिभा है तुममें।
— तुम्हारी याददाश्त बहुत अच्छी है, जो बात तुम याद रखना चाहो तुम्हें सदा याद रहती है।
— तुम्हारी एकाग्रता कमाल की है। जिस काम पर तुम फोकस करते हो उसमें बेहतरीन परिणाम लेकर आते हो।
— कोई भी विषय, कोई भी टॉपिक तुम्हारे लिए कठिन नहीं, हर विषय को अपनी लगन से, परिश्रम से तुम सरल बना लेते हो।
— तुम्हारे भीतर अनंत संभावनाएं छुपी हुई है।
— तुम्हें म्यूजिक का बहुत शौक है, तुम सभी वाद्य यंत्र बजाना जानते हो। ढोलक, गिटार, तबला, हारमोनियम, तुम बहुत अच्छे से बजा सकते हो।
— तुम्हारा दिमाग बहुत तेज चलता है। मुश्किल से मुश्किल समस्या का भी तुम बड़ी आसानी से हल निकाल लेते हो।
— तुम्हारी वाणी में मिठास है। तुम एक बहुत अच्छे गायक हो। जब तुम गाते हो तो सभी मंत्रमुग्ध हो जाते है।
— तुम्हें पढ़ाई में सभी सब्जेक्ट अच्छे लगते है। जो भी पढ़ते हो बड़ी आसानी से याद हो जाता है।
गर्भ संवाद
“मेरे प्यारे बच्चे! तुम्हारे हर निर्णय का प्रभाव तुम्हारे भविष्य पर पड़ता है। इसलिए तुम्हें हर निर्णय सोच-समझकर और आत्मविश्वास से लेना चाहिए। छोटे निर्णय भी एक दिन बड़े बदलाव का कारण बन सकते हैं, इसलिए उन्हें जिम्मेदारी से लेना बहुत ज़रूरी है। मैं चाहती हूं कि तुम हर कदम पर अपने भविष्य की दिशा को ठीक से निर्धारित करो, क्योंकि यही तुम्हारी सफलता का मार्ग होगा।”
पहेली:
तीन अक्षरों का मेरा नाम,
आदि कटे तो चार।
कैसे हो तुम मैं जानूँ,
बोलो तुम सोच-विचार ।
कहानी: मां के हाथ का जादू
किसी गाँव में रहने वाली गीता अपने बेटे राहुल के साथ रहती थी। गीता एक साधारण महिला थी, लेकिन उसके हाथों में एक ऐसा जादू था, जिसे उसके बेटे और आसपास के लोग गहराई से महसूस करते थे। वह जितनी मेहनती थी, उतनी ही प्यार और समर्पण से भरी हुई थी। राहुल अक्सर अपनी माँ के साथ खेतों में काम करता, और शाम को वह अपनी माँ के बनाए खाने का बेसब्री से इंतजार करता था।
गीता के हाथों से बना हर पकवान राहुल को ऐसा लगता मानो किसी अदृश्य शक्ति ने उसे और भी स्वादिष्ट बना दिया हो। उसकी माँ के हाथ का खाना उसे न केवल पेट भरने का साधन लगता, बल्कि यह उसके दिल को भी सुकून देता।
राहुल बड़ा होकर शहर में पढ़ने चला गया। वहाँ की चकाचौंध, आधुनिकता और फास्ट फूड के चलते उसने अपनी माँ के हाथ के खाने को याद करना शुरू कर दिया। शहर में हर चीज़ थी — पिज्जा, बर्गर, और बड़े-बड़े होटल। लेकिन माँ के बनाए सादे खाने का स्वाद उसमें नहीं था।
एक दिन, जब राहुल अपनी पढ़ाई पूरी करके गाँव लौटा, तो गीता ने उसे देखकर कहा, “तू कितना दुबला हो गया है, बेटा! शहर का खाना तुझे रास नहीं आया, है न?”
राहुल ने मुस्कुराकर कहा, “माँ, वहाँ खाना तो बहुत था, लेकिन उसमें तुम्हारे हाथों का जादू नहीं था। तुम्हारे हाथों का प्यार, मेहनत और अपनापन ही हर स्वाद को खास बनाता है।”
गीता ने उसकी पसंद का खाना बनाया। जब राहुल ने पहला कौर खाया तो उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसने महसूस किया कि माँ का प्यार किसी भी पकवान का असली स्वाद है।
उसने अपनी माँ से कहा, “माँ, तुम्हारे हाथों का जादू सिर्फ खाना बनाने तक सीमित नहीं है। तुम्हारी मेहनत, प्यार और त्याग से मेरी पूरी जिंदगी में मिठास आई है। तुम्हारे हाथों ने सिर्फ मेरे लिए खाना नहीं, बल्कि मेरे सपनों की नींव भी रखी है।”
गीता ने हँसते हुए कहा, “बेटा, हर माँ के हाथों में यह जादू होता है। हम अपने बच्चों के लिए जो भी करते हैं, उसमें हमारा पूरा दिल लगा होता है। यही जादू है जो हर चीज़ को खास बना देता है।”
शिक्षा
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि माँ के हाथों का जादू सिर्फ पकवानों में नहीं, बल्कि उनके प्रेम और समर्पण में होता है। उनका हर कार्य अपने बच्चों की भलाई और खुशी के लिए होता है। माँ का प्यार वह अदृश्य जादू है, जो किसी भी मुश्किल को हल्का और किसी भी साधारण चीज़ को खास बना देता है। माँ के योगदान का मूल्य समझना और उनका सम्मान करना हर बच्चे का कर्तव्य है।
पहेली का उत्तर : अचार
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प्रार्थना:
दयालु नाम है तेरा प्रभु हम पर दया कीजे ।
हरि सब तुमको कहते हैं
हमारा दुःख हर लीजे॥
विषय और भोग में निशिदिन फँसा रहता है मन मूरख ।
इसे अब ज्ञान देकर सत्य मारग पर लगा दीजे ॥
दयालु नाम है तेरा प्रभु हम पर दया कीजे..
तुम्हारी भूल कर महिमा, किए अपराध अति भारी ।
शरण अज्ञान है तेरे, क्षमा अपराध सब कीजे॥
दयालु नाम है तेरा प्रभु हम पर दया कीजे..
तुम्हीं माता-पिता जग के, तुम्हीं हो नाथ धन विद्या ।
तुम्हीं हो मित्र सब जग के, दयाकर भक्तिवर दीजे ॥
दयालु नाम है तेरा प्रभु हम पर दया कीजे..
न चाहूँ राज-धन-वैभव न है कुछ कामना मेरी ।
रख सकूँ शुद्ध सेवाभाव, शुभ वरदान ये दीजे ॥
दयालु नाम है तेरा प्रभु हम पर दया कीजे..
मंत्र:
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनं।
अर्थः शरीर ही धर्म का पहला साधन है। यह श्लोक गर्भवती महिलाओं को अपने शरीर का ध्यान रखने और इसे स्वस्थ रखने की प्रेरणा देता है, ताकि एक स्वस्थ संतान का जन्म हो सके।
गर्भ संवाद
“मेरे बच्चे! किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए निरंतर प्रयास करना जरूरी है। अगर तुम ठान लेते हो कि तुम कुछ हासिल करना चाहते हो, तो तुम्हें हर दिन अपने लक्ष्य की ओर छोटे-छोटे कदम बढ़ाने होंगे। सफलता रातों-रात नहीं आती, यह लगातार मेहनत और समर्पण से मिलती है। मैं चाहती हूं कि तुम भविष्य में सफलता पाने के लिए निरंतर प्रयास करते रहो, क्योंकि यही तुम्हारे सपनों को सच करेगा।”
पहेली:
सापों से भरी एक पिटारी,
सब के मुँह में दी चिंगारी।
जोड़ो हाथ तो निकल घर से,
फिर घर पर सिर दे पटके।
कहानी: संयम और सफलता
किसी गाँव में एक युवा आर्यन, रहता था। आर्यन महत्वाकांक्षी था और जीवन में बड़ी सफलता पाना चाहता था। लेकिन उसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि वह हर चीज़ को तुरंत हासिल करना चाहता था। उसके पास धैर्य और संयम की कमी थी।
आर्यन ने एक बार अपने गुरु ऋषि वशिष्ठ से पूछा “गुरुजी, मैं जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहता हूँ। क्या आप मुझे कोई ऐसा उपाय बता सकते हैं, जिससे मैं तुरंत सफल हो जाऊँ?”
गुरु वशिष्ठ ने मुस्कुराते हुए कहा, “सफलता पाने के लिए सबसे पहले संयम का अभ्यास करना होगा। अगर तुम संयम सीख लो, तो सफलता तुम्हारे पास खुद आ जाएगी।”
आर्यन को गुरुजी की बात समझ नहीं आई। उसने सोचा, “संयम और सफलता का क्या संबंध हो सकता है?” लेकिन वह गुरुजी की बातों का आदर करता था, इसलिए उसने संयम सीखने का फैसला किया।
गुरुजी ने उसे एक बीज दिया और कहा, “इसे जमीन में बो दो और रोज इसे पानी देना। लेकिन ध्यान रहे, तुम इसे बिना अधीर हुए इसके फल आने तक देखभाल करना।”
आर्यन ने बीज बो दिया और हर दिन उसकी देखभाल करने लगा। कुछ दिनों बाद बीज से एक छोटा सा पौधा निकला। आर्यन खुश हुआ, लेकिन जल्दी ही उसकी खुशी अधीरता में बदल गई।
उसे लगा कि यह पौधा बहुत धीरे-धीरे बढ़ रहा है। उसने गुरुजी से कहा, “गुरुजी, यह पौधा इतना धीरे क्यों बढ़ रहा है? क्या इसे तेज़ी से बढ़ाने का कोई तरीका नहीं है?”
गुरुजी ने उत्तर दिया, “प्रकृति का नियम है कि हर चीज़ अपने समय पर ही होती है। पौधा अपनी गति से बढ़ेगा। अगर तुम इसे जबरन तेज़ी से बढ़ाने की कोशिश करोगे, तो यह मर जाएगा। संयम रखो और देखो कि यह समय के साथ कैसे विकसित होता है।” आर्यन ने गुरुजी की बात मानकर संयम से पौधे की देखभाल जारी रखी। समय बीतता गया और वह छोटा पौधा एक मजबूत पेड़ में बदल गया। उस पर फल भी आए। आर्यन ने उन फलों का स्वाद चखा, तो उसने महसूस किया कि यह उसकी मेहनत और संयम का फल था। गुरुजी ने आर्यन से कहा, “अब तुमने समझा कि संयम का महत्व क्या है? सफलता भी इसी पेड़ की तरह है। अगर तुम अधीर हो जाओ और शॉर्टकट ढूंढो, तो सफलता नहीं मिलेगी। लेकिन अगर तुम संयम, मेहनत और धैर्य के साथ अपनी कोशिश जारी रखोगे, तो सफलता जरूर तुम्हारे पास आएगी।”
आर्यन ने गुरुजी की बात को जीवन का मूलमंत्र बना लिया। उसने हर कार्य में संयम और धैर्य का पालन किया और अंततः वह अपने जीवन में बड़ी सफलता हासिल करने में कामयाब हुआ।
शिक्षा
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि सफलता पाने के लिए संयम और धैर्य अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। अधीरता और शॉर्टकट केवल अस्थायी समाधान हैं, लेकिन सच्ची सफलता हमेशा धैर्य, मेहनत और संयम से मिलती है। संयम हमें सिखाता है कि हर चीज़ अपने समय पर होती है और हमें अपनी कोशिश और विश्वास बनाए रखना चाहिए।
पहेली का उत्तर : माचिस
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प्रार्थना:
हे ईश्वर आप ही इस धरती और इस ब्रह्मांड के निर्माणकर्ता हो। आप सभी के जीवन के कर्ता-धर्ता है, आप ही सभी प्राणियों के सुख-दुख को हरने वाले हो। हे ईश्वर हमें सुख-शांति का रास्ता दिखाने का उपकार करें। हे श्रृष्टि के रचियता! हे परमपिता परमेश्वर! हमारी आपसे यही विनती है कि आप मुझे सद्बुद्धि प्रदान करें और हमारे जीवन को उज्जवल बनाए।
मंत्र का अर्थः जो व्यक्ति विद्या और अविद्या दोनों को जानता है, वह अविद्या से मृत्यु को पार करता है और विद्या से अमरत्व को प्राप्त करता है। यह श्लोक गर्भावस्था में ज्ञान और समझ विकसित करने की प्रेरणा देता है।
गर्भ संवाद
“मेरे प्यारे बच्चे! तुम्हारे विश्वास और मेहनत से ही तुम्हारा भविष्य तय होगा। जब तुम खुद पर विश्वास करते हो और पूरी मेहनत से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हो, तो कोई भी मुश्किल तुम्हारे रास्ते में नहीं आएगी। सफलता की कुंजी यही है कि तुम अपनी मेहनत को निरंतर बढ़ाते रहो और अपने आत्मविश्वास को मजबूत रखो। मैं चाहती हूं कि तुम हमेशा अपने विश्वास और मेहनत के साथ आगे बढ़ो, क्योंकि यही तुम्हारी असली सफलता का रास्ता है।”
पहेली:
हाथ-पैर सब जुदा-जुदा,
ऐसी सूरत दे खुदा।
जब वह मूरत बन ठन आवे,
हाथ धरे तो राग सुनाए।
कहानी: प्रेम की विजय
बहुत समय पहले, एक राज्य में दो पड़ोसी राजकुमार, विक्रम और आदित्य रहते थे। दोनों राजकुमार वीर, बुद्धिमान और शक्तिशाली थे, लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि वे एक-दूसरे से गहरी दुश्मनी रखते थे। यह दुश्मनी उनके पिता और दादा की पीढ़ियों से चली आ रही थी।
राज्य के लोग इस शत्रुता से परेशान थे। हर साल किसी न किसी विवाद के कारण दोनों राज्यों के बीच युद्ध छिड़ जाता था। यह लड़ाई न केवल सैनिकों को प्रभावित करती थी, बल्कि किसानों, व्यापारियों और आम जनता को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।
एक दिन विक्रम और आदित्य के राज्यों के बीच एक और विवाद हुआ। दोनों ने अपने-अपने सैनिकों को युद्ध के लिए तैयार कर लिया। इस बार युद्ध पहले से भी बड़ा होने वाला था, और दोनों पक्ष इसे निर्णायक बनाने की कोशिश में थे।
लेकिन इसी दौरान विक्रम की छोटी बहन आरोही, जो दोनों राजकुमारों की चहेती थी, ने हस्तक्षेप करने का निश्चय किया। वह दोनों को बचपन से जानती थी और समझती थी कि उनकी दुश्मनी केवल अहंकार और गलतफहमियों पर आधारित है। उसने सोचा कि अगर दोनों के बीच प्रेम और समझदारी लाई जाए, तो यह युद्ध टल सकता है और राज्य में शांति लौट सकती है।
युद्ध से एक दिन पहले, आरोही दोनों राजकुमारों से मिलने गई। उसने सबसे पहले विक्रम से कहा, “भैया, क्या आपको याद है कि बचपन में आप आदित्य के साथ खेला करते थे? वह वही व्यक्ति है, जो एक बार आपको नदी में डूबने से बचा चुका है। क्या उस समय आपका प्रेम सच्चा नहीं था?”
विक्रम थोड़ा सोच में पड़ गया, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। फिर आरोही आदित्य के पास गई और बोली, “क्या आपको याद है कि जब आप बीमार थे, तब विक्रम ने अपनी सेना को भेजकर आपके राज्य को आक्रमण से बचाया था? क्या वह प्रेम नहीं था?”
आदित्य भी चुप हो गया। आरोही ने दोनों से कहा, “आपकी दुश्मनी न केवल आपके राज्यों को कमजोर कर रही है, बल्कि आपके अपने दिलों को भी। अगर आप दोनों अपने अहंकार को छोड़कर प्रेम और समझदारी से काम लें, तो यह न केवल आपके लिए, बल्कि लाखों लोगों के लिए एक नई शुरुआत होगी।”
अगले दिन, जब दोनों सेनाएँ युद्ध के लिए मैदान में थीं, विक्रम और आदित्य ने एक-दूसरे की ओर देखा। दोनों के मन में आरोही की बातें गूंज रही थीं। अचानक, विक्रम ने अपनी तलवार नीचे रख दी और आदित्य की ओर बढ़कर कहा, “भाई, हम यह लड़ाई क्यों लड़ रहे हैं? आइए, इसे यहीं खत्म करें।”
आदित्य ने भी अपनी तलवार नीचे रख दी और विक्रम को गले लगाया। दोनों राजकुमारों ने शांति का संकल्प लिया और जनता के सामने घोषणा की कि अब उनके बीच कोई युद्ध नहीं होगा।
इस प्रेम और समझदारी ने दोनों राज्यों को एक कर दिया। लोग खुशी से झूम उठे, और आरोही का प्रेम और प्रयास सभी के दिलों में बस गया।
शिक्षा
यह कहानी हमें सिखाती है कि प्रेम की शक्ति सबसे बड़ी है। प्रेम और समझदारी से बड़े से बड़े संघर्ष को हल किया जा सकता है। अहंकार और गलतफहमियों को छोड़कर, जब हम प्रेम और विश्वास का मार्ग अपनाते हैं, तो हम न केवल अपने जीवन को बेहतर बनाते हैं, बल्कि दूसरों के लिए भी शांति और खुशी का मार्ग खोलते हैं। प्रेम की विजय ही सच्ची विजय है।
पहेली का उत्तर : हुक्का
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