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प्रेम सबसे पवित्र वस्तु है। प्रेम आत्मा से होता है। शरीर से तो खिलवाड़ होता है जिसे लोग प्रेम के नाम पर यूज़ करते हैं।
प्रेम मजबूर नहीं करता, प्रेम मजबूत करता है। प्रेम स्वतंत्रता चाहता है। प्रेम अपनी मर्जी से होता है, प्रेम में शर्तें नहीं लागू होती, ये अनलिमिटेड होता है। प्रेम जब भी होता है जोरदार होता है, धुआंधार होता है। ये जाति-पात, ऊँच-नीच, छोटा-बड़ा कुछ नहीं देखता बस हो जाता है।
प्रेम में उनके झुमके चाँद-तारे लगते हैं। प्रेम में उनके मेहंदी वाले हाँथ 'बनारसी साड़ी का बॉर्डर' लगते हैं। प्रेम में उनका 'सुनो' कहना और पूछने पर 'कुछ नहीं' कहना बहुत कुछ कह जाता है।
प्रेम में उनकी आँखें 'रबड़ी वाली ठंडाई' लगती है। जिनको टकटकी बांध कर देखने से अपनी आँखों में भांग उतर आती है और चेहरे पर दिनमान, बेमतलब की गेहुंआ मुस्कान रहती है।
मैं शायद, बहक रहा हूँ। विचारों को रोका। मेज पर खाना आ गया था। सामने क्षमा नहीं, कोई दूसरी लेडी थी। उसने पूछा, आपने किसी को इंगेज नहीं किया!?' मैंने इधर-उधर देखा, क्षमा उसी युवा के साथ दूसरी टेबल पर बैठी थी। मैंने उस लेडी से पूछा, और आपने?'
उसने कहा, सभी जोड़े से आते हैं, जेंट्स ही इंगेज करते हैं। मेरे हस्बैंड ने आपकी वाइफ को कर लिया है...'
अर्थात मुझे तुम्हें करना चाहिए!
मैं मुंह फाड़ रहा था...।
बहरहाल, हम दोनों खाना खाने लगे। और खाना खाते मैं धारा-प्रवाह सोचने लगा :
छल कपट रहित प्रेम सबको नहीं होता, ज्यादातर को वही घिसा-पिटा 'दिल चीर के देख तेरा ही नाम होगा' टाइप ही होता है वो तो बाद में पता चलता कि वही दिल 'लड़कियों के पर्यायवाची नामों' से छलनी हुआ होता है। और ये विशुद्ध प्रेम करना सबके बस की बात भी नहीं होती इसके लिए बांगर सीमेंट जितना मजबूत ज़िगर चाहिए होता है। प्रेम बदले में कुछ नहीं चाहता। प्रेम डोनर होता है। प्रेम उबाऊ नहीं होता है, प्रेम लुभाऊ होता है। प्रेम में सिर्फ़ कहना ही नहीं सुनना भी अच्छा लगता है।
प्रेम बस प्रेम होता है। पागलपन से होता है। शिद्दत से होता है। प्रेम रंग होता है, रंगोली होता है। फूल होता है, ख़ुशबू होता है। मछली होता है, जल होता है।
और प्रेम ऑक्सीजन जैसा होता है। जो दो दिल और एक आत्मा का मिश्रण मिला के बना होता है।
मगर नजरें घुमाईं तो पता चला, क्षमा टेबल से उठ गई थी। कहां गई- मुंह पर हवाइयां थीं। लेडी ने कहा, मेरे हसबैंड के साथ रूम शेयर करने...!'
'तो क्या यह...वाइप स्वैपिंग क्लब है...'
'और नहीं तो...' वह मुस्कुरा रही थी।
मुझे गश-सा आ गया और मैंने अपना माथा टेबल पर झुका लिया।
साढ़े तीन बजे के लगभग क्षमा ने मुझे कंधे पकड़ झंझोड़ा, 'चलिए...'
'चलिए...!' मैंने होश में आते हुए कहा। देखा, वह ऊर्जा से लबरेज थी। दिल में एक लकीर-सी हो गई। यह प्रेम की तस्दीक थी। थोड़ी-सी जलन। देखा उस युवा को जो अपनी बीवी के सँग जाते हुए क्षमा को मुड़-मुड़ कर देख रहा था। ...महसूस हुआ कि स्वतंत्रता पूर्वक बिना कोई अधिकार जमाये किया गया प्यार, जिसमें कोई अपेक्षा भी शामिल न हो, बड़ा जोरदार होता है।
नीचे टैक्सी खड़ी मिली, जिसे उसने बुक कर पहले ही बुला लिया था। हम उसमें बैठ गए। रास्ते में कोई बात न हुई। घर आकर उसने अपने पलंग पर गिरते हुए कहा, 'अपनी संतान पर अब सिर्फ मेरा अधिकार होगा।'
उसकी बात सुन मैं सहानुभूतिपूर्वक उसके पलंग की ओर मुड़ा और बगल में सो गया।
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