Yah mai kar Lunghi - 14 in Hindi Fiction Stories by अशोक असफल books and stories PDF | यह मैं कर लूँगी - भाग 14

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यह मैं कर लूँगी - भाग 14

(भाग-14)

सुबह होते ही मैं घर चला आया। उसने रोका नहीं और मुझे भी कोई काम न था। फिर एक महीने बाद लौटा जब प्रेस वाले ने बुलाया, पत्रिका तैयार हो गई तो...।

अगले दिन बंडल बनाकर पहुंचा तो पता चला, उसका फिर तबादला हो गया है!

एक धक्का-सा लगा और उस दिन तो मैंने खैर, दो-तीन जगह जाकर 20 पत्रिकाएं जैसे-तैसे भेज दीं लेकिन अगले दिन उसे फोन किया और पता चला कि वह आईआईटी वाले डाकखाने पर पहुंच गई है तो बंडल लेकर वहीं जा पहुंचा।

देखकर तसल्ली हुई कि वह वहां पर मिल गई।नमस्कार चमत्कार के बाद मैंने बंडल काउंटर पर रख दिया और बारकोट मांग लिए।

क्षमा ने अन्य काम के साथ एक-डेढ़ घण्टे में 10 पत्रिकाएँ बुक कर रसीदें मुझे पकड़ा दीं। फिर लंच के लिए मुझे आमंत्रित कर उठ गई।

खाना कम था कुल तीन परांठे। हम दोनों ने डेढ़-डेढ़ परांठा खा लिया। उसके बाद फिर काम।

समय निकाल कर उसने  शेष10 पत्रकाएं भी कर दीं।

रसीद लेकर पेमेंट देने के बाद अब मैं जा सकता था, क्योंकि अभी तो साढ़े चार ही बज रहे थे। लेकिन पता नहीं क्यों बैठा रहा।

जब छह बज गए, वह उठी और स्कूटी उठाई तो मैं पीछे आकर खड़ा हो गया। उसने कहा, बैठ जाइये।' तो बैठ गया।

भूख दोनों को ही लग रही थी इसलिए एक रेस्टोरेंट आया तो मैंने कहा, गाड़ी रोको।'

वह समझ गई और हम दोनों रेस्टोरेंट के अंदर आ गए। वहां कुछ फास्ट फूड ग्रहण कर घर आ गए।

घर उसने बदल लिया था। अब उसमें एक ही बेडरूम था। किचन अलग से और सेपरेट लैट-बाथ।

घर आकर वह बाथरूम गई और उसके बाद मैं। तब थोड़ी देर बाद उसने पूछा, खाने के लिए क्या बनाया जाए?'

मैंने कहा, ऐसी तो कोई भूख नहीं लग रही।'

वह बोली, वह तो मुझे भी नहीं लग रही।'

-फिर आराम किया जाए?' थोड़ी देर बाद उसने पूछा।

-हां और क्या?' मैं बोला।

-कॉफी पिएंगे?' उसने पूछा।

मैंने कहा, अभी तो पीकर आए हैं, इच्छा नहीं है...!'

यों हम कुछ देर बैठे रहे। तब उसने जमुहाई ली और मैंने भी। फिर वह जाकर पलंग पर लेट गई तो मैं भी उसके बगल में जाकर लेट गया।

दिन भर के थके होने के कारण हम लोगों को लेटते ही नींद आ गई। मगर एक-डेढ़ घंटे बाद ही खुल गई। फिर नहीं आई। और फिर भूख भी लगने लगी इसलिए नींद आना मुश्किल हो गई, तो मैंने पूछा, क्योंकि मुझे भारी जिज्ञासा थी और उस घटना के बाद एक-डेढ़ महीने का समय भी बीत गया था।

-कोई रिजल्ट मिला?'

वह समझ गई, बोली, नहीं!'

-कैसे कह सकती हो!'

-मेंसस फिर आ गया...'

फिर आ गया, यह सुन कन्फर्म हो गया कि जब मैंने किया उसके बाद भी आया था और तभी वह बच्चे की चाहत में वाइफ स्वैपिंग क्लब गई थी! लेकिन तब मैं यह नहीं समझ पाया था कि बच्चे के लिए वह मुझ उम्रदराज के साथ राजी हुई थी! तब तो इसी भ्रम में था कि भावुकता के कारण सटते-सटते संयोग हो गया था!

-कल फिर ट्राई करते हैं...' मैंने उसके मन की ली।

-क्या फायदा, अगर होना होता तो एक बार में ही हो जाता...।' वह निराश थी।

-फिर? मैंने थोड़ी देर बाद बुझे स्वर में पूछा।

-भाग्य में बदा होता तो मिला हुआ क्यों छिन जाता!' कह वह सिसक पड़ी।

कहा तो कुछ नहीं बस थोड़ी देर बाद मैंने उसे बाँहों में ले लिया और पीठ पर थपकी दे सुलाने का जतन करने लगा। और कुछ देर में हम दोनों फिर सो गए। मगर साढ़े तीन बजे नींद फिर खुल गई। उठ कर पेशाब के लिए गया और लौट कर आया। और उसके बाद वह गई और लौट कर आई।

तब इस आवाजाही से नींद फिर उचट गई। अब तो  जैसे मरे मारे पर भी नहीं आ रही थी। और सटे होने, सुबह का वक्त होने के कारण इरेक्शन बढ़ रहा था।

और मेरे मन में आ रहा था कि क्यों न एक बार फिर मैं ही ट्राई करूं। हो सकता है इसे इच्छित फल मिल जाए! यों इरेक्शन और मजबूत करने के लिए मैं उसके स्तन सहलाने लगा। तब शायद इसी इच्छा से उसने भी मेरे ओठ अपने होठों में भर लिए। फिर मैंने जीभ निकाली तो वह उसे अपने मुंह में खींचकर चूसने लगी। तब ऐसा जीवंत आभास हुआ कि मेरी जीभ को उसका मुख नहीं, मेरे पुरुषांग को उसका काम्यशरीर चूस रहा है! और उबाल ऐसा बढ़ा कि मैं फनफना कर उसके ऊपर आ गया। मगर मैंने उसे ज्योंही बेपर्दा किया और खुद भी हुआ कि इस ख्याल ने धर दबोचा- अरे बुढ़ऊ, जब उस युवा से यह काम नहीं हुआ, तो तुम क्या खाकर करोगे...' और बस इतना सोचना था कि अंग ढीला पड़ गया।

फिर उसने उसे मुट्ठी में भरा, और दबा दबाकर सख्त भी किया, लेकिन ठिकाने पर लगाकर मैंने ज्योंही धक्का दिया, अंग मुड़ गया...लाख कोशिश के बावजूद अंदर नहीं गया! सांस फूल गई और मैं निराशा से भर कर उसके ऊपर से उतर बगल में आ गया।

सांस फूल रही थी उसकी भी। बेपर्दा पड़ी थी वह। और मैं शर्मिंदा।

फिर थोड़ी देर में उसने  बेड के टॉप से अपना मोबाइल उठाया और चलाने लगी। दृश्य मैं भी देखने लगा। वीडियो में उन्मादी अश्व पगला गया तो उसके अगले पैरों में फँसी बलिष्ठ अश्वनी के मुख से झाग बह उठा...!

दृश्य देख इरेक्शन फिर मजबूत होने लगा। और उसी समय उसने अंग पर हाथ रख लिया तो मैं ताव में फिर से ऊपर आने लगा। मगर वह जोर लगाकर औंधी गई। और मैंने अश्व की तरह पगला कर कमर के नीचे हाथ खोंस उसे अधर में उठा अश्विनी बना लिया।  फिर बेड उतर अपनी ओर खींच लिया ... और पुरुषांग उसकी नितंब सन्धि से लगा दिया।

और जब गर्दन मोड़ काम पीड़ा से मुस्कुराई

तो, ओठ ओठों में भर लिए! जिसके बाद कूल्हे उसने पीछे की ओर ठेल दिए तो अंग घप्प से भीतर घुस गया।

हाथ बढ़ा मैंने स्तन पकड़ लिए और कपड़े की तरह निचोड़ने लगा। और वह सीत्कार भरती कमर मटका उठी।

इरेक्शन इतना मजबूत हो गया, जितना सोचा न था!

फर्श पर खड़ा मैं उसकी चोटी खींच-खींच झटके पर झटके दे उठा। और वह जांघें पकड़ कमर को लट्टू की तरह घुमा उठी...मस्ती में गाती हुई, आज ही हमने बदले हैं कपड़े, आज ही हम नहाए हुए हैं...'

जब दूध वाला हॉर्न दे रहा था, वह संपीडन कर रही थी, जैसे कोल्हू गन्ने को चूसता है, और मेरा सूख चुका झरना उछल कर बह रहा था।

उस सम्मिलित उत्तेजना आवेग और आनंद से ही मैं समझ गया कि आज बोवनी हो गई... फसल अब मिल कर रहेगी।

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