सुबह के छह बज रहे थे। शहर अभी पूरी तरह जागा नहीं था, लेकिन अंकित की ज़िंदगी में नींद के लिए जगह कब की खत्म हो चुकी थी। किराए के छोटे से कमरे में रखे एक पुराने से पलंग पर वह चुपचाप बैठा था। कमरे में ज़्यादा सामान नहीं था—एक लोहे की अलमारी, एक छोटा सा गैस चूल्हा और दीवार पर टंगी माँ की पुरानी तस्वीर। वही तस्वीर जिसे देखे बिना उसका दिन शुरू नहीं होता था। गाँव छोड़े उसे पूरे छह साल हो चुके थे।
समर्पण से आंगे - 1
part - 1सुबह के छह बज रहे थे।शहर अभी पूरी तरह जागा नहीं था, लेकिन अंकित की ज़िंदगी में के लिए जगह कब की खत्म हो चुकी थी।किराए के छोटे से कमरे में रखे एक पुराने से पलंग पर वह चुपचाप बैठा था। कमरे में ज़्यादा सामान नहीं था—एक लोहे की अलमारी, एक छोटा सा गैस चूल्हा और दीवार पर टंगी माँ की पुरानी तस्वीर। वही तस्वीर जिसे देखे बिना उसका दिन शुरू नहीं होता था।गाँव छोड़े उसे पूरे छह साल हो चुके थे।पिता के गुज़र जाने के बाद ज़िंदगी अचानक बदल गई थी। घर की सारी ज़िम्मेदारी एक ...Read More
समर्पण से आंगे - 2
भाग – 2उस रात अंकित देर तक सो नहीं पाया।कमरे की बत्ती बंद थी, लेकिन दिमाग़ में सवालों रोशनी जलती रही।“कल मत आना…”सृष्टि के ये शब्द बार-बार उसके कानों में गूंज रहे थे।वह समझ नहीं पा रहा था कि उसे क्या ज़्यादा चुभा—उसका मना करना,या उसके शब्दों में छुपा हुआ डर।सुबह होते ही अंकित रोज़ की तरह तैयार हुआ। माँ की तस्वीर को प्रणाम किया और दफ़्तर के लिए निकल पड़ा।लेकिन आज उसके कदम अपने आप मंदिर की तरफ मुड़ गए।वह दूर खड़ा रहा।सृष्टि अभी नहीं आई थी।अंकित ने राहत की साँस भी ली और हल्की सी मायूसी ...Read More
समर्पण से आंगे - 3
भाग -3बारिश के बाद की सुबह कुछ ज़्यादा ही खामोश थी।मंदिर के सामने वही जगह, वही फूलों की खुशबू—लेकिन हवा में कुछ और भी घुला हुआ था।सृष्टि जैसे ही अपनी टोकरी सजाने लगी, उसे आसपास की नज़रें महसूस होने लगीं।कुछ नज़रें जिज्ञासा से भरी थीं,कुछ तिरछी,और कुछ ऐसी—जिनमें सवाल नहीं, फ़ैसले छुपे होते हैं। लोग उसे देख कर तरह तरह की बातें करते ।“कल देखा था ना…”“छाता शेयर कर रही थी…”“विधवा होकर भी…”शब्द पूरे नहीं बोले जा रहे थे,लेकिन अर्थ साफ़ था।सृष्टि का हाथ काँप गया।उसने फूल ठीक किए, लेकिन मन बिखरता चला गया।उसी समय अंकित दूर से आता ...Read More
समर्पण से आंगे - 4
भाग – 4गाँव की बस सुबह-सुबह शहर पहुँची।अंकित प्लेटफॉर्म पर खड़ा था, दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।उसे पता सिर्फ़ माँ नहीं आ रही हैं,आज पूरा समाज उसके साथ आने वाला है।बस से उतरते ही माँ की नज़र सबसे पहले उसी पर पड़ी।वही माँ, जिनके चेहरे की झुर्रियों में उसकी पूरी परवरिश छुपी थी।वही आँखें, जिनमें चिंता आज डर बनकर उतर आई थी। मां ने कहा“अंकित…”लेकिन आवाज़ में पहले जैसा अपनापन नहीं था।“माँ,”अंकित ने पैर छुए।माँ ने सिर पर हाथ रखा,लेकिन हाथ काँप रहा था। उन्होंने ने कहा “चल,”“बहुत बातें करनी हैं।”रास्ते भर कोई कुछ नहीं बोला।कमरे में पहुँचकर ...Read More
समर्पण से आंगे - 5
भाग – 5माँ के फैसले के बाद सब कुछ बाहर से सामान्य दिख रहा था,लेकिन अंदर ही अंदर हर किसी कच्ची दीवार की तरह दरकने लगा था।मंदिर के बाहर सृष्टि फिर से फूल बेचने लगी थी,लेकिन अब उसकी हर हरकत पर नज़र थी।वह जानती थी—अब वह सिर्फ़ “सृष्टि” नहीं रही,अब वह “वही विधवा” बन चुकी थी,जिसका नाम फुसफुसाहटों में लिया जाता है। लोग तरह तरह की बातें करने लगे“आजकल बहुत हँसने लगी है…”“किसके भरोसे?”“शहर वाले लड़के का असर है…”ये बातें सीधे कानों तक नहीं आती थीं,लेकिन हवा में तैरती हुई दिल तक पहुँच जाती थीं।अंकित ने दूरी बना ली ...Read More
समर्पण से आंगे - 6
भाग – 6सुबह की धूप आँगन में उतर रही थी,लेकिन घर के अंदर एक अजीब सा सन्नाटा छाया हुआ सामने खड़ा था।सृष्टि उसके पीछे—थोड़ी दूरी पर,जैसे हर कदम सोच-समझकर रख रही हो।माँ कुर्सी पर बैठी थीं।उनकी आँखों में आज डर कम और थकान ज़्यादा थी।उन्होंने सृष्टि से कहा।“आ जाओ,”सृष्टि ने कदम बढ़ाए।हाथ काँप रहे थे,आँखें झुकी हुई थीं।यह वही घर थाजहाँ से उसका भविष्य तय होने वाला था—बिना उसकी मर्ज़ी के भी।माँ ने उसे ध्यान से देखा।“तुम्हारा नाम?”“सृष्टि।”“उम्र?”“सत्ताइस।”माँ ने गहरी साँस ली।इतनी कम उम्र…इतना बड़ा बोझ।उन्होंने दोबारा कहा।“बैठो,”सृष्टि बैठ गई,लेकिन दिल खड़ा ही रहा।कुछ पल तक कोई नहीं बोला।फिर ...Read More