पुनर्जिवित....
जैसे बरसों से ,
सुन्न पड़ा हवा का इक झोंका..,
चलता है चुपचाप मन के भीतर
अनगिनत तुफ़ा-आंधी का ,
खौफ़नाक बंवडर लेकर ।
वैसे परसों से ,,
ख़ामोश पड़ा दिल का इक टुकड़ा
दौड़ाता है सरेआम तन के बाहर
ढ़ेर सारी बातों का पहरा लेकर ,
ढूंढ़ता है मूर्छित यादों का बसेरा
केवल.. जर्जरित स्नेह के उपवन में ,
ठहरता है क्षणिक मुसाफ़िर बनकर
दूर शुष्क बने पेड़ों के छांव में..,
टूटती हुई सांसों को पुनर्जीवित करने।
©®- शेखर खराड़ी
तिथि- १८-१०-२०२६