अपनी ही आस में एक चिराग जला रखा है,
ख़ामोश राहों पर एक मंज़र सजा रखा है।
ज़माने को लगता है कि मैं तन्हा हूँ यहाँ,
पर मैंने तो ख़ुद में ही एक जहाँ बसा रखा है।
न किसी के आने की दस्तक़ का इंतज़ार है,
न ही अब दिल को किसी और का ख़ुमार है।
सब कुछ पा लिया मैंने ख़ुद को पाकर,
अब तो बस अपनी ही रूह से बेपनाह प्यार है।
आँधियों को बहने दो, तूफ़ानों को आने दो,
मेरी ही उम्मीदों के चिराग को जगमगाने दो।
अब टूट कर बिखरने का ख़ौफ़ नहीं मुझे,
अपनी ही आस में अब मुझे मुस्कुराने दो।
- Ritu kumari