"पहरे"
यह कहानी किसी घर या किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उन अनकही भावनाओं का एक आईना है जो अक्सर हम जाने-अनजाने में अनदेखा कर देते है इसका उद्देश्य किसी पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि एक सकारात्मक बदलाव की शुरुआत करना है।"
शीतल एक ऐसे परिवार में जन्मी थी जहाँ बेटी से ज्यादा बेटे को मान दिया जाता है। परिवार कुछ रूढ़िवादी सोच के दायरे में सिमटा हुआ था।
शीतल का आज 12वीं कक्षा का रिजल्ट आया। वह अच्छे अंकों से पास हुई थी। अपनी ऑनलाइन आई मार्कशीट और चेहरे पर एक सुकून व मेहनत की मुस्कान लिए वह भागती हुई आई और चहकते हुए अपने पिता से बोली, "पापा, मैं पास हो गई!" उसने मार्कशीट पापा की तरफ बढ़ाते हुए कहा, "पापा, अब मुझे भी भाई की तरह बाहर बड़े कॉलेज में पढ़ना है।" पापा उसकी बात पर मुस्कुरा दिए और 'हाँ-हाँ' बोलते हुए उसके अंक देखने लगे।
आगे पापा कुछ कहते, उससे पहले ही दादी थोड़ा चिढ़कर और तंज भरे रवैये से बीच में ही बोल पड़ीं, "तुम बाहर पढ़कर क्या करोगी? कौन सा तुमको इस घर में रहना है या हमें तुम्हारी कमाई मिलनी है?" जिस कमरे में अभी हँसी गूँज रही थी, वहाँ सन्नाटा पसर गया। शीतल के चेहरे की मुस्कान एक पल में खत्म हो गई। उसकी मासूम आँखें पापा और मम्मी की तरफ देखने लगीं और वह मन ही मन सोचने लगी कि क्या पापा-मम्मी भी वैसे ही उसकी साइड लेंगे जैसे भाई की लेते हैं?
मम्मी, जो पास में ही रोजमर्रा के काम में लगी थीं, वह अपनी बेटी की सफलता पर खुश तो थीं, लेकिन काम में उलझी हुई ही उन्होंने बिना कुछ बोले दादी की बात का समर्थन कर दिया। शीतल अंदर ही अंदर दुखी हो गई और भागकर अपने कमरे में चली गई और खुद को अंदर बंद कर लिया। वह सोचती रही कि कैसे सब भाई की साइड लेते हैं, उसकी नहीं; कैसे उसकी जीत महज बस उसकी होती है और भाई की जीत पूरे परिवार की! यह वह अनछुआ अहसास होता है जो परिवार वाले समझकर भी इस बात से
पर्दा डाल देते हैं कि 'बेटी हो'।
शीतल पूरे दिन कमरे से बाहर नहीं आई और अपने ही ख्यालों से अकेले लड़ती रही। शाम के वक्त जब सब चाय पी रहे थे, तो पापा ने शीतल को बुलाया। शीतल, जो कुछ वक्त पहले खुश थी, अब उसके चेहरे पर एक गहरी उदासी थी और मन में अनगिनत सवाल। पापा ने शीतल की तरफ चाय का कप बढ़ाते हुए कहा, "शीतल, कॉलेज के लिए देखेंगे, तुम उदास मत हो।"
शीतल कुछ कहती, इससे पहले मम्मी ही बोल पड़ीं, "सुनिए जी, हमारे पास अभी एक और इतना बड़ा खर्चा उठाने की गुंजाइश नहीं है और अगले साल इसकी शादी करनी है। अम्मा ठीक कह रही हैं, हम इसको पढ़ने के लिए मना नहीं कर रहे, बस इसी शहर में ही एडमिशन ले ले। हम कौन सा इसके दुश्मन हैं?" मम्मी ने शीतल के सिर पर प्यार से हाथ रखकर कहा, "बेटी, तुम तो समझदार हो।"
शीतल का जैसे दिल के साथ भरोसा ही टूट गया। वह अपनी मम्मी की आँखों में देखने लगी और सोचने लगी—क्या मम्मी और दादी को इस बात का अहसास भी है कि वे खुद उस पहरे की पहली सीढ़ी बन रही हैं? जिसे समाज पुरुष-प्रधान कहता है और लोग कहते हैं कि घर के पुरुषों को यह पसंद नहीं है, लेकिन वास्तव में घर की औरतें ही घर की औरतों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए सबसे पहले पहरे लगाती हैं।
वह सोचने लगी कि कैसे लोग कहते हैं कि घर के मर्द औरतों पर पहरे लगाते हैं, लेकिन सच तो यह है कि घर की औरतें ही घर की औरतों पर पहरे लगाती हैं—कभी जिम्मेदारी के नाम पर तो कभी रिवायतों के नाम पर।
एक एहसास
हमें खुद से, अपने घर की औरतों से और समाज से यह पूछना चाहिए कि जाने-अनजाने में कहीं वे किसी और औरत के सपनों पर पहरे तो नहीं लगा रही हैं?
☆अनामकारा