विधाता की तुम वो अधूरी नहीं, सबसे सुंदर रचना हो,
जिसके सामने फीकी पड़ जाए, इस संसार की हर उपमा हो।
खोज लिया सारा ब्रह्मांड, पर इस दिल ने यही बात मानी है,
कि आज तक न दूसरी बनी है कोई, और न तुम जैसी कोई बनानी है।
तुम्हारी सादगी को देखकर मुख से बस 'अदभुत' निकलता है,
तुम्हारी एक मुस्कान से, पतझड़ में भी सावन खिलता है।
बुरी नज़र से बची रहो तुम, यही दुआ है इस दिल की,
क्योंकि ईश्वर ने तुम्हारे जैसा बेजोड़ रूप, फिर कभी गढ़ा ही नहीं।