अलीबाग की अधूरी शाम
Written By: Vikash Viplao
की होती अगर ये फ़िल्म कोई,
या मेरी किसी कहानी का संसार…
तो इस तरह अधूरी ना होती,
ना होती यूँ बेज़ार।
होती तू हीरोइन उसकी,
और मैं उसका दीवाना हीरो…
सात समुंदर पार करके भी
आ जाता मैं तेरे द्वार।
आँखों में भर लेता तुम्हें,
जैसे सदियों से बस इसी मंज़र का था इंतज़ार…
और धीरे से थाम हाथ तेरा,
करता तेरे चाँद जैसे चेहरे का दीदार।
बिठा के तुझे अपनी बुलेट पे,
निकलता मैं भीड़ से दूर उस पार…
जहाँ सड़कें भी धीरे चलतीं,
और हवा भी चखती बस तेरा ख़ुमार।
कभी तू कंधे पे सर रख देती,
कभी ज़ुल्फ़ें उड़ा देता समुंदरी बयार…
और मैं हर मोड़ पे बस ये सोचता,
काश ठहर जाए कहीं ये सफ़र मेरे यार।
अलीबाग के उस सी फोर्ट पे
बैठ जाते लेकर आँखों में ख़याल हज़ार…
हाथ में गरम चाय की प्याली होती,
और होता लहरों की गुमशुदा ख़ामोशी का संसार।
बालों को सँभालते हुए तू
करती कुछ आधी-अधूरी बातें बार-बार…
हर ख़ामोशी तेरी
जैसे कोई नज़्म हो, वैसे पढ़ता मैं उनका सार।
पर ज़िंदगी को शायद
मुकम्मल कहानियों से नहीं है प्यार…
इसलिए तो कुछ सफ़र बस दिल में रहते हैं,
और यादें बन फिरते रहते हैं बेक़रार।
शायद कल भी जब समुंदर देखूँगा,
तो महसूस होगा वही पुराना अँधकार…
जैसे अलीबाग की वो हर अधूरी शाम
उम्र भर करती रहेगी हमारा इंतज़ार।