दिल टूटा है, मगर ज़िंदा हूँ अभी
Poet : विकाश विप्लव
तू मिली तो लगा था
जैसे बरसों की आवारा तलाश ख़त्म हुई,
तू गई तो समझ आया
कि कुछ कहानियाँ मुकम्मल होने के लिए नहीं, बस अधूरी छूटने के लिए ही लिखी जाती हैं।
मैंने तुझे चाहा था
किसी जीत की तरह नहीं,
एक घर की तरह...
जहाँ लौटकर उम्र भर का सुकून मिलता है।
तू कहती रही मजबूरियाँ हैं,
मैं कहता रहा रास्ते निकल आएँगे,
तू कल के अंधेरों से डरती रही,
और मैं आज की रौशनी में तेरा हाथ थामे अडिग खड़ा रहा।
अजीब बात है ना...
जिसे खोने के ख़ौफ़ में मैं हर रोज़ जीता था,
वही एक दिन बड़ी सादगी से मुझे खोने का फ़ैसला सुना गई।
अब कोई शिकवा, कोई शिकायत भी नहीं है तुझसे,
बस एक गहरा खालीपन है...
जो हर रात तेरे नाम की सिसकी से शुरू होता है,
और तेरी धुंधली याद पर आकर ख़त्म।
मैं आज भी ठीक उसी मोड़ पर खड़ा हूँ,
जहाँ तू मुझे तन्हा छोड़कर आगे बढ़ गई थी,
फ़र्क सिर्फ़ इतना है...
पहले तेरा बेताबी से इंतज़ार करता था,
अब चुपके से अपने ही दिल को समझाता हूँ।
अगर कभी गुज़रते हुए मेरी याद आ भी जाए,
तो ये ख़याल दिल में मत लाना कि मैं नफ़रत करता हूँ,
मैंने इबादत की तरह मोहब्बत की थी तुमसे...
और सच्ची मोहब्बतें, लाख बिखर जाएँ,
पर कभी नफ़रत करना नहीं सीखतीं।
तुम मेरी ज़िंदगी का सबसे हसीन हादसा, सबसे ख़ूबसूरत ग़लती थीं,
और मैं आज भी उस पावन ग़लती को,
अपने माथे की दुआ की तरह याद करता हूँ।