मोहन की दीवानी
मैं मोहन की दीवानी हूँ… पर मुझे राधा नहीं बनना।
ना मुझे विरह में जलना है, ना भक्ति में खुद को खोना।
राधा सा प्रेम पवित्र ज़रूर था… जहाँ मिलन से ज़्यादा इंतज़ार था।
मीरा सा प्रेम अमर ज़रूर था… पर मेरा प्रेम थोड़ा ज़िद्दी, थोड़ा स्वार्थी… थोड़ा सिर्फ उसका।
प्रेम बाँटना मुझे कभी आया ही नहीं… मैं उसे पूरा चाहती हूँ, आधा नहीं।
मैं नहीं चाहती वह मुझे कहानियों में सुनाए… बस रहना चाहती हूँ उसके मन के किसी कोने में, जहाँ सिर्फ मेरा अधिकार समाए।
और सच कहूँ तो… उसके दिल में किसी और का ख़याल भी मेरे मन को तोड़ देता है… मेरे प्रेम की हर उड़ान का रुख कहीं और मोड़ देता है।
मुझे तो रुक्मिणी बनना है— उसकी इकलौती ज़िद, उसके चुप का सुकून, उसके नाम का वह एहसास… जिसे वह कभी किसी और में न ढूँढ़ पाए।
उसकी आँखों का वह ठहराव, जो सिर्फ मुझे देखकर आए… उसके मन का वह कोना, जहाँ मेरा नाम चुपके से मुस्कुराए।
मैं उसकी आदत भी बनना चाहती हूँ, और उसकी प्रार्थना भी… ऐसी ख़्वाहिश, जहाँ उसका हर कल सिर्फ मेरे साथ नज़र आए।
इस जन्म अगर वह मोहन है… तो मुझे उसकी बाँसुरी की धुन नहीं बनना… मुझे उसकी धड़कनों की आदत बनना है।
उसकी साँसों में धीरे से घुल जाना है, जैसे शाम समंदर में उतर जाती है।
उसके हर सुकून की वजह बनना है, जैसे मंदिर में चुप सी प्रार्थना रह जाती है।
मैं एहसास बनकर नहीं… उसकी आत्मा की ज़रूरत बनकर रहना चाहती हूँ।
ऐसा कि जब भी वह आँखें बंद करे… तो मुझको ही देखे। और जब वह आँखें खोले… तो हर दुआ में बस मुझे ही पाए।
और अगर प्रेम सच में पूजा है… तो मैं उसके जीवन की आख़िरी प्रार्थना बनना चाहती हूँ।