जिंदगी इक पटरियों पर दौड़ती सी रेल है,
सांस की हर चाल में इक अजब सा खेल है।
जब भगाता हूँ इसे मैं वक्त की रफ्तार पर,
डर सा रहता है अनायास हो न घात पर।
साँस की गर रफ़्तान इतनी तेज हो जाए,
हर धड़कन अनहोनी के साए में खो जाए।
खींचकर जब हाथ फिर मैं बेड़ियों को थामता,
धैर्य का दामन पकड़कर फिक्र को बिसराता हूँ
तब धुंधली सी वो मंजिल बहुत दूर दिखती है,
कछुए सी चाल में हर रात लंबी लगती है।
और जब यह उम्र खुद परवान होकर भागती,
जी चाहता है वक्त की सुई यहीं थम जाए
मगर थमने लगे जब जिंदगी का ये कारवां,
तो पीछे छूट जाता कोई अपना साथी-कारवां।
बस इसी कशमकश में, उधेड़बुन की धार में,
कभी इस जीत में और कभी इस हार में
पता ही नहीं चलता कि कब ये जिंदगी का तेल,
रेड लाइन से नीचे आ कर हो गया है खेल!