ठंडी पड़ती इन सांसों में, बस एक ही कसक बची है,
ज़िंदगी की आख़िरी शाम, तेरे दीदार को तरसी है।
हाथ कँपकँपा रहे हैं, और धुंधली हो रही है ज़मीन,
पर दिल चीख कर कह रहा—काश! तुम होते यहीं।
एक पल को छू लेते मुझे, तो हँसते-हँसते मर जाता,
तेरी बाहों का कफ़न मिलता, तो मैं तर जाता।
अब बिना तुम्हारे, ये रूह तड़पकर निकल रही है,
जैसे बिन पानी के कोई तिनका, आग में जल रही है।
अलविदा! मेरी साँसों की डोर अब टूट रही है,
तेरी यादों की आख़िरी परछाईं भी छूट रही है।
अगले जनम की दुआ भी, मैं माँगूँ तो कैसे माँगूँ?
जब इस जनम की अधूरी मोहब्बत, मुझे जीने नहीं दे रही है।
मैं हार गया इस दुनिया से, और हार गया तक़दीर से,अब छूट रहा है हाथ मेरा, तेरी यादों की ज़ंजीर से।