तुम्हारे नाम की धड़कन, तुम्हारे रूप का साया,
कि जैसे प्रेम का अमृत, स्वयं इस धरा पर आया।
नैनों में जो बसी मूरत, वही मेरी इबादत है,
तुम्हें ही सोचना हर पल, मेरी पावन सी आदत है।
तुम्हारी मंद मुस्काानें, जैसे सावन की पहली फुहार,
छू जाए जो रूह को मेरी, कर दे सब कुछ तार-तार।
बिना बोले जो सुन ले तू, वो अनकही सी बात हूँ मैं,
तुम हो चंदा की शीतल चांदनी, तो शांत सी रात हूँ मैं।
न कोई शर्त है इसमें, न पाने की ही कोई चाह,
बस तुम्हारी ओर मुड़ती है, मेरी चाहत की हर एक राह।
यही तो प्रेम रस का सार है, जो दो शरीरों को एक जान करता है,
दिलों की इस इबादत को, ज़माना आज भी याद करता है।