शब-ए-फ़िराक़ में आँखों से ख़्वाब रूठ गए,
तुम्हारी याद के सारे हिसाब टूट गए।
तलाशते रहे तुमको हम हर एक रस्ते पर,
नसीब ऐसे मुड़े कि तमाम ख़्वाब टूट गए।
तड़प ये दिल की भला किससे जाकर बोलें हम,
कि बेबसी के समंदर में डूबते-डूबते बोलें हम।
तेरी जुदाई का सदमा उठाए कैसे भला हम
बिखड़ गए हैं इस तरह कि जुड़ न पाएंगे हम।