श्री हनुमंत प्रकाश हनुमान जी की महिमा का गुणगान करती एक श्रेष्ठ पुस्तक
बाबा गोरक्षनाथ की पावन कर्मभूमि गोरखपुर की पवन धारा से मूर्धन्य साहित्यकार, श्रेष्ठ लेखक, वाचस्पति सम्मान प्राप्त डॉ. विजय प्रताप शाही जी द्वारा लिखित पुस्तक श्री हनुमंत प्रकाश हाल ही में मैंने पढ़ी है। जब ईश्वर की विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है तब ऐसी पुस्तक का श्रृजन संभव हो पाता है। 56 पृष्ठों से सुशोभित यह पुस्तक न सिर्फ पठनीय है वल्कि पूजा स्थल पर स्थान प्राप्त करने योग्य है।
आदरणीय डॉ विजय प्रताप शाही जी मेरे अभिन्न मित्र, शुभचिंतक व सखा हैं। आपसे मेरा व्यक्तिगत संबंध अत्यंत मधुर व प्रगाढ़ है। आप हनुमान जी के अनन्य भक्त है। हनुमंत प्रकाश आपकी हनुमान जी में भक्ति भाव को प्रतिबिंबित करती है। आपके उपर हनुमान जी की विशेष कृपा रहती है ऐसा आपका दृढ़ विश्वास है। आप जैसा धीर, गंभीर व संघर्षशील व्यक्ति विरले ही मिलेंगे।
श्री हनुमंत प्रकाश के आवरण पृष्ठ पर हनुमान जी की अभय मुद्रा की छवि मानो पाठकों को अभय प्रदान करता है। आवरण पृष्ठ का रंग संयोजन ही हृदय में भक्ति भाव का संचार करता है। श्री हनुमंत प्रकाश का लेखन चार चरणों में हुआ है। जो चार सोरठों, इक्यावन दोहों, चार सौ चौपाईयों से सुसज्जित है।
प्रथम चरण के शुरुआत में आपने अपने दोहों द्वारा अपने गुरु व ईश्वर की वंदना अत्यंत भक्ति भाव से की है। तत्पश्चात हनुमान जी के जन्म व बाल लीलाओं का वर्णन अत्यंत मनोहारी है। हनुमान जी की नटखट बाललीला व ऋषि द्वारा दिया गया श्राप वर्णित है।
द्वितीय चरण में राम जन्म, धनुष भंग, राम सीता विवाह, राम वन गमन, केवट प्रसंग, हनुमान जी द्वारा ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव की सेवा में तत्पर होने का मार्मिक चित्रण है।
तृतीय चरण में सूर्पनखा प्रसंग, खर दूषण बध, मारीच प्रसंग, सीता हरण, शबरी मिलन व सीता जी की तलाश में भटकते श्री राम लक्ष्मण का हनुमान जी से मिलन, हनुमान जी द्वारा माता सीता की खोज में दक्षिण दिशा में प्रस्थान करना, समुद्र लंघन, सीता मिलन व लंका दहन का मार्मिक वर्णन है।
चतुर्थ चरण में हनुमान जी के पराक्रम, बुद्धि व चातुर्य का मनोहारी वर्णन है। श्री राम द्वारा लंका पर चढ़ाई करना, राम रावण युद्ध, अहिरावण द्वारा श्री राम लक्ष्मण का हरण करके पाताल लोक ले जाना व हनुमान जी द्वारा श्री राम लक्ष्मण को पाताल लोक से सकुशल वापस लाना, श्री राम लक्ष्मण को गरूड़ द्वारा नागपाश से मुक्त कराना, लक्ष्मण मूर्छा के दौरान सुषेण वैद्य को लंका से लाना, हिमालय से पवन वेग से बूटी लाकर लक्ष्मण की प्राण रक्षा करने का प्रसंग अत्यंत मार्मिक है।
मात्र 56 पृष्ठ में हनुमान जी की महिमा का गुणगान करना गागर में सागर भरने के समान है और यह कार्य डॉ विजय प्रताप शाही जी ने अत्यंत कुशलता से किया है। शब्द संयोजन व भक्ति भाव का अभूतपूर्व संगम है श्री हनुमंत प्रकाश। सबसे बड़ी बात है कि जब आप एक बार श्री हनुमंत प्रकाश पढ़ना शुरू करते हैं तो मन हनुमान जी व श्री राम की लीलाओं में रम जाता है और पुस्तक कब समाप्त हो जाती है पता ही नहीं लगता है। पुस्तक पढ़ते-पढ़ते आप कहीं भी बोझिल महसूस नहीं करते हैं। यह एक कुशल साहित्यकार के कलम का जादू है। इसके लिए आदरणीय डॉ विजय प्रताप शाही जी बधाई के पात्र हैं। श्री हनुमंत प्रकाश हनुमान जी की महिमा का गुणगान करती एक श्रेष्ठ पुस्तक है।
डॉ. राजीव रंजन मिश्र, एडवोकेट
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश