चालीस पार की सभी महिलाओं को समर्पित
कविता: जाने क्यूं ये मन उदास है
जाने क्यूं ये मन उदास है
ना जाने क्यूं आज मन उदास है
जुलाई के उमस भरे मौसम में
चालीस पार के पतझड़ में
रिश्तों की करमकश में
अब कुछ नहीं मन को भाता है
न संवरने का मन, आज
बिखरना ही क्यूं आज भाता है
जाने क्यूं मन उदास है
ये डिप्रेशन है या थायराइड का असर
बिना बात आंखें नम
बढ़ता वजन है या अनिंद्रा का असर
विटामिन्स की कमी या मूड का असर
मेरी खुशी क्यूं मुझसे नाराज है
जाने क्यूं मन आज उदास है
पहले बातें खत्म नहीं होती थी
अब खामोशी ही भाती है
मुस्कराना क्या इतना कठिन है
दिल पर क्यूं उदासी का असर है
ये उम्र की दोपहर है
चुभती बहुत है,
जीवन की गति, तेज बहुत है
बारिश के इंतजार में
पतझड़ उदास है।
---dr वंदना शर्मा नई दिल्ली