एक समय था। जब हम अपने परिवार में शांति के माहौल में रहा करते थे। समय-समय के साथ सुविधा मिलती थी।
संयुक्त परिवार हुआ करते थे। रिश्ते निभाने में सभी की क्षमता एक ही थी। सहनशील ' लोक - लाज ' हवा में भी खुशबू महकती थी। चेहरे की मुस्कान वो भरोसा सुकून भरा एहसास हुआ करता था। जिस उम्र पर हम हुआ करते थे। आज उस उम्र पर हमारे बच्चे खड़े है। लेकिन हम चितिंत है। समाज को देखते हुए। जमाना हमारे वाला जब बेटी गली - गली जा सकती थी। दोस्त सहेली गली बाजार को निकल दिया करती थी। बेधड़क घर भी चितिंत नही रहता था। उस समय मे समाज में अपनापन था। किसी गाँव की बेटी सब की बेटी हुआ करती थी।
रिश्ते नाम देने से बन जाया करते थे। हर चीज में सौंदर्य हुआ करता था। आज के समय में अंधी दौड़ चल रही है।
भरोसा जात विरादरी से क्या इंसानियत से भी उठ गया है। उस समय की तो बात ही कुछ और थी। बस याद बन कर रह गयी है। बेटी बचाओ . बेटी पढ़ाओ अभियान तो चल गया है। बेटी तो बचा ली बेटी पढ़ा भी ली पर मुखौटो वाले चेहरे से कैसे बचाये ये तो बताओ। बाहर पढ़ाने की बहार आ गयी है। अपने शहर से दूसरे शहर जाना है। पढ़ने ' नही तो उस पढ़ाई की कीमत नही मानी जायेगी। बेटी को आत्मनिर्भर बनाओ घरेलू अत्याचार से बचाओ . बेलन की जगह कलम हो हाथ में ' जब हम कुछ पद को हासिल कर लेते है। तो हमारे लिय रास्ते खुल जाते है। वरना बहू बन कर दलदल में ही फँस कर रह जायेगी ।
- Nandini Agarwal Apne Kalam Sein