"घर और इंसान"
सबको महलों में रहने का शौक है,
पर टूटे घर की छत पर
कोई खड़ा होना नहीं चाहता।
छज्जे से उगता सूरज सबको अच्छा लगता है,
पर टूटी खिड़की से जो चाँदनी झाँकती है,
उसको कोई अपनाना नहीं चाहता ।
मैं घर की बात नहीं कर रही,
ये तो इंसान की बात है।
सबको सफल लोगों से रिश्ता चाहिए,
पर जो हार गया हो,
उसका हाथ कोई नहीं पकड़ता।
टूटी दीवारों पर भी धूप आती है,
दरारों से भी उजाला अंदर आता है।
पर लोगों की नज़र सिर्फ चमकते शीशों पर रहती है,
नींव में लगी सीलन को कोई नहीं देखता।
जीत का आँगन भरा रहता है,
हार की दहलीज़ पर सिर्फ सन्नाटा होता है।
सबको रोशन नाम चाहिए,
पर बुझे दिए को जलाना
कोई अपना काम नहीं समझता।
मैं कहती हूँ,
महल भी एक दिन गिर जाते हैं,
फ़र्क़ बस इतना है
मिट्टी के घर आँधी से टूटते हैं,
और इंसान के घर...
अक्सर अपनों की आँखों से बिखरते हैं।
प्राची तंवर ……