ये जग को क्या हो गया है
कविता
ये जग को क्या हो गया है,
हर कोई यहाँ अकेला हो गया है।
ना कोई तीज-त्योहार अब सुख देता,
वो बचपन वाला उत्साह कहीं खो गया है।
तीज के झूले खो गए,
राखी का प्यार कहां खो गया है।
रिश्तों में पैसों की दीवार आ गई,
आज तो पड़ोसी भी पराया हो गया है।
बात एक-दूसरे सेकरने में
कतराता है आदमी,
भरोसा किसी पर करना गुनाह हो गया है।
ये जग को क्या हो गया है,
भागती-दौड़ती दुनिया की भीड़ में,
आज इंसान तन्हा हो गया है।
घर आज फ्लैट हो गया,
संयुक्त परिवार अब एकल हो गया है।
खेलों की जगह मोबाइल ने ली,
आज बचपन कितना बूढ़ा हो गया है।
जाने किसकी नजर लगी रिश्तों को,
हर कोई आज अकेला हो गया है।
ये जग को क्या हो गया है।
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डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi