-पड़ोस की छत पर एक चाँद -
आज पड़ोस की छत पर एक चाँद देखा मैंने,
आसमाँ का नहीं था वो, जिसे पहली बार देखा मैंने।
बयान कैसे करूँ वो कितना हसीन और दिलकश है,
उसके चेहरे पर सिमटा, ये सारा आसमाँ देखा मैंने।
दिल में उतर जाए इतनी कशिश है उसमें,
हर धड़कन को उसकी तरफ बढ़ता देखा मैंने।
कुछ दीवारें, कुछ मकान रोक देते हैं रास्ता मेरा,
वरना उसकी आँखों में, मेरे लिए भी एक अहसास देखा मैंने।
अब हर रोज़ उसी छत पर ठहर जाती हैं नज़रें मेरी,
अपनी तक़दीर को उस चाँद की चौखट पर बार-बार देखा मैंने।
-MASHAALLHA