"घर"
मैं कहती हूँ, घर को घर रहने दो...
न बनाओ उसे दिखावे का महल,
न सोने-चाँदी की दीवारों का भ्रम।
घर तो बस घर होता है
एक सुकून, एक थकान मिटाती शाम।
पर उसे घर बनाने के लिए
चाहिए होते हैं कुछ अपने,
कुछ अधूरे से सपने,
जो मिल-जुल कर पूरे होते हैं
चाय की चुस्कियों और बेवजह की हँसी में।
घर की दीवारों को
चमकदार रंगों से ज़्यादा
भाती हैं मुस्कुराहटें,
जो बिना वजह ही फूट पड़ती हैं।
चौखट को संगमरमर की नहीं,
इंतज़ार करती आँखों की ज़रूरत होती है,
और लौट कर आने वाले कदमों की आहट की।
हर कोने में शीशे की मूरत न सही,
न ही फ़र्श पे बिछा हो महँगा कालीन,
पर दिल तो शीशे सा साफ़ हो,
जिसमें अपना अक्स ढूँढने से भी डर न लगे।
और उसमें बसे स्नेह का उजाला हो
जो अँधेरी रातों में भी रास्ता दिखा दे।
रसोई से आती सौंधी खुशबू,
आँगन में सूखते रिश्तों के कपड़े,
किताबों के बीच दबे ख़त,
और तकिये के नीचे छुपे राज़
इन्हीं छोटी-छोटी चीज़ों से बनता है घर।
घर कोई चकाचौंध का तमाशा नहीं,
न ही लोगों को दिखाने की तस्वीर।
ये मंदिर है अपनों के आदर्शों का,
जहाँ माफ़ी रहती है,
जहाँ गिले-शिकवे भी गले लग जाते हैं।
प्यार से गुँधा, यादों से सँवारा,
और दुआओं से महका हुआ।
प्राची तंवर