मैं और मेरे अह्सास
मंज़िल, रास्ता और मुसाफ़िर
मंज़िल, रास्ता और मुसाफ़िर सभी भटक गये हैं l
ना जाने किसकी तलाश में हैं कि छटक गये हैं ll
क़ायनात में चारो ओर बयार ही एसी बह रही है l
लोगोँ के दिलोंदिमाग हालात के मारे सटक गये हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह