घर का दरवाजा खुला रक्खा है
अंदर मैं हूँ, कौन सा घर में हीरा छुपा रक्खा है
अश्क पीकर करना है गुजारा अब तो
उसनें दरिया पे पहरा लगा रक्खा है
क्या कोई मदारी नचाये बंदर अपना
क्यों रास्ते को, जमाना बना रक्खा है
ईद हो गयी राह चलते लोगों की
खिड़की पे चांद सजा बैठा है
डुब गया सुरज, चलों अब घर चलें
शायद, घर का चिराग भी बुझा रक्खा है