खामोशी में है डूबे सब,
ना कोई किसी से प्रश्न उठा है रहा।
प्रजा के मिथ्या अपवाद के कारण,
अवध का समाज अपनी रानी को ठुकरा है रहा।
ना किसी ज्ञानी का ज्ञान आज,
सीता का लांछन मिटा है रहा।
प्रजा के अपवादों के कारण
राम सिया को छोड़े जा है रहा।
माताओं और भाइयों का भी
मौन सिया को सता है रहा।
परित्यागता होने का दुख
जानकी को तड़पा है रहा।
लंका का राजा जो जीते जी कर ना सका
अवध का वासी वो कर है रहा।
जन्मों जन्मों के साथी दोनों
फिर भी विरहा का कष्ट है सहा।
खामोशी में है डूबे सब,
ना कोई किसी से प्रश्न उठा है रहा।
प्रजा के मिथ्या अपवाद के कारण,
अवध का समाज अपनी रानी को ठुकरा है रहा।
- palvisha