मेरे अंदर दो रूहानी ताकत रहता है
कविता
एक रूहानी ख्वाब मेरे
एक साए हैं साथ मेरे
जो मुझे हिम्मत देता है
मुझे अक्सर जगाता है
मैं रानी ख्वाबों की
मलिका वो मुझे बनता है
एक सोच जिसे कह सकती हूं
निडर जो मुझे रखता है
भैय नहीं मेरे अंदर खुद के लिए
इतना अभिमानी वो मुझे बनता है
जब दुखी हो जाऊं तो सपने दिखा कर हंसता है
और जब खुश रहो तो अनजान दिखा कर दोहलता है
मैं नहीं मेरे अंदर दो रूहानी ताकत रहता है
एक मुझे जिंदा दिल बनता है
और दूसरा मौत की नजरों से देखा है
मुझे खुद से नफरत हो जाए
कुछ ऐसा कर जाता है
सब पर आक्रोश दिखा कर भी पछताते नहीं
स्वार्थी इतना है कि गुमान
मौत पर तांडव करती है
और एक दरिया दिली मुझे बनता है
अपने कर्मों पर पछताते है
स्वाभिमानी मुझ में दिखलाता है
बस प्यार से जीना चाहता है
जानता है दोनों
क्या सही है क्या सही नहीं है
एक सर झुका कर गलतियां मान लेती है
तो एक नाकारता है अपनी गलतियों को
अहंकार में आक्रोश बन जाता है
जब उसे अपनी उसकी गलतियां बताओ
तो सर उठाकर आंखें दिखाई है
पता नहीं मुझ पर कौन कब हावी होता है
जो अच्छा है उसे बुराई डराता है
उबर नहीं पाती मुझ में अच्छाई मेरे
इतना डर वह मुझे दिखता है
अकसर आच्छाई उसके सामने घुटने टेक देता है