हाल ही में एक नई आदत सीख रही हूँ-हर बात समझाना ज़रूरी नहीं..
हर गलतफ़हमी सुधारना भी नहीं..
लोगों को सहज लगे, इसलिए खुद को छोटा करना अब नहीं..
अब चुप रहना कमज़ोरी नहीं लगता..
हर सवाल का जवाब देना मेरी ज़िम्मेदारी नहीं है..
कुछ लोग मुझे जितना समझते हैं, उतनी ही जगह मैं उन्हें देती हूँ..
अकेलापन अब डराता नहीं, क्योंकि भीड़ में खो जाना ज़्यादा थकाता था..
आज मैं खुद को समझाने से पहले,
खुद को चुन रही हूँ..