**“उस दिन मेरे साथ जो हुआ…
क्यों हुआ, कैसे हुआ—ये मैं आज तक नहीं समझ पाई…
पर शायद ये मेरे कान्हा की ही लीला थी।
बचपन से बस एक ही सपना था—
वर्दी पहनने का…
आईपीएस बनने का…
उस पहचान को पाने का, जिसके बिना जीना कभी सोचा ही नहीं था।
पर पापा ने कहा—मेडिकल फील्ड चुनो।
शायद वो मुझे उस रूप में देखना चाहते थे…
और मैंने अपने सारे सपनों को चुपचाप उनके सपनों में समेट लिया।
सोचा—शायद पापा की खुशी में ही मेरे कान्हा की इच्छा होगी।
फिर वो दिन आया…
इमरजेंसी वार्ड में मेरी ड्यूटी थी।
एक एक्सीडेंट केस आया—सर पर गहरी चोट…
मैं चिल्लाई, मदद के लिए…
पर हर कोई अपनी दुनिया में व्यस्त था।
और फिर…
मेरी आंखों के सामने उसने आखिरी सांस ली।
उसकी आंखों से ज़िंदगी जाते हुए मैंने देखा…
और उस दिन… मेरे अंदर कुछ टूट गया।
दो दिन बाद…
एक मां ने बच्चे को जन्म दिया…
पर खुद उसे गोद में लेने के लिए ज़िंदा नहीं रही।
मैंने उसे बचाने की कोशिश की—
CPR… suction… हर संभव कोशिश…
पर कुछ नहीं बदला।
मैं टूटी…
गुस्सा आया…
मैंने सवाल किए…
और बदले में मुझे सज़ा मिली—
रेड चिट… और ट्रांसफर।
फिर लेबर रूम…
जहाँ मेरी रूह तक कांप गई—
14 साल की एक बच्ची…
जो खुद दुनिया को समझने में सक्षम नहीं थी…
उसने एक बच्चे को जन्म दिया।
उसके साथ जो हुआ…
वो सिर्फ एक घटना नहीं थी—
वो इंसानियत का सबसे काला सच था।
उस दिन…
मेरी internship का आखिरी दिन था।
और मैं… पूरी तरह टूट चुकी थी।
घर आई…
तो लगा अब इस रास्ते पर चल ही नहीं पाऊंगी।
तभी पीछे से पापा की आवाज आई—
“शायद तुम अपने कृष्णा को भूल गई हो बेटा…”
मैं बस उन्हें देखती रह गई।
उन्होंने कहा—
“ये कलयुग है…
यहाँ तुम्हारे कान्हा की नीति चलेगी,
और तुम अभी भी राम की तरह सोच रही हो…”
उस वक़्त बहुत सवाल थे मेरे अंदर…
बहुत दर्द था…
और तभी…
किसी ने मुझे संभाला।
वो इंसान…
जिसके रास्ते, मंज़िल… सब मुझसे अलग थे…
पर दिल सिर्फ साथ देने के लिए धड़कते थे।
उसने मुझे एक छोटी सी पॉकेट भगवद गीता दी…
और बस इतना कहा—
“आप शायद भूल गई हैं…
अपने आप को… और अपने सखा को…”
उस दिन समझ आया…
हम टूटते नहीं हैं…
हमें तोड़ा जाता है,
ताकि हम अपने असली रूप को पहचान सकें।
आज भी दर्द है…
यादें हैं…
पर अब मैं जानती हूँ—
मेरे हर कदम के पीछे
मेरे कान्हा का हाथ है…”** 💙🙏✨
👑
“कभी-कभी जिंदगी हमें वहां ले जाती है
जहाँ हम जाना नहीं चाहते…
ताकि हम वो बन सकें,
जो हमें बनना होता है.” 🌙✨