मुझे आबादी से डर नहीं लगता,
मुझे सुनसान जगह से डर लगता है…
पर मुझे भीड़ से भी डर लगता है।
उस भीड़ से,
जिसकी अपनी कोई सोच नहीं होती,
जिसका कोई स्पष्ट मत नहीं होता,
जिसके दिल में कभी-कभी करुणा भी नहीं होती।
भीड़ में चेहरे बहुत होते हैं, पर इंसान कम दिखते हैं,
आवाज़ें बहुत होती हैं, पर सवाल पूछने वाले कम होते हैं,
और पत्थर उठाने वाले ज़्यादा।
भीड़ अक्सर न्याय नहीं करती,
बस शोर करती है…और उस शोर में
किसी की चीख, किसी की सच्चाई,
किसी की मासूमियत चुपचाप दब जाती है।
और सबसे ज़्यादा दर्द तब होता है,
जब उस भीड़ में किसी की आँखों में
एक पल को भी संकोच नहीं होता…
जैसे संवेदनाएँ
कहीं पीछे छूट गई हों, जैसे दिलों पर
एक अदृश्य परत जम गई हो,
जहाँ किसी के टूटने की आवाज़
किसी को सुनाई ही नहीं देती।
भीड़ में खड़े लोग अक्सर यह भूल जाते हैं
कि सामने खड़ा व्यक्ति सिर्फ़ एक चेहरा नहीं —
एक पूरी कहानी होता है, जिसमें उसके सपने,
उसकी थकान, उसकी उम्मीदें
और उसकी चुप पीड़ाएँ भी होती हैं।
लेकिन भीड़ कहानियाँ नहीं देखती,
वह सिर्फ़ दृश्य देखती है,और उसी क्षण
निर्णय सुना देती है।
शायद इसलिए कभी-कभी मुझे लगता है
कि असली साहस भीड़ का हिस्सा बनने में नहीं,
भीड़ से अलग खड़े होने में है ।
ArUu ✍️