बंट गए सब
कभी एक थे, आज बँट गए सब,
हँसी की चौपाल से चुप्पी में सिमट गए सब।
आँगन जहाँ गूँजती थी किलकारियों की धुन,
वहीं खामोशी ओढ़े, अपने ही बन गए सब।
घर की दीवारों पे टँगी यादों की तस्वीरें,
आज धूल पूछती हैं—किधर चले गए सब?
जो साथ बैठ कर बाँटते थे सुख-दुख की रोटियाँ,
वक़्त की आँधी में रिश्तों से कट गए सब।
एक दीया था जो सबके हिस्से उजाला देता,
अब हर कोना अँधेरा, अपने-अपने जल गए सब।
नाम तो वही हैं, खून भी एक ही बहता है,
पर दिलों के पते बदल कर बिछुड़ गए सब।
कभी जो “अपना” कहने में देर न लगती थी,
आज वही शब्द होंठों से उतर गए सब।
बस एक सवाल दीवारों से टकरा कर लौटता है—
हम बदले या हालात, कि यूँ बिखर गए सब…
आर्यमौलिक