Hindi Quote in Poem by Deepak Bundela Arymoulik

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हर आदमी ज़मी बनता है जीने के लिए

हर आदमी ज़मी बनता है जीने के लिए,
ख़ुद को रौंदता है, औरों को सीने के लिए।
उसके सपनों पर चलते हैं रिश्तों के क़दम,
फिर भी चुप रहता है, घर को रखने के लिए।

वो धूप में जलता है, छाँव किसी और की,
रातें काटता है सुकून किसी और की।
उसकी पीठ पर रखे जाते हैं सब बोझ,
क्योंकि वही मज़बूत है — यही मान ली जाती है सोच।

हर आदमी ज़मी बनता है जीने के लिए,
अपनी आवाज़ दबाता है, शांति पीने के लिए।
उसके आँसू भी नियमों में बँध जाते हैं,
“मर्द हो” कहकर दर्द समझाए जाते हैं।

वो पिता बनकर त्याग का नाम पा जाता है,
पति बनकर ज़िम्मेदारी में खो जाता है।
बेटा बनकर उम्मीदों का बोझ ढोता है,
और आदमी बनकर… अक्सर अकेला होता है।

पर ज़मी भी एक दिन थक जाती है,
दरारें चुपचाप सच कह जाती हैं।
अगर पानी, प्यार, सम्मान न मिले,
तो सबसे उपजाऊ ज़मी भी बंजर हो जाती है।

इसलिए याद रखना ऐ दुनिया,
हर आदमी पत्थर नहीं होता।
वो ज़मी ज़रूर बनता है जीने के लिए,
पर उसे भी हर दिन कुचले जाने का हक़ नहीं होता।

आर्यमौलिक

Hindi Poem by Deepak Bundela Arymoulik : 112011200
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