लघुकथा -पुष्प
उसने बड़ी तरोज्जत के साथ आँगन में फूलों के पौधे रोपे थे । आज पौधों पर किस्म -किस्म के खिले पौधों को देखकर उसका मन ख़ुशी से भर जाता ।
'एक दिन उसने पत्नी से कहा -' देखो राानी कितने सुन्दर फूल खिले हैं ।
'क्या खाक खिले हैं ।इधर मेरी कमर टूटी जा रही है । आँगन में झाड़ू
लगाते-लगाते ।' पत्नी रुष्ट स्व्यार में बोली ।
'लोग तरसते हैं ऐसे फूलों के लिए ।' उसने अपनी बात रखते हुए कहा ।
'तरसे तो तरसे । अगर आपको शौक है पौधों का तो एक नौकरानी रख लो वरना मैं इन्हें एक दिन .......।' वह बोलते -बोलते रुक गयी । मगर पत्नी के कर्कश स्वर से आहत मन पौधे से सूूूखकर टपके फूल तऱह टपक कऱ रह गया ।
-सुुनील कुमार सजल