क्या सचमुच पतंग है ये ज़िन्दगी?
कुछ दूर तक है जाती..,
कुछ खम्भों में सिमटी पड़ी है..!
कुछ पेंचों से टकराती..,
खुद के मांझों में उलझी हुई है!
पूछा जब-जब सवाल के कैसे हो?
एक अनमना सा जवाब...
"बस कट रही है।"
शायद ... पतंग ही है ये ज़िन्दगी।

Hindi Shayri by Mukesh Joshi : 166
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