वफ़ा के नाम पर ख़ुद को मिटा कर देख लेते हैं,
चलो हम आज फिर ये दिल लगा कर देख लेते हैं।
ज़माना बेवफ़ाई को समझता है हुनर अपना,
हम इस दौर-ए-जफ़ा में सर झुका कर देख लेते हैं।
शिकायत क्या करें तुझसे, गिला क्या ज़िंदगी से हो,
तेरे हर एक सितम को मुस्कुरा कर देख लेते हैं।
तू लाख छोड़ दे तन्हा हमें इस अंजुमन में अब,
तेरी यादों से ये महफ़िल सजा कर देख लेते हैं।
हवा चाहे बुझा डाले चराग़-ए-आरज़ू सारे,
लहू से हम नया शोला जला कर देख लेते हैं।
क़सम खाई थी हमने तो कभी रुख़ ना बदलेंगे,
ये वादा आज भी तुझसे निभा कर देख लेते हैं।
तुझे अहसास हो जाए हमारी बे-ग़रज़ चाहत,
नज़र से अश्क की बूँदें गिरा कर देख लेते हैं।