🌸 संस्कार सिर्फ़ बेटियों के लिए ही क्यों?🌸
अक्सर समाज में यह सुनने को मिलता है कि आजकल लड़कियों में संस्कार नहीं रहे। लेकिन कभी सोचा है कि जिन संस्कारों की उम्मीद लड़कियों से की जाती है, क्या वही उम्मीद लड़कों से भी की जाती है?
ज़रा एक बार लड़कों को भी शादी के बाद ससुराल भेजकर देखिए…
कैसा लगेगा जब उन्हें अपने ही माता-पिता से मिलने के लिए किसी और की अनुमति लेनी पड़ेगी? जब रात को देर से सोने के बावजूद सुबह जल्दी उठकर घर के सारे काम करने पड़ें? जब सबके खाने के बाद उन्हें ठंडी रोटियाँ खानी पड़ें?
जब उन्हें अपने खर्च किए हुए हर पैसे का हिसाब देना पड़े, अपने रहन-सहन और पहनावे को दूसरे परिवार के हिसाब से बदलना पड़े और अपने माता-पिता का घर व अपना सरनेम छोड़कर किसी दूसरे घर को अपना बनाना पड़े?
और जब अपनी पसंद के कपड़े पहनने पर उनके संस्कारों पर सवाल उठाए जाएँ, तब वे कैसा महसूस करेंगे?
क्या किसी लड़की के संस्कारी होने का प्रमाण यही है कि वह अपनी पहचान, अपनी पसंद और अपने अधिकारों से समझौता करती रहे?
शादी के बाद एक लड़की से उम्मीद की जाती है कि वह दूसरे परिवार को अपना बनाए, वहाँ के तौर-तरीकों को अपनाए और हर रिश्ते को पूरी ईमानदारी से निभाए। लेकिन क्या रिश्ते निभाने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उसी की है?
यह सवाल लड़कों या उनके परिवारों के विरुद्ध नहीं, बल्कि उस सोच के विरुद्ध है जो एक ही रिश्ते में दो लोगों के लिए अलग-अलग नियम बनाती है।
संस्कार किसी एक लिंग की ज़िम्मेदारी नहीं हैं। रिश्ते निभाना, बड़ों का सम्मान करना और परिवार को जोड़कर रखना दोनों की ज़िम्मेदारी है।
बेटियों से संस्कारों की उम्मीद ज़रूर कीजिए, लेकिन बेटों को भी वही संस्कार दीजिए। क्योंकि एक अच्छे समाज की पहचान यह नहीं कि उसकी बेटियाँ कितना सहन करती हैं, बल्कि यह है कि वहाँ बेटियों और बेटों, दोनों को कितना सम्मान और बराबरी मिलती है।
आखिर संस्कार का अर्थ अपनी पहचान खो देना नहीं, बल्कि दूसरों की पहचान और सम्मान को समझना भी है। ❤️🩹💞
~अनामिका✍️