सज जाना है
बचपन से बुढ़ापे तक
सजना ही तो है।
मानवता में बह जाना है
शुद्ध होने के लिए
चलना है।
पहाड़ लांघना है,
धमकी की धुँध से
बाहर आना है।
डर साँप का हो
या बाघ का
आदमी से बड़ा है।
टूटी पगडण्डियों को ठीक कर
आलोक से
रास्ते लम्बे पार करने हैं।
*** महेश रौतेला