लोग आपकी तकलीफ़ में तबतक दिलचस्पी लेते हैं, जबतक वह उनके लिए चर्चा का विषय रहती है. जैसे ही परेशानी उनके स्वार्थ या सुविधा के आड़े आती है, सहानुभूति आलोचना में बदल सकती है. इसलिए हर कमज़ोरी सबके सामने खोलना ज़रूरी नहीं; कुछ दर्द ख़ामोशी में सँभालना भी भावनात्मक परिपक्वता है…🤍:)