अंततः एक दिन प्रतीक्षा करते तुम ठहर जाओगे सागर की तरह और कोई नदी घाट घाट पर मुंह मारती तुम से आ मिलेगी! पर उसे उस नदी का तुम्हारे लिए प्रेम मत जानना वो लाचारी होगी उसकी, वो तुम्हारे लिए नहीं वरन् स्वयं को सींचने आई है तुमसे, तुम तब भी बिन प्रेम के रह जाओगे, अधूरे...!!!