यूँ बेख़बर फिर रहा था मैं,
भटक रहा था कहीं उलझनों में।
रातें बेचैन थीं,
नींद न थी आँखों में,
बस दिन कट रहे थे यूँ ही फ़रियादों में।
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एक रात नज़र के सामने
किसी की मुस्कान आई,
मैं ठहर गया,
मेरे चेहरे पर सुकून सी पहचान आई।
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कुछ वक़्त बीता,
सुकून का एक पहाड़ मिल गया,
थोड़ी सी हँसी और
वो पल मेरे लम्हों में शुमार हो गया।
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कुछ यादें बनी,
कुछ बातें बनी,
अब उसी का ख़ुमार है।
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अब तो बस इंतज़ार है
उन सुकून भरे लम्हों का।
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उन्होंने कहा—
"अभी थोड़ी देरी है इसमें।"
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हमने कहा—
"इम्तहानों में भी,
सुकून का इंतज़ार है।"
— M.Goutam 🪶